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सामूहिक ब्लॉग के मॉडरेटर अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का परित्याग करे !

शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011



ब्लॉगजगत की ताज़ा हलचलें  

मेरा फोटोमित्रों,
मैं मनोज पाण्डेय आज लेकर आया हूँ आप सभी के लिए ब्लॉगजगत की ताज़ा हलचलों में से उन प्रसंगों को, जिसने ब्लॉगजगत को एकबारगी आंदोलित कर दिया है !


पिछले दिनों लखनऊ ब्लॉगर असोसिएशन में उठापटक से क्षुब्ध होकर रवीन्द्र प्रभात जी  ने एल.बी.ए. के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया, उनके द्वारा रिक्त पद को भरने की कबायद शुरू हुयी और अंतत: रेखा श्रीवास्तव जी को अध्यक्ष पद सौंप दिया गया !

रवीन्द्र प्रभात जी के एल.बी. ए. अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद एल. बी. ए. में बिखंडन की स्थिति उत्पन्न हो गयी है और उससे जुड़े हुए पदाधिकारियों  की छुपी हुयी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा अब बाहर आने लगी है, जिसका परिणाम है ऑल इंडिया ब्लोगर असोसिएशन, उत्तर प्रदेश ब्लोगर असोसिएशनहिंदी ब्लॉगर्स फ़ोरम  आदि की स्थापना !

एक लंबी चुप्पी के बाद कल रवीन्द्र प्रभात जी का वक्तव्य आया परिकल्पना पर सामूहिक ब्लॉग को लेकर !

आईये सबसे पहले बात करते हैं परिकल्पना पर कल प्रकाशित रवीन्द्र प्रभात के आलेख की,विषय था :  आम पाठकों तक क्यों नहीं पहुँच पा रहा है ब्लॉग जगत ?

आईये सबसे पहले उन्हीं से पूछते हैं :

इसमें कोई संदेह नहीं कि आज ब्लॉग पर बाज़ार की नज़र है, भारत के लगभग ४५ करोड़ युवाओं की आवाज़ को संगठित करते हुए यदि ब्लॉगजगत से जोड़ने हेतु जबरदस्त मुहीम चलाई जाए तो निश्चित  रूप से हम हिंदी ब्लोगिंग के माध्यम से एक नयी क्रान्ति की प्रस्तावना कर सकते हैं  और इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है सामूहिक ब्लॉग !सामूहिक ब्लॉग के माध्यम से हम उनकी आवाज़ को समाज की प्रतिनिधि आवाज़ के तौर पर प्रस्तुत कर सकते हैं,बसर्ते कि सामूहिक ब्लॉग के मॉडरेटर अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का परित्याग करे !                 () रवीन्द्र प्रभात, हिंदी के प्रमुख ब्लॉग विश्लेषक एवं वरिष्ठ साहित्यकार

जी के अवधिया जी, जिन्हें हिंदी के प्रमुख ब्लॉग विचारक के रूप में मान्यता मिली हुयी है, आईये इस विषय पर जानते हैं उनकी राय, कि वे रवीन्द्र प्रभात जी की बातों से कितना इत्तेफाक रखते  हैं ?

My Photoयह व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा ही तो हिन्दी ब्लोग और आम पाठक के बीच सबसे बड़ा रोड़ा है, किन्तु दुःख की बात यह है कि इस महत्वाकांक्षा का त्याग करना किसी भी ब्लोगर, चाहे वह निजी ब्लोग का स्वामी हो या फिर सामूहिक ब्लोग का मॉडरेटर, के लिए बहुत ही कठिन साबित हो रहा है।ब्लोगर्स आम पाठकों की रुचि का ध्यान रख कर पोस्ट लिखते ही नहीं हैं क्योंकि आम पाठक साधारणतः टिप्पणी नहीं करता। हमारे ब्लोगर्स तो अन्य ब्लोगर्स को ही ध्यान में रखकर लिखते हैं क्योंकि उनसे उन्हें टिप्पणियाँ मिलती हैं।

