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ब्लागिंग पर रवीन्द्र प्रभात की अनुपम पहल ....

सोमवार, 10 अक्टूबर 2011


इतिहास का मतलब दिक्कालीय परिवेश और घटनाओं के दस्तावेजीकरण का है और इसके लिए इंतज़ार किया जाना प्रमाणिकता को बनाए रखने के लिहाज से जरुरी नहीं है। इतिहास द्रष्टा द्वारा सीधे खुद लिखने के बजाय जब भी कालान्तर में लोगों द्वारा बिखरे हुए साक्ष्यों और तथ्यों के आधार पर इतिहास लिखा जाता है प्रमाणिकता के साथ समझौता करना पड़ता है।
सृजनगाथा में रवीन्द्र प्रभात की ताजातरीन पुस्तक हिंदी ब्लोगिंग का इतिहास पर  डा. अरविन्द मिश्र की सारगर्भित समीक्षा पढ़ने के लिए यहाँ किलिक करें :

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हास-परिहास: सामूहिक ब्लाग की बागुड़ लांघते सांड़ !!

शनिवार, 19 फ़रवरी 2011

                                 मुहल्ले-मुहल्ले,नुक्कड़-नुक्कड़, एसोसिएशन बनने की आहट मिल रही है.  ब्लाग  विरोधी ताक़तें कह रहीं हैं - कि  एक घर के चार लोग चार एसोसिएशन बना लेंगे तब देखना मज़ा आएगा.
 कोई कदम उठाएंगे वो कदम क्या होगा ये कील कुमार बताएंगे  जिनके कई ब्लाग परित्यक्ता की ज़िंदगी काट रहें हैं कुछ बेचारे ब्लागर (अपने ब्लाग पर पाठकों के अभाव में) खद्योतित प्रकाश बांट रहे हैं. वैसे. एक ब्लागर जी के  ब्लाग रूपी नुक्कड़ में सांड़ घुस गया  पता चला कि हुजूर खुद ने बछड़े को पाला पोसा बड़ा सांड़ बनाया और उसके साउथ-एवेन्यू-माल पे त्रिशूल गुदवा  दिया था. उसी बछड़े ने सींग उठाए  तो अपने ब्लागर भाई बैल्ट कस के कानी-हाउस में बेड़ आए उसे . इस घटना से प्रभावित   कई लोगों ने स्वातंत्र्य गीत गायन अभ्यास शुरु कर दिया.ताकि उनके मालिकाना हक़ वाले सामूहिक ब्लाग को बचाया हा सके. सो भाइयो कल ही सूत जी से भैंट हुई थी वे शौनकादि ऋषियों को समझा रहे थे:-"ऋषियो, सब कुछ करो पर सांड़ों और सांपों पे कड़ी नज़र रखो. सांप को आस्तीन से बाहर न जाने दो. बछडों को सांड़ मत बनने दो खेती कराओ बस खेती. "
साभार : टेढ़ी-मेढ़ी बातें


       सुना तो यहां तक गया है कि- "सामूहिक-ब्लॉग पे आने के लिए जो पीले चावल भेजे जा रहे हैं उसकी वज़ह से खाने के लिए चावलों  की कीमत में बढ सकतीं हैं. प्याज ने  सरकार की ऑंखें  गीली की थीं अब चावल लाइ न लुटवा दें इस भय से निपटने मनमोहन जी मैडम से मिल ने जाएंगे खबर पक्की है. !!"
 इधर अपने धान के देश पर कड़ी नज़र रखी जा रही है. सूत्र बताते हैं कि आमंत्रण हेतु प्रयोग में आने वाले चावलों की आपूर्ती उधर से ही हो रही है.मित्रो इस घड़ी में जब हिंदी ब्लाग चहुं ओर महत्व साबित करने में लगे हैं तब सांड़ों का आतंक विचारणीय है. गुरु परसाई की क़सम वे होते तो अकल ठिकाने लगा देते. खैर जो भी हो सब पढ़े लिखे बुद्धिवान हैं तो इस पशु वृत्ति से नि:वृत्ति के साधन खुद खोजने होंगे. इस होली के पहले.ताकि सदभावना कायम रहे

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