प्रगतिशील ब्लॉग लेखक संघ. Blogger द्वारा संचालित.
प्रगतिशील ब्लॉग लेखक संघ एक अंतर्राष्ट्रीय मंच है जहां आपके प्रगतिशील विचारों को सामूहिक जनचेतना से सीधे जोड़ने हेतु हम पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं !

अमरीकी शासन तंत्र ने यहाँ वहाँ ढेर सारे निरंकुश राजाओं, सुल्तानों, खून के प्यासे अधिनायक, तानाशाहों, बेदिमाग दुस्साहसी सेनापतियों और हवा-हवाई किस्म क

रविवार, 27 मार्च 2011


विशेष - फै़ज़ अहमद फै़ज़

अविकसित देश के नाते भारत के सामने आज अनेक समस्याएँ हैं। समाज में विघटनकारी और साम्प्रदायिक ताकतें आक्रामक मुद्रा में हैं, देश का समूचासांस्कृतिक तानाबाना टूट गया है। दूसरी ओर अमरीकी साम्राज्यवाद के अनुयायी के रूप में हमारे शासकों ने काम करना आरंभ कर दिया है। ऐसी अवस्था में फ़ैज़ का नजरिया हमारे लिए रोशनी का काम दे सकता है। फैज के व्यक्तित्व में जो बाग़ीपन है उसका आधार है दुनिया की गुलामी, गरीबी, लोकतंत्र का अभाव और साम्राज्यवाद का वर्चस्वशाली चरित्र।


आज


तीसरी दुनिया की जनता के लिए, एशियाई, अफ्रीकी और लातीनी अमरीकी लोगों के लिए, कम से कम इनकी एक बड़ी आबादी के लिए, किसी को तत्काल डिकेंस के शब्द याद आ जाएँगे-‘वह बेहतरीन वक्त था, वह बदतरीन वक्त था।’ अपने दो-दो विश्वयुद्धों से थके हुए साम्राज्यवाद का कमजोर पड़ते जाना, सोवियत सीमाओं का विस्तार लेता और एकजुट होता समाजवादी खेमा, संयुक्त राष्ट्र संघ का जन्म, राष्ट्रीय स्वतंत्रता और सामाजिक मुक्ति के आंदोलनों का उदय और उनकी सफलताएँ, सभी कुछ एक साहसी नई दुनिया का वादा कर रहे थे जहाँ स्वतंत्रता, शांति और न्याय उपलब्ध हो सकता था, पर हमारी बदकिस्मती से ऐसा नहीं था।’


परमाणु हथियारों की दौड़ पर लिखा- ‘आणविक हथियारों के जिन्न को बंद बोतल से आजाद करते हुए अमरीका ने समाजवादी खेमे को भी ऐसा ही करने का आमंत्रण दे दिया। उस दिन से आज तक हमारी दुनिया की समूची सतह पर विनाश के डरावने साए की एक मोमी परत चढ़ी है और आज जितने खतरनाक तरीके से हमारे सामने दुनिया झूल रही है, उतनी पहले कभी न थी।’ राजनीति में इस जमाने को शीतयुद्ध के नाम से जानते हैं। इस जमाने में मुक्त विश्व का नारा दिया गया। मुक्त विश्व के साथ मुक्त बाजार और मुक्त सूचना प्रवाह को हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया। इसी के अगले चरण के रूप में नव्य उदारतावाद आया। मुक्त विश्व की धारणाओं का मीडिया से जमकर प्रचार किया गया। इसके पक्षधर हमारे बीच में अभी भी हैं और अहर्निश मुक्त विश्व और मुक्त बाजार की हिमायत करते रहते हैं। इसके बारे में फैज ने लिखा- ‘स्वतंत्र विश्व के नाम पर संभवतः हमारे इतिहास के घोर अयथार्थ ढोल नगाड़ों के शोर के साथ। अमरीकी शासन तंत्र ने यहाँ वहाँ ढेर सारे निरंकुश राजाओं, सुल्तानों, खून के प्यासे अधिनायक, तानाशाहों, बेदिमाग दुस्साहसी सेनापतियों और हवा-हवाई किस्म के राजनीतिज्ञों, जिस पर भी हाथ रख सकें, को सत्ता के सिंहासन पर बैठाने की कोशिशें की हैं और बैठाया भी है यह कार्रवाई वियतनाम से बड़ी बदनामी के बाद हुई अमरीकी विदाई के साथ कुछ वक्त के लिए रुक सी गई थी।


फिर


फ़ैज के अनुसार अविकसित देशों की पहली सांस्कृतिक समस्या है अपनी विध्वस्त राष्ट्रीय संस्कृतियों के मलबे से उन तत्वों को बचा कर निकालने की जो उनकी राष्ट्रीय पहचान का मूलाधार हैं, जिनका अधिक विकसित सामाजिक संरचनाओं की आवश्यकताओं के अनुसार समायोजन और अनुकूलन किया जा सके, और जो प्रगतिशील सामाजिक मूल्यों और प्रवृत्तियों को मजबूत बनाने और उन्हें बढ़ावा देने में मदद करें।
दूसरी समस्या है उन तत्वों को नकारने और तजने की जो पिछड़ी और पुरातन सामाजिक संरचनाओं का मूलाधार हैं, जो या तो सामाजिक संबंधों की और विकसित व्यवस्था से असंगत हैं या उसके विरुद्ध हैं, और जो अधिक विवेकवान, बुद्धिपूर्ण और मानवीय मूल्यों और प्रवृत्तियों की प्रगति में बाधा बनते हैं।


तीसरी समस्या है, आयातित विदेशी और पश्चिमी संस्कृतियों से उन तत्वों को स्वीकार और आत्मसात करने की जो राष्ट्रीय संस्कृति को उच्चतर तकनीकी, सौंदर्यशास्त्रीय और वैज्ञानिक मानकों तक ले जाने में सहायक हों, और चौथी समस्या है उन तत्वों का परित्याग करने की जो अधः पतन, अवनति और सामाजिक प्रतिक्रिया को सोद्देश्य बढ़ावा देने का काम करते हैं। ’फैज ने इन्हें नवीन’ सांस्कृतिक अनुकूलन, सम्मिलन और मुक्ति की समस्याओं के रूप में देखा।-