चलिए इस विषय पर अब देश के प्रमुख विधि विशेषज्ञ ,वरिष्ठ ब्लॉगर तथा हमारी वाणी के मुख्य संपादक दिनेश राय द्विवेदी जी के विचारों  से रूबरू होते हैं :

My Photo सामुहिक ब्लागों का होना अच्छी बात है, लेकिन मेरा एक सुझाव है कि हर सामुहिक ब्लाग की एक प्रकाशन नीति होनी चाहिए। इस प्रकाशन नीति पर बीच-बीच में ब्लाग सदस्य विचार कर सकते हैं। इस के साथ ही ब्लाग पर पोस्ट को प्रकाशित करने की जिम्मेदारी किसी एक व्यक्ति की होनी चाहिए जिसे ब्लाग संपादक कहा जा सकता है। यह इस लिए आवश्यक है कि वह इस बात का ध्यान रखे कि ब्लाग पर जो भी पोस्ट जाए वह उस की निगाह से हो कर गुजरे और इस बात का ध्यान रखा जाए कि वह उस ब्लाग की नीति के अनुरूप हो।यदि ऐसा होता है तो सामुहिक ब्लाग कीर्तिमान स्थापित कर सकते हैं साथ ही एक नई दिशा समाज को भी प्रदान कर सकते हैं।

My Photoइसी विषय पर डा मोनिका शर्मा पूरी तरह रवीन्द्र जी की बातों से सहमति जता रही हैं :
सही बात है.... सार्थक मार्गदशन के साथ युवाओं को ब्लॉग्गिंग से जोड़ा जाये तो परिणाम बहुत सुखद हो सकते हैं.....




अब आईये देश के प्रमुख कार्टूनिष्ट काजल कुमार जी का क्या कहना है इस सन्दर्भ में ?

My Photoअभी बहुत से लोगों को पता ही नहीं है कि इंटरनेट पर अब आप भारतीय भाषाओं को प्रयोग बिना कुछ अतिरिक्त ख़र्च किए कर सकते है......हमारे एक वरिष्ठ हिन्दी—लेखक मित्र हैं, एक बार उनको मैंने ​अनजाने में ही नववर्ष की शुभकामनाएं इ—मेल से हिन्दी में लिख भेजीं.उनका जवाब आया कि भई हमें भी तो बताओ कि आपने इ—मेल में यह हिन्दी कैसी लिखी. वर्ना हम तो यूं ही रोमन शब्दों में हिन्दी इ—मेल लिखते हैं.तब से मैंने नियम बना लिया कि भले ही किसी को भी इ—मेल अंग्रेज़ी में ही क्यों न लिखूं, एक आध शब्द या वाक्य हिन्दी में ज़रूर घुसेड़ देता हूं.(पर राष्ट्रभाषा हिन्दी की झंडाबरदारी को लेकर कोई नारेबाज़ी नहीं) इसी का प्रताप है कि अधिकांश जानकार लौटती डाक से जानना चाहते हैं इंटरनेट पर हिन्दी के बारे में.

My Photoजबकि सुशील बाकलीवाल जी का इस विषय पर कुछ इसप्रकार कहना है :
रवीन्द्र जी के विचार तो सार्थक है, किन्तु बहुसंख्यक युवा वर्ग को उन सामूहिक ब्लाग पर लिखने के लिये प्रेरित करने का मार्ग भी तो तलाशना होगा ।


आज की ताज़ा खबर :

चलिए अब चलते हैं एक और समूह ब्लॉग नुक्कड़ की ओर,अभी-अभी जानकारी हुई है कि नुक्कड़ पर सुशील कुमार ने एक ऐसी पोस्ट प्रकाशित कर दी है,जिससे ब्लॉगजगत अचानक ही आंदोलित हो गया है ! खासकर उस पोस्ट से नुक्कड़ ब्लॉग के संचालक  अविनाश वाचस्पति ज्यादा उत्तेजित हैं,हालांकि उनकी उत्तेजना जायज है ये मैं नहीं कह रहा हूँ पूरा ब्लॉगजगत कह रहा है, आईये आप भी देखिये : 


