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और मैं !

बुधवार, 16 फ़रवरी 2011




द्रोणाचार्य की शक्ल में
कई चेहरे नीति की बिसात पर
मुझे शह मात देने के लिए
मुझसे मेरा अंगूठा मांग रहे
वे सब एक और एकलव्य की
जीते जी मौत चाह रहे !

जतन से
इस अंगूठे की बल पर
मैंने उन्हीं के लिए
स्वर्ण द्वार खोला था ...
विडंबना !
स्वर्ण मृग का झांसा मुझे दे
मुझे ही पुकार रहे ...
बाण चढ़ा न पाऊं
इस खातिर -
मेरा अंगूठा मांग रहे !

क्षमा प्रभु क्षमा
तुम्हारे उद्दीप्त प्रकाश में भी
मैं सत्य से भागता हूँ
भ्रम के बीज बोता हूँ ...
और तुम !
अपनी गोद में उठाये
मेरा मार्ग प्रशस्त कर रहे !

सुबह की किरण हो
स्वप्न हो भोजन हो
या पूजा घर हो
तुम इन्गित करते जा रहे
और मैं !
तर्क की रस्साकस्सी में झूल रहा हूँ
मोह का मकड़ी जाल निर्मित कर
रास्ते अवरुद्ध कर रहा हूँ ...
सत्य जानता हूँ
मानने से कतराता हूँ
बेवजह सर पटकता हूँ !

सच है
अब इससे अधिक तुम मुझे क्या दोगे !
जब मैं उद्विग्न होता हूँ
तुम मेरा सर सहलाते हो
और मैं !
भयानक हकीकत के पन्ने नहीं बदल पाता!
यह अंगूठा -
कोई मांग रहा
या मैं खुद देने के अवसर तलाश रहा हूँ ?!?

4 comments:

ब्रजेश सिन्हा 16 फ़रवरी 2011 को 11:17 pm  

अत्यंत मार्मिक रचना ,एक सार्थक सन्देश देती हुई

मनोज पाण्डेय 16 फ़रवरी 2011 को 11:26 pm  

आचार्य द्रोण का अपने सच्चे शिष्य से अंगूठा दान में मागना इतिहास का सबसे बड़ा कलंक है और यही कलंक हमारी सभ्यता-संस्कृति पर एक बदनुमा दाग लगा चुका है, जिसे हम बार-बार आत्म मंथन करने के वाबजूद नहीं भुला पा रहे हैं , सुमन जी आपने बड़े ही तार्किक अंदाज़ में प्रस्तुत किया है , अच्छा लगा !

निर्मला कपिला 17 फ़रवरी 2011 को 10:30 am  

मनोज पाँण्डेय जी से सहमत हूँ। बहुत अच्छी लगी कविता। धन्यवाद।

सदा 17 फ़रवरी 2011 को 12:21 pm  

तुम इन्गित करते जा रहे
और मैं !
तर्क की रस्साकस्सी में झूल रहा हूँ

गहन भावों के साथ बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

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