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उमा की विफलता के बाद भी संघ गडकरी के पक्ष में

सोमवार, 19 मार्च 2012


हालांकि उत्तर प्रदेश में भाजपा की ओर से चुनावी कमान उमा भारती को सौंपने का राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी का निर्णय कारगर नहीं रहा, उसके बावजूद संघ अब भी यही चाहता है कि आगामी लोकसभा चुनाव उनके अध्यक्ष रहते ही हो। संघ इसी साल दिसंबर में उनका कार्यकाल समाप्त होने के बाद पुन: कमान सौंपने के मूड में है। हालांकि संघ की यह मंशा दिल्ली में बैठे कुछ दिग्गजों को रास नहीं आ रही, क्योंकि उन्हें अंदेशा है कि गडकरी ऐन वक्त पर प्रधानमंत्री पद की दावेदारी कर सकते हैं। इन दिग्गजों ने संगठन महामंत्री संजय जोशी को फिर से मौका दिए जाने पर भी ऐतराज जताया है।
अपन ने इसी कॉलम में लिख दिया था कि भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने उत्तरप्रदेश में कई दिग्गजों को हाशिये पर रख कर चुनाव की कमान उमा भारती को सौंप कर न केवल उनकी, अपितु अपनी भी प्रतिष्ठा दाव लगा दी है, फिर भी माना जा रहा है कि यदि उमा के प्रयासों से भाजपा को कोई खास सफलता नहीं मिली तो भी गडकरी का कुछ नहीं बिगड़ेगा।
असल में उमा को तरजीह दिए जाने से खफा नेता इसी बात का इंतजार कर रहे थे कि उत्तरप्रदेश का चुनाव परिणाम आने पर गडकरी को घेरा जाए। हाल ही जब नागपुर में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक में गडकरी को ही रिपीट करने की मंशा जताई गई तो दिग्गज भाजपा नेताओं अपनी असहमति जता दी। यही वजह रही कि इस मामले में फैसला सभी से चर्चा के बाद करने का निर्णय किया गया है।
वस्तुत: संघ यह नहीं मानता कि उत्तरप्रदेश में सफलता न मिलने की वजह उमा है। वह मानता है कि वहां आज भी जातीय समीकरणों की वजह से मतदाता केवल बसपा व सपा की पकड़ में है। हालांकि उमा को भी जातीय समीकरण के तहत कमान सौंपी गई, मगर मतदाता बसपा से सपा की ओर शिफ्ट हो गया है। यहां कि कांग्रेस के युवराज राहुल की धुंआधार सभाएं भी कुछ चमत्कार नहीं दिखा पाईं।
संघ आज भी गडकरी की कार्यशैली से संतुष्ठ है। हिन्दुत्व के लिए समर्पित संजय जोशी को तरजीह देने से हालांकि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी खफा हुए, इसके बावजूद संघ के कहने पर गडकरी ने उनको नजरअंदाज कर अपनी बहादुरी का प्रदर्शन किया है। संघ उनकी इसी कार्यशैली से खुश है। उनके पक्ष में ये बात जाती है कि उनके नेतृत्व में भाजपा ने बिहार में अच्छा प्रदर्शन किया। झारखंड में भाजपा की गठबंधन सरकार बनाने में कामयाबी हासिल की। भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे कर्नाटक के मुख्यमंत्री येदियुरप्पा को हटाने जैसा साहसिक कदम उठाया। जम्मू-कश्मीर विधानसभा में क्रॉस वोटिंग करने वाले विधायकों को बाहर का रास्ता दिखाया।
संघ की सोच है कि आगामी लोकसभा चुनाव लड़ाने के लिए गडकरी के अतिरिक्त किसी और पर आम सहमति बनाना कठिन है। उन बनी हुई आम सहमति को न तो संघ छेडऩा चाहता है और न ही किसी नए को बनवा कर रिस्क लेना चाहता है। सच तो ये है कि आगामी चुनाव के लिए गडकरी ने पूरी तैयारी शुरू कर दी है। सर्वे सहित प्रचार अभियान को हाईटैक तरीके से अंजाम देने की तैयारी है। यह सब संघ के इशारे पर हो रहा है।
वस्तुत: संघ को यह समझ में आ गया है कि भाजपा को हिंदूवादी पार्टी के रूप में ही आगे रखने से लाभ होगा। लचीला रुख अपनाने की वजह से वह न तो मुसलमानों को ठीक से आकर्षित कर पाई और न ही जातिवाद में फंसे हिंदू को ही लामबंद कर पाई। बहरहाल, अब देखना ये है कि दिग्गज नेताओं का विरोध गडकरी को रिपीट करने पर संघ को रोक पाता है या नहीं।

-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com

2 comments:

KrRahul 1 मई 2012 को 12:14 pm  

मुझे लगता है उत्तर प्रदेश में भाजपा ने काफी उन्नति की थी पर चुकी लोग मायावती को हटाने के लिए मुलायम के साथ जाने का मन बना चुके थे, उनके पास ज्यादा सीटें जीतने की गुन्जायिश नहीं थी.

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