नेट पर साहित्य को अभी मानक मिलने में काफ़ी समय लगने की संभावना है क्योंकि साहित्य के पुरोधाओं ने इसे अब तक द्वितीय पंक्ति की चीज मान रखा है और जरुरत के मुताबिक इसका इस्तेमाल किया गया है। यहां केवल वे लोग अक्सर देखे जाते हैं जिनको सरप्लस समय है। सरप्लस पूंजी का उपयोग कर वे संभ्रांत जन में अपना प्रभाव जमाने के लिये इसका उपयोग-उपभोग करते हैं। इसलिये जो नेट पर समर्पित होकर काम कर रहे हैं, उन्हें यहां  निराशा भी  हाथ लगती है। यहाँ चीजे first hand नहीं आतीं। पूर्णिमा वर्मन हो या सुमन कुमार घई जी  ,  इनको साहित्य की अद्यावधि गतिविधियों की जानकारियाँ नहीं रहती। इनकी दुनिया नेट पर संकुचित हो गयी है। हालाकि नेट पर इनके काम काफ़ी सराहनीय है पर यह इस जगह की ही विडम्बना है। अविनाश वाचस्पति जी को ही ले लीजिये, नेट पर समय देने को तैयार हैं अपनी स्वास्थ्य खराब करके भी , पर यह मुगालता पाल रखा है  सर जी ने कि हिन्दी पर बहुत अच्छा काम नेट में हो रहा है।जितने भी अप्रवासी वेबसाईट हैं सब मात्र हिन्दी के नाम पर अब तक प्रिंट में किये गये काम को ही ढोते  रहे हैं, वे स्वयं कोई नया और पहचान पैदा करने वाला काम नहीं कर  रहे , न  कर सकते क्योंकि वह उनके कूबत से बाहर है। () सुशील कुमार, नुक्कड़ के सहयोगी
इस पोस्ट की व्यापक प्रतिक्रया हो रही है


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इस विषय पर लोकप्रिय ब्लॉग उड़न तश्तरी के ब्लोगर समीर लाल समीर का कहना है कि :यह चर्चा का विषय है, इससे पूर्णतः सहमत नहीं हुआ जा सकता, जबकि उच्चारण ब्लॉग के स्वामी और चर्चा मंच के मॉडरेटर डा. रूप चन्द्र शास्त्री मयंक का मानना है कि : अब साहित्यकारों को अपना दृष्टिकोण बदलना होगा,क्योंकि ब्लॉगिंग अब बहुत लोकप्रिय होती जा रही है!

मेरा फोटोइस विषय पर रवीन्द्र प्रभात का कहना है कि :हर  समाज की अपनी भाषा और संस्कृति होती है और हर भाषा का अपना साहित्य होता है। हिन्दी भाषा का भी अपना साहित्य और समाज है। कहना न होगा यह समाज और इसका साहित्य अत्यंत समृद्ध रहा है। आधुनिक समय में मीडिया, विज्ञापन, पत्रकारिता और सिनेमा ने हिंदी भाषा, साहित्य और संस्कृति की भूमि को उर्वर बनाने में महत्त्वपूर्ण योगदान किया है। ब्लाग या चिट्ठा इसी विकास की दुनिया का नवीनतम माध्यम है और ब्लागिंग या चिट्ठाकारिता लेखन या मीडिया की नई विधा।

अंतरजाल की गहराईयों में गहरे उतरकर तो देखिये, अनगिनत साहित्य रुपी मोती आपको प्राप्त हो जायेंगे,किताब या पत्रिका की तुलना में इसकी पहुँच अधिक और तेज होने के कारण यह कई मामलों में पुराने मीडिया माध्यमों से बेहतर है।


