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हाथी के दांत

शनिवार, 26 फ़रवरी 2011


साभार: बारिश की खुशबू
                       जी,सवाल सीधा सपाट उन लोंगों से है जिनके लिये जन-चिंतन वाग्विलास का साधन है. इस विषय को लेकर आप बस एक हुंकार भरिये और भीड़ से अलग थलग दिखिये इससे ज़्यादा इनकी और कोई मंशा नहीं. एक मित्र याद है कमसिनी ही कहूंगा कालेज के दौर की उम्र को जनवाद भाया सो वह मित्र मुझसे मिला. आकर्षित होना लाज़मी था एक आईकान की तलाश जो थी मुझे उसकी बातों में वक्तव्यों में लय थी, कोई बात किसी दूसरी बात के बीच असंगत न लगती थी. बेहतरीन कविता लिखता था . उस समय वो क्षेत्रीय राजनैतिक दलों की परिस्थितियां देख रहा था. जब  केवल दो पार्टी का बोलबाला था और आपतकाल के बाद सब जुड़े एक हुए थे .भारतीय सत्ता पर काबिज़ हुए थे. जीं हां, तभी की बात कर रहा हूं जब राजनारायण ने गुड़ चना खाने की सलाह दी थी . मेरा वो मित्र उस समय आज़ की स्थितियों का बयान कर रहा था. उसके वक्तव्य आम आदमी से इतना क़रीब होते कि मन कहता बस “इस युवक में ही भारत बसता है.”
        गंजीपुरा के साहू मोहल्ले वाली गली में हम लोग रूपनारायण जी के किराएदार थे. आगे बनी एक बिल्डिंग में मेरा वही मित्र रहता था.जो हमेशा व्यवस्था का विरोध किया करता था. कालेज में चल रहे प्रौढ़ साक्षरता अभियान से प्रेरित हो कर मैं भी मुफ़्त शिक्षा देने –घर पर बोर्ड लगा देख मेरी गली से गुज़रने वाले प्रोफ़ेसर महेश दत्त मिश्र रुके और बस वहीं उनसे भी जुड़ाव हुआ. हरदा टिमरनी के अलावा उनसे पारिवारिक जुड़ाव निकला सो बस अटूट रिश्ता कायम हुआ , प्रौढ़ साक्षरता अभियान से जुड़ाव ने उनका स्नेह पात्र बनाया दूसरी गोर्की की व्याख्या , लेनिन, आदि जो मेरे लिये अनूठी मूर्तियां थीं से जोड़ता रहा था मेरा वो मित्र. हालांकि टालस्टाय को पढ़ चुका था. जो मुफ़्त मे मिलता वो पढ़ ही लेता. बाक़ी प्यास मेरा वो मित्र  पूरी करता. इस बीच सृष्टिधर मुखर्जी दादा के पास भी कई बैठकें हुईं . मेरा च्वाइस सबसे मिलना और खूब  मिलना था साथ ही मिलने वाले के उनके अंतस के वैचारिक प्रवाह को समझना था जो आज़ भी है. ये एक प्रयोग ही था प्रयोग का हिस्सा बनके प्रयोग करना. न कि मुझे राजनीती लुभा रही थी न वे लोग जो खुद को का परिचय देने के साथ पदवी जोड़ते थे. मुझे खींच रहा था गांधी, लोहिया, लेनिन,परसाई (तब स्वस्थ्य थे). कुछ कविताएं लिख लेता था डिबेट जीत लेता तो ज़रूरी था मुकाम तक पहुंचने के लिये बहुत सी बातें मेरे मष्तिष्क में एकत्र रहें. सो इस सब के अलावा उस मित्र के सतत सम्पर्क में रहने की कोशिश करता, जिसकी पर्सनालिटी अनोखी थी. बड़ी-बड़ी गोल आंखैं इकहरा बदन, लम्बे हाथों पर लम्बी लम्बी अंगुलियां.सुन्दर हैण्डराइटिंग, मैं कामर्स का वो सायंस का था, सीनियर क्लास में था. राबर्टसन में. मैं डी०एन०जैन में फ़र्स्ट ईयर में. वो सिर्फ़ पढ़्ता था मैं कालेज के बाद ट्यूशनें करता था. दो पैसा कमाना उस समय की ज़रूरत थी.
धीरे धीरे उस मित्र की तस्वीर साफ़ होती चली गई. वो पूरी तरह शब्दों का व्यापारी नज़र आने लगा.एक दिन वो एक रिक्शे वाले को मातृ-भगिनी अलंकरण से अलंकृत करते दिखा. उसकी वो कविता मुझे याद आई
वो ग़रीब रिक्शेवाला
जो देह के गन्ने को
कर देता है हवाले
रोजी की चर्खी के
दिन भर मजूरी के बाद
जुगाड़्ता
दो जून की रोटी
ये अलग बात है
दारू की एक बाटल भी
मिल जाती है उसे  !!       
     वो आखिरी दिन था मेरे साथ आज तक गांधी, लोहिया, लेनिन,परसाई, राजनारायण,     
ज्ञानरंजन, सब हैं उसे छोड़ कर . 

5 comments:

कौशलेन्द्र 26 फ़रवरी 2011 को 8:53 pm  

ऐसे अवसरवादी लोग ही तो सबसे बड़े दुश्मन हैं देश और समाज के. अभी कुछ ही दिन पहले एक कविसम्मेलन में एक कवि की हैसियत से पहुंचे अकवि ने शोषण के विरोध में एक कविता सुनायी .........वाहवाही लूटी और अपनी कविता सुनाकर बीच में ही उठ कर चलते बने ....उन्हें वर्षों से जानता हूँ ...उनका काम है लोगों की कमियाँ खोजना और उन्हें ब्लैकमेल करना ...उनकी आय का सबसे प्रमुख साधन यही है.

ललित शर्मा 27 फ़रवरी 2011 को 10:47 am  

और सबको छोड़कर मेरे पास गिरीश बिल्लौरे हैं।

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