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समर्पण

शनिवार, 19 फ़रवरी 2011


चाँद तारों की बात करते हो 
हवा का  रुख  बदलने की  
बात करते हो 
रोते बच्चों को जो हंसा दो 
तो मैं जानूँ |
मरने - मारने की बात करते हो 
अपनी ताकत पे यूँ इठलाते  हो  
गिरतों को तुम थाम लो 
तो मैं मानूँ |
जिंदगी यूँ तो हर पल बदलती है
अच्छे - बुरे एहसासों से गुजरती है  
किसी को अपना बना लो 
तो में मानूँ |
राह  से रोज़ तुम गुजरते हो 
बड़ी - बड़ी बातों  से दिल को हरते हो 
प्यार के दो बोल बोलके  तुम 
उसके चेहरे में रोनक ला दो 
तो मैं जानूँ |
अपनों के लिए तो हर कोई जीता है 
हर वक़्त दूसरा - दूसरा  कहता है |
दुसरे को भी गले से जो तुम लगा लो 
तो मैं मानूँ |
तू - तू , मैं - मैं तो हर कोई करता है 
खुद को साबित करने के लिए ही लड़ता है 
नफ़रत की इस दीवार को जो तुम ढहा दो 
तो मैं मानूँ |

6 comments:

रश्मि प्रभा... 19 फ़रवरी 2011 को 3:45 pm  

तू - तू , मैं - मैं तो हर कोई करता है
खुद को साबित करने के लिए ही लड़ता है
नफ़रत की इस दीवार को जो तुम ढहा दो
तो मैं मानूँ |
bahut sahi baat

मनोज पाण्डेय 19 फ़रवरी 2011 को 4:17 pm  

.बहुत अच्छी और प्रेरणा प्रद कविता के साथ प्रगतिशील ब्लॉग लेखक संघ में आपकी उपस्थिति अच्छी लगी , आपका स्वागत है इस सामूहिक ब्लॉग पर !

ब्रजेश सिन्हा 19 फ़रवरी 2011 को 5:10 pm  

अच्छी और प्रेरणा प्रद कविता !

संगीता स्वरुप ( गीत ) 19 फ़रवरी 2011 को 11:40 pm  

अच्छी अभिव्यक्ति ...कहने और करने में अन्तर को कहती हुई

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