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इस विषय पर काजल कुमार मानते हैं कि  "पश्चिम  में आज,​ प्रिंट का स्थान बड़ी तेज़ी से e-books ले रही हैं. हमारे यहां भी सभी लेखक, अपने लेखन में कंप्यूटर का प्रयोग करते हैं. तो फिर वे ये उम्मीद कैसे पाले बैठे हैं कि वे लिखेंगे तो कंप्यूटर पर उनका लिखा लोग पढ़ेंगे केवल छपा हुआ. यह कबूतर का, बिल्ली आते देख आंखें मूंद लेने जैसा नहीं है !आज जो पाठक छपी किताब ख़रीद कर पढ़ता है, उसकी जेब में मोबाइल भी होता है. लेकिन उसे अपने मोबाइल की संभावनाएं अभी पता नहीं हैं, बस. आज जो मोबाइल आ रहे हैं वे इंटरनेट व भारतीय-भाषा-सक्षम मोबाइल हैं. मोबाइल की ही क़ीमत में, किताबें पढ़ने के​ लिए टैबलेट आने लगी हैं जो किताब के साइज़ की ही हैं. बस चार दिन की बात है...जैसे आज हर कोई मोबाइल लिए घूमता है कल इसका प्रयोग पढ़ने के लिए भी करता भी मिलेगा. आने वाले इस कल की, एक बानगी तो आज हवाई यात्राओं में भी देखी जा सकती है.बेचारे तथाकथित किताबी लेखक माने बैठे हैं कि कंप्यूटर पर अच्छा माल नहीं डाला जाता और, ये भी कि इंटरनेट पर सब फ़्री ही होता है. शायद वे मानने को तैयार नहीं कि किताबों के नाम पर भी खूब कूड़ा छपता है दूसरे, अभी इन्हें पता नहीं कि इंटरनेट पर सबकुछ फ्री नहीं है. यहां भी, ढंग का माल डाउनलोड करने में माल ख़र्च होता है. इनकी छपी जयादातर किताबें आज भी लाइब्रेरियों में धकियायी जाती हैं. कल जब वह गली भी बहुत संकरी होने लगेगी तब ये संभ्रांतवाद की ग़तलफ़हमी में जीने वाली जनता सच में ही कंप्यूटर की ओर दौड़ी फिरेगी...!"

जबकि वरिष्ठ ब्लोगर और व्यंग्यकार अविनाश वाचस्पति जी  के तेवर कुछ ज्यादा आक्रामक है, आप भी देखिये :

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पहली पंक्ति साफ जाहिर कर रही है कि नेट पर साहित्‍य को मानक मिलेगा। फिर मात्र सात दस वर्ष के शिशु से आप यह अपेक्षा क्‍यों कर रहे हैं कि वो सिर्फ इतनी अल्‍पावधि में शिखर पर सवार हो जाए। जिन्‍हें आप साहित्‍य का पुरोधा कह रहे हैं वे असलियत में पुरोधा तो हैं ही नहीं, पुरोधा तो कई सौ वर्ष पहले बीत गए हैं। अब जो हैं, वे सिर्फ क्रोधा हैं, मन में झांक लेंगे, तो सही आंक लेंगे। इसे द्वितीय पंक्ति की चीज मानना, दूसरे नंबर पर स्‍वीकार करना है। मतलब जरा सी चूक से वे अपनी पहली पंक्ति गंवा बैठेंगे। यही भय काफी है, पहली पंक्ति वालों के लिए और वो भी दूसरी पंक्ति वालों से, क्‍योंकि पहली पंक्ति वाले सिर्फ इस्‍तेमाल करना जानते हैं, इससे अधिक कुछ नहीं। सरप्‍लस समय वाले नहीं, धुन के धनी मौजूद हैं यहां पर, धन के धनी क्‍या गुल खिला रहे हैं, यह प्रिय भाई सुशील भली भांति जानते हैं। संभ्रांत जन पर प्रभाव जमाने वाली बात सिरे से ही भ्रांति से लबालब है क्‍योंकि ऐसा नहीं हो रहा है कि लोग हजारों लाखों करोड़ों व्‍यय करके, महंगे आलीशान सभागारों में मंत्रियों, साहित्‍य के पुरोधाओं को बुलाकर उनकी चापलूसी करने में निमग्‍न हैं और न ही स्‍वयं के खर्च से पुस्‍तकों, संग्रहों का प्रकाशन करके, उनकी समीक्षाएं लिखवाकर, लोकार्पण करवाकर, आत्‍म मुग्‍धता में रमे हुए हैं।
और अब ताज़ा पोस्ट झलकियाँ

आज बस इतना ही, इजाजत दीजिये....फुर्सत मिली तो अगले हप्ते फिर मुलाक़ात होगी ......आपका मनोज पाण्डेय



20 comments:

रवीन्द्र प्रभात 18 फ़रवरी 2011 को 2:28 pm  

चर्चा का नया और नायाब तरीका अच्छा लगा, बधाई पाण्डेय जी !

ब्रजेश सिन्हा 18 फ़रवरी 2011 को 2:31 pm  

क्या बात है पाण्डेय जी,अब तो आप ब्लॉगजगत पर नज़र भी रखना शुरू कर दिए, देखिये आगे-आगे होता है क्या ?

मनोज पाण्डेय 18 फ़रवरी 2011 को 2:46 pm  

फुर्सत मिली तो हप्ते में मुलाक़ात होगी ......

सदा 18 फ़रवरी 2011 को 3:19 pm  

बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

गीतेश 18 फ़रवरी 2011 को 5:00 pm  

उम्दा चर्चा, बधाईयाँ !

निर्मला कपिला 18 फ़रवरी 2011 को 6:31 pm  

सामूहिक ब्लाग लेखन पर मै दिवेदी जी की बात से सहमत हूँ क्यों कि पहले भी देखा है कई बार वहाँ एक पोस्ट भी नही होती कई बार कई कई पोस्ट्स एक ही बार मे आ जाती हैं जिन सब को पढना और उन पर टिप्पणे3ए करना सम्भव नही हो पाता। या तो सदस्यों के लिये दिन निश्चित किये जायें या फिर किसी एक को सम्पादित करने की जिम्मेदारी। जिस से उस ब्लाग का लेखन नियमित चलता रहे जैसे की वटवृ़ का चल रहा है। चर्चा का न्या स्टाईल अच्छा लगा। आभार।

DR. ANWER JAMAL 18 फ़रवरी 2011 को 9:19 pm  
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
DR. ANWER JAMAL 18 फ़रवरी 2011 को 9:23 pm  

@ भाई मनोज पाण्डेय जी ! रवींद्र जी ने अपना पद छोड़ दिया , यह उनकी मर्ज़ी थी .
एल बी ए में कोई विखंडन की हालत अभी तक तो है नहीं. आप खामख्वाह अफवाह उड़ाकर ज़रूर अपनी यह ख्वाहिश जता रहे हैं कि आप
एल बी ए में विखंडन देखना चाहते हैं.
१- ऑल इंडिया ब्लागेस असोसिअशन बनाई है खुद भाई सलीम खान ने .
२-उत्तर प्रदेश ब्लागेर्स एसोसिअशन बनाई है भाई हरीश जी ने और उसका प्रचार भी भाई सलीम खान की मर्जी से एल बी ए पर ही किया जा रहा है .
इसे आप फूट कहेंगे या फिर प्यार की बेनजीर मिसाल जो किआप को हज़म नहीं हो रही है. भाई हरीश के ब्लाग का एक सदस्य मैं खुद भी हूँ .
३- हिंदी ब्लागर्स फोरम इंटरनेश्नल को मालिक के फ़ज़ल से मैंने वुजूद बख्शा है और मैं एल बी ए का कोई पदाधिकारी नहीं हूँ जैसा कि आप झूठ बोलकर यहाँ भ्रम फैला रहे हैं.
खुद आपका यह 'प्रगतिशील ब्लाग लेखक संघ' एल बी ए की तथाकथित उठा पटख का नतीजा है और इसी का नाम आपने लिखा नहीं.
अब यह भी देख लीजिये कि आपका ब्लाग तो आपने नाम को भी सार्थक करने में नाकाम है . आपके ब्लाग पर पुराणों कि कहानियाँ लिखने वाले लेखक भी पुराण कथा लिखते रहते हैं .
क्या प्रगतिशील लेखक यह सब करते हैं ?
आप ब्लाग लिखें , हिंदी और हिन्दुस्तान कि सेवा करें लेकिन अपने दिल के छाले न फोड़ें और दूसरों पर कीचड़ न उछालें, ख़ासकर मुझ पर.
यह आपकी पहली ग़लती है इसलिए प्यार से समझा रहा हूँ वरना सारी प्रगतिशीलता मूलाधार चक्र के पास समाहित कर दी जाएगी.
आपने अनायास ही हिंदी ब्लागर्स फोरम इंटरनेश्नल का प्रचार किया , इसके लिए आपका धन्यवाद.
आप यह टिपण्णी पब्लिश न भी करेंगे तो मैं खुद ही इसे मंज़रे आम पर ले आऊंगा .

Mithilesh dubey 18 फ़रवरी 2011 को 11:28 pm  

मैं तो मनोज जी के टिप्पणी को बचकानी हरकत मानता हूँ, लखनऊ ब्लोगर असोसिएशन पर किसी का किसी से किसी तरह का मनमुटाव नहीं है । मनोज जी आपको कुछ भी लिखने से पहले मामले के गहराई तक जाना चाहिए तभी कुछ लिखना चाहिए । रविन्द्र प्रभात जी ने खुद अध्यक्ष पद छोड़ा था , आपको रविन्द्र जी के उस पोस्ट को भी पढ़ लेना चाहिए था जो उन्होने पद छोड़ने से पहले एलबीए पर लगाया था । वहां उन्होनें साफ तौर पर इलबीए के साथ निभने की कही थी पद छोड़ने के बावजूद । रही बात अन्य सामूहिक ब्लोग बनने की तो आपको जानकर हैरानी होगी जब हमें उत्तर प्रदेश ब्लोगर असोसिएसन बनाया था तो उसपर पहली पोस्ट ऐलबीए के संयोजक सलीम भाई की थी ।

मनोज पाण्डेय 18 फ़रवरी 2011 को 11:36 pm  

भाई अनवर जमाल साहब,
आपके इस स्पष्टीकरण से मैं संतुष्ट हूँ , एल बी ए में उठापटक नहीं है तो ये अच्छी बात है, होना भी नहीं चाहिए ! सब एक साथ मेल मिलाप से रहे इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है
आप शालीनता के साथ पेश आये हैं इसलिए आपका स्वागत है इस ब्लॉग पर , किन्तु आपसे मेरी गुजारीश है कि यदि आप अपनी ऊर्जा को सकारात्मक कार्यों में लगाएं तो इस ब्लॉगजगत को उंचाईयों पर ले जा सकते हैं !

प्रगतिशील ब्लॉग लेखक संघ पर क्या प्रकाशित हो और क्या न हो यह आने वाले समय में इससे जुड़े लेखक स्वयं तय कर लेंगे, आपको इसकी चिंता करने की जरूरत नहीं है, सुझाव के लिए धन्यवाद !

एस.एम.मासूम 19 फ़रवरी 2011 को 12:24 am  

किसी भी साझा ब्लॉग की कामयाबी उसके मेम्बर्स पे निर्भर किया करती है ना की उसके किसी पदाधिकारी पर . वैसे भी साझा ब्लॉग मैं पद बाँटना भी एक छलावा है. संयोजक को ही सारी ज़िम्मेदारी उठाने चाहिए और साझा ब्लॉग का मकसद भी साफ़ होना चाहिए. ठीक उसी प्रकार ब्लॉग विश्लेषण भी एक ऐसा फरेब है जो अधिकतर जाती फाएदे को ध्यान मैं रख के किया जाता रहा है
.
कुछ इधर की कुछ उधर की
शारीरिक संबंधों को सहमती देनी
जौनपुर शिराज़ ए हिंद भाग १

मनोज पाण्डेय 19 फ़रवरी 2011 को 8:50 am  

मासूम साहब,
आपने सही कहा है कि साझा ब्लॉग में पद बांटना एक छालाबा है , मैं सहमत हूँ .....रहा ब्लॉग विश्लेषण की बात तो मैं आपकी बातों से इत्तेफाक नहीं रखता ! यह पूरा ब्लॉगजगत जानता है कि वर्ष-२००७ से लगातार रविन्द्र प्रभात जी के द्वारा यह विश्लेषण किया जा रहा है और उनके विश्लेषण को बरिष्ठ ब्लोगर इज्जत अफजाई करते हैं ! जिसकी चर्चा नहीं होगी वह नाराज होगा ही , यह प्रकृति का नियम है ! आज भी वे ब्लॉगजगत के एकलौते ब्लॉग विश्लेषक हैं, जिन्हें आपत्ति है वे ब्लॉग विश्लेषण का जिम्मा ले सकते हैं, क्योंकि यह तो खुला मंच है आप कोई भी किरदार निभाने को स्वतंत्र हैं मासूम साहब !


और हाँ मिथलेश जी,
आपका प्रतिउत्तर अनवर जमाल साहब को दिए गए प्रतिउत्तर में ही समाहित है !

पूर्णिमा 19 फ़रवरी 2011 को 12:27 pm  

बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

अशोक कुमार पाण्डेय 19 फ़रवरी 2011 को 4:38 pm  

भाई मैं भी इस दुनिया में हूं और लम्बे समय से सब देख रहा हूं…मुझे लगता है कि एक माध्यम के रूप में अपार संभावना वाला यह क्षेत्र प्रिंट मीडिया की सारी ग़लाज़त सीखता जा रहा है जबकि उसकी अच्छी चीज़ें सीखने में किसी की कोई रुचि नहीं दिखती। यह कोई विधा नहीं माध्यम है। इस पर भी बहुत अच्छी चीज़ें हैं और कूड़ा भी…एक पाठक को 'सार-सार को गहि रहै' वाली नीति अपनानी चाहिये…चाहे ब्लाग हो या प्रिण्ट!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) 19 फ़रवरी 2011 को 5:16 pm  

पोस्ट को पढ्कर मंथन करने में लगा हूँ!

एस.एम.मासूम 19 फ़रवरी 2011 को 11:27 pm  

मनोज पाण्डेय @ मैं अपनी बात को फिर से दोहरा रहा हूँ की 'ब्लॉग विश्लेषण भी एक ऐसा फरेब है जो अधिकतर जाती फाएदे को ध्यान मैं रख के किया जाता रहा है"
क्या अब भी आप नहीं समझे? की कुछ तो कहीं देखा है? और भाई मैं नाम जब न लिया करूँ तो आप को भी यह अधिकार नहीं की किसी न नाम लें.

डा० अमर कुमार 20 फ़रवरी 2011 को 3:14 am  


मनोज जी, इधर कुछ दिनों से मैं नेट पर अनियमित हूँ इसलिये आपका आलेख मेरे लिये बहुत उपयोगी निकला । इस पोस्ट के सभी लिंक खँगाल आया और एक नये तरह के निरर्थक चिल्ल-पों से परिचित हुआ ।
इस ब्लॉग को बनाने की आपकी परिकल्पना बहुत ही अच्छी है, बशर्ते यह परिभाषित हो सके कि ब्लॉग सँयोजक के नज़रिये से प्रगतिशील ब्लॉगलेखन के मापदँड क्या हैं ? इसे आक्षेप के रूप में न लें, बल्कि सुझाव के रूप में लें, इससे भविष्य में आगे आसानी रहेगी । शुभकामