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संसदीय लोकतंत्र के अंतर्विरोध

शुक्रवार, 4 मार्च 2011


बालिग मताधिकार पर आधारित भारत का संसदीय लोकतंत्र पांच दशकों के बाद भी अपने अंतर्विरोधों से, अपनी विकृतियों  से मुक्त नहीं हो पा रहा है. संसदीय संस्थाओं में अपराधियों और काला बाजारियों की बड़ी जमात हमारी नुमाईंदगी कर रही है. राजनीति एक मुनाफे का व्यवसाय बन गया है. अब यह सोचने का वक़्त आ गया है कि क्या हमारी लोकतान्त्रिक प्रणाली बालिग नहीं हो पायी है. अपने जन प्रतिनिधियों के चयन में हमसे चूक हो जा रही है..? या फिर हमारे मताधिकार की खरीद-फरोख्त या लूट हो रही है जिसका प्रतिरोध हम नहीं कर पा रहे हैं.
सच पूछें तो हमारे अन्दर उन नागरिक गुणों का विकास नहीं हो पाया है जो किसी भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था की ज़रूरी शर्त हैं. भारत एक धर्म प्रधान देश है और धर्म के अन्दर हर शासन  तंत्र के लिए नागरिक गुणों के विकास की प्रणाली बताई गयी है. गीता में ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोग की विस्तार से चर्चा की गयी है. यह तीनो योग तीन अलग-अलग शासन   प्रणालियों के लिए नागरिक गुणों के विकास का मार्ग प्रशस्त करते हैं .भक्तियोग  किसी अदृश्य शक्ति के सामने पूरी तरह समर्पित हो जाने की सीख देता है. इसमें किसी तर्क या सोच-विचार के लिए जगह नहीं होती. इसके अनुयायी राजतन्त्र के लिए आदर्श नागरिक हो सकते हैं क्योंकि जो अदृश्य शक्ति के सामने नतमस्तक हो सकता है वही राजा के सामने भी सर झुकाए खड़ा रह सकता है. वैसे भी राजनीति शास्त्र में राजा के दैवी अधिकार का सिद्धांत प्रचलित रहा है और राजा को धरती पर ईश्वर का प्रतिनिधि बताया गया है.
कर्मयोग कर्म किये जाने और फल की चिंता नहीं करने की शिक्षा देता है. इसका आचरण करने वाले की कार्यक्षमता विकसित होगी.वह साम्यवादी शासन व्यवस्था के लिए आदर्श गुणों से युक्त नागरिक होगा. ज्ञानयोग तर्क और विज्ञानं का योग है. यह आँख मूंदकर किसी बात को मान लेने की शिक्षा नहीं देता. हर चीज को ज्ञान-विज्ञानं की कसौटी पर कसने और संतुष्ट होने के बाद ही स्वीकार करने की मानसिकता तैयार  करता है. लोकतंत्र के लिए दरअसल इन्हीं गुणों से युक्त नागरिकों की ज़रूरत होती है. भारत के साथ विडंबना यह है कि यहां शासन व्यवस्था तो संसदीय लोकतंत्र की है लेकिन नागरिक गुणों को उत्पन्न करने का कारखाना राजतन्त्र के ज़माने वाला है. आबादी का बड़ा हिस्सा भक्तियोग का अनुयायी है.बात सिर्फ हिन्दू धर्म की नहीं सभी धर्मों के मानने वालों में शास्त्रों में निहित ज्ञान को समझने के प्रति कम और अदृश्य शक्ति की भक्ति में रूझान ज्यादा है. शायद यही भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना और सबसे बड़ा अंतर्विरोध है. जबतक लोकतंत्र के लिए अनुकूल नागरिक गुणों के विकास की प्रणाली नहीं विकसित होगी संसदीय लोकतंत्र का स्थापित हो पाना कठिन है.राजनीति के चिंतकों को इसपर विचार करने की ज़रूरत है.

-------देवेन्द्र गौतम

2 comments:

कौशलेन्द्र 4 मार्च 2011 को 10:05 pm  

लोक तांत्रिक व्यवस्था की आवश्यक शर्त है -लोक कल्याण के लिए जागरूक और प्रबुद्ध जनता .....पर हम लोग स्व कल्याण से आगे नहीं निकल पाए हैं ......कुछ लोग तो उतना भी नहीं कर पा रहे हैं. इस प्रणाली की असफलता का कारण केवल और केवल जनता है.

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