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बूढी आँखों में अश्कबारी है

रविवार, 28 अगस्त 2011

बूढी  आँखों में अश्कबारी  है
उसके बेटों  में जंग जारी  है

हक हुनर को अब मैं दिलाऊँगा 
मैंने किस्मत  नयी  संवारी  है

चश्मे -ए-बद दूर  दूर रहते  हैं 
माँ ने  मेरी  नज़र  उतारी  है   

उम्र  -  - नाजां  ग़ज़ब  है ऐसे
बस यही ​​इश्क़ की बीमारी  है

मौत टाली  है उसकी जान लेकर
जिंदगी जीत के भी हारी  है





1 comments:

Dr (Miss) Sharad Singh 29 अगस्त 2011 को 2:26 pm  

बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना....

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