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मानवीयता के नजरिये से हमारे बारे में सोचें।

बुधवार, 2 नवंबर 2011


मानवीयता के नजरिये से हमारे बारे में सोचें।

हम है बेजुबान 
हम है बेजुबान 
तुम्हारी दया पर हमारी जान,  अपने हित न करो कुर्बान, तुम बख्श दो हमें इन्सान।                                 (आप सभी को ईद उल जुहा की मुबारकबाद)
समय की मांग है। आस्था  धर्म के नियमों को मौसम, पर्यावरण प्रकति के लिये इन्सानियत के अनुरूप ढालें।  अपने स्वार्थ को धर्म कीआड़ ले खुद को इतना क्रूर बना लेना कहां की मानवता  है।?  चाहे हिन्दू धर्म हो चाहे वह मुस्लिम धर्म हो या  कोई  अन्य धर्म्।  पशुओं की उसे धार्मिक स्थलों में  बलि  देना वह भी जो निरीह हो आपकाविरोध भी   कर सके   किसी भी कौम के द्दारा धर्म के नाम पर मारडालना कैसा धार्मिक अनुष्ठान है ? अगर हम मानते हैं ,कि भगवान और अल्लाह  ने  हम इन्सानों के साथ  पशुओं की भी रचना की है।  तो हमें यह कह्कर अल्लाह  व देवी के नाम पर किसी अबोध निरीह जानवरों की बलि देने का भला क्या हक है ? सच मे क्या देवी व अल्लाह जीवों को मारने से खुश हो सकतें हैं। हर धर्म जीवों पर दया की शिक्षा देता । पर ये इन्सान है जो अपने फायदे के लिये उन्हे अपनी तरीके से परिभाषित करता है। क्या हम किसी देवी मन्दिर और त्योहार पर शेर की बलि दे सकते हैं, शायद नही क्योंकि  वह इन्सान से ज्यादा ताकतवर होता है और इन्सान अपने से ज्यादा ताकतवर से नही भिड़ता क्योकिं उसे अपनी जान प्यारी   है। ठीक इसी प्रकार देवी स्थानों मे निरीह जीवों को मारकर इन्सान खुद खाता है और बदनाम देवी को करता है। पाकिस्तान मे एक मानवीय पहल की गयी है कि बलि के बदले बकरियों को गरीबों  को दान दिया जाय जिससे उनके दूध से गरीब आय प्राप्त कर सकें। काश ये निवेदन स्वीकार कर लिया जाय और निरीह पशुओं को वध करने से बचाया जा सके। मै भी हिन्दू धर्म के अनुयायियों से ये प्रार्थना करती हूं कि वह भी धर्म के नाम पर निरीह पशुओं की बलि देना बन्द करें और इस अन्धविश्वास से बाहर निकलें कि निरीह जीवों की हत्या करने से व खाने से भगवान खुश होता है्। सभी धर्म जीवों पर दया करना सिखाते हैं प्रेम अहिंसा ही सभी धर्मों का सार है ।  कोई धर्म हिंसा नही सिखाता है। ए तो मानव है जो अपने स्वार्थ व खाने के लिये निरीह प्राणियों की हत्या करता है। और अपने को पशु तुल्य कर लेता है बिल्कुल जंगल राज की तरह जब की प्रकति ने उसे न जाने कितनी नियामतें बक्शी है खाने को पर वह है उन्हें छोड़कर उन अबोध जानवरों को खाता है। जो कमजोर हैं उसका विरोध नही करते कभी एक पल रूक कर मानव बुद्धि से दिल से अन्तर मन से उस पशु के कट्ने से पहले उसके समीप खड़ी मौत के खौफ को उसके चेहरे पर देखे व महसूस करे तो उसे अपने समीप मौत होने पर जो एह्सास होगा वही एह्सास शायद हो पर हम कभी उनके बारे मे नही सोचते क्योकिं हमें मासांहार मे स्वाद नजर आता है किसी की मौत को हम जश्न के रूप मे पेट मे डाल अपनी भूखं शान्त करते हैं मुस्लिम भाइयों को तो हम नाह्क ही बदनाम करते हैं जब कि सच्चाई तो ए है की हिन्दूधर्म मे भी बड़ी संख्या मासांहार करने वालों की है हिन्दू देवालयों मे अन्धविश्वास के कारण आज भी कई जगह निरीह पशुओं के बलि की प्रथा है। प्रकति व पर्यावरण के संतुलन  के लिये सभी धर्मों के मानने वालों को आज नही तो कल  उदारवादी होना ही  होगा और अमानवीय क्रत्यों से मुख मोड़ना होगा तथा इन्सान हो कर जानवरों से मित्रवत व्यहार करना होगा । वरना प्रकति की मार से बचना आसान नही है। जिस दिन वह कहर ढायेगी इन्सान भी उन निरीह पशुओं की भातिं बिन बोले ही कट जायेगा।      








3 comments:

Pallavi 3 नवंबर 2011 को 6:25 pm  

आपकी बातों से पूर्णतः सहमत हूँ और आपके साथ भी मैं भी सभी धर्मो के लोग से यह प्रार्थना करती हूँ
कि वह भी धर्म के नाम पर निरीह पशुओं की बलि देना बन्द करें और इस अन्धविश्वास से बाहर निकलें कि निरीह जीवों की हत्या करने से व खाने से भगवान या अल्लाह खुश होता है्।.... बहुत बढ़िया संदेशत्म्क प्रस्तुति आभार ...

Suman Dubey 6 नवंबर 2011 को 8:29 pm  

पल्ल्वी जी नमस्कार,मेरे विचारो से शम्ति जताने के लिये ध्न्यवाद्।

Babli 11 नवंबर 2011 को 10:08 am  

सुन्दर सन्देश देती हुई बहुत बढ़िया प्रस्तुती! काश सभी ऐसा ही सोचे !

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