-जगदीश्वर चतुर्वेदी
रोनाल्ड रीगन के जमाने से हम अमरीकियों और उनके नस्लवादी साथियों को यहाँ-वहाँ भौंकते शिकारी कुत्तों की तरह इन तीन महाद्वीपों में बिखरे बारूद के ढेरों के आसपास देख रहे हैं।’ अमरीका द्वारा संचालित शीतयुद्ध और तीसरी दुनिया में स्वतंत्र सत्ताओं के उदय के साथ पैदा हुई परिस्थितियों ने समाज, साहित्य, संस्कृति और संस्कृतिकर्मियों को बड़े पैमाने पर प्रभावित किया है। इसके कारणों पर प्रकाश डालते हुए फैज ने लिखा है- ‘नए शोषक वर्ग और निरंकुश तानाशाही के उदय और वैयक्तिक और सामाजिक मुक्ति के सपनों के ढह जाने से युवापीढ़ी मोहभंग, सनकीपन और अविश्वास की विषाक्त चपेट में आ गई है। नतीजतन बहुत से युवा लेखक पश्चिमी विचारकों द्वारा प्रतिपादित किए जा रहे जीवित यथार्थ से रिश्ता तोड़ने, उसके मानवीय और शैक्षणिक पक्ष को अस्वीकार करने और लेखक की तमाम सामाजिक जिम्मेदारियों से मुक्त होने जैसे प्रतिक्रियावादी विचारों और सिद्धान्तों के प्रति आकर्षित हो रहे हैं। इन वैचारिक मठों और गढ़ों से रूपवाद, संरचनावाद, अभिव्यक्तिवाद और अब ‘लेखक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसे ऊपर से अत्यंत आकर्षक लगने वाले नारे की लगातार वकालत की जा रही है। इसका जाहिर उद्देश्य लेखक को अपनी सामाजिक, राजनैतिक, विचारधारात्मक प्रतिबद्धता से दूर करना है। इस सारे विभ्रम को विचारपूर्ण तरीकों से हटाने की जरूरत है। एक अन्य निबंध ‘अविकसित देशों की सांस्कृतिक समस्याएँ’ में फैज ने भारत जैसे अविकसित देशों की सांस्कृतिक समस्याओं पर रोशनी डालते हुए लिखा है कि इन देशों की बुनियादी समस्या है सांस्कृतिक एकीकरण की। इस प्रसंग में लिखा सांस्कृतिक एकीकरण, का अर्थ है-नीचे से ऊपर तक एकीकरण, जिसका अर्थ है विविध राष्ट्रीय सांस्कृतिक प्रतिरूपों को साझा वैचारिक और राष्ट्रीय आधार प्रदान करना और क्षैतिज एकीकरण जिसका अर्थ है अपने समूचे जनसमूह को एक से सांस्कृतिक और बौद्धिक स्तर तक ऊपर उठाना और शिक्षित करना। इसका मतलब यह है कि उपनिवेशवाद से आजादी तक के गुणात्मक परिवर्तन के पीछे-पीछे वैसा ही गुणात्मक परिवर्तन उस सामाजिक संरचना में होना चाहिए जिसे उपनिवेशवाद अपने पीछे छोड़ गया है। के संदर्भ में हमें 1983 के एफ्रो-एशियाई लेखक संघ की रजत जयंती के मौके पर उनके द्वारा दिए गए भाषण की याद आ रही है, यह भाषण बहुत ही महत्वपूर्ण है। जिन समस्याओं की ओर इस भाषण में ध्यान खींचा गया था वे आज भी राजनीति से लेकर संस्कृति तक प्रधान समस्याएँ बनी हुई हैं। फैज ने कहा था इस युग की दोप्रधान समस्याएँ हैं-उपनिवेशवाद और नस्लवाद। फैज ने कहा था ‘हमारा इस बात में दृढ़ विश्वास है कि साहित्य बहुत गहराई से मानवीय नियति के साथ जुड़ा है, क्योंकि स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सार्वभौमिकता के बिना साहित्य का विकास संभव नहीं है, उपनिवेशवाद और नस्लवाद का समूल नाश, साहित्य की सृजनात्मकता के संपूर्ण विकास के लिए बेहद जरुरी है।’ फैज ने इन समस्याओं पर ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में रोशनी डालते हुए लिखा ‘‘तमाम युद्धों के अंत की तरह, लड़े गए पहले महायुद्ध के बाद सामाजिक, नैतिक और साहित्यिक बुर्जुआ मान्यताओं और वर्जनाओं के टूटने और समृद्धि के एक संक्षिप्त दौर में विजेताओं के दिमाग में अहं का उन्माद उफनने लगा था। खुदा आसमान पर था और धरती पर सब कुछ मजे में चल रहा था। नतीजतन ज्यादातर पश्चिमी और कुछ उपनिवेशों के साहित्य ने उसे आदर्श के रूप में अपना लिया। बड़े पैमाने पर शुद्ध रूपवाद के आनंद का सम्मोहन, अहं केन्द्रित चेतना की रहस्यात्मकता से लगाव, रूमानी मिथकों और कल्पित आख्यानों के बहकावों के साथ ‘कला के लिए कला’ के उद्बोधक सौंदर्यशास्त्रियों द्वारा अभिकल्पित गजदंती मीनारों का निर्माण होने लगा।’’ हिन्दी में भी नई कविता के दौर में यही सब दिखाई देता है और रूपवादी शिल्प और कला के लिए कला का नारा भी दिया गया था। यह जमाना था 1951-52 का। साहित्य में प्रगतिशील आंदोलन की मीमांसा करते हुए फैज ने लिखा कि प्रगतिशील साहित्यांदोलन की प्रेरणा के दो बड़े कारक हैं, ‘पहली तो वह राजनैतिक प्रेरणा है जो इन्हें सोवियत समाजवादी क्रांति से मिली और दूसरे माक्र्सवादी विचारों से मिला विचारधारात्मक दिशा-निर्देश।’ आज भी अनेक बुद्धिजीवी हैं जो परमाणु हथियारों की दौड़ के घातक परिणामों से अनभिज्ञ हैं। इस दौड़ ने सोवियत संघ के समाजवादी ढाँचे को तबाह किया और शांति के बारे में जो ख़याल थे उन्हें नुकसान पहुँचाया। फैज इस फिनोमिना की परिणतियों पर नजर टिकाए हुए थे। द्वितीय विश्वयुद्धोत्तर दौर के बारे में उन्होंने लिखा, ‘युद्ध के बाद का हमारा समय, विराट अंतर्विरोधों से ग्रस्त हमारा युग, विजयोल्लास और त्रासदियों से भरा युग, उत्सवों से भरा और हृदयविदारक युग, बड़े सपनों और उनसे बड़ी कुण्ठाओं का जमाना।

1 comments:

akhtar khan akela 27 मार्च 2011 को 10:18 am  

baat hi kuchh or he jnab ke lekhn ki khub pdhne ko mila he urdu saahity men . akhtar khan akela kota rajsthan

एक टिप्पणी भेजें

About This Blog

भारतीय ब्लॉग्स का संपूर्ण मंच

join india

Blog Mandli

  © Blogger template The Professional Template II by Ourblogtemplates.com 2009

Back to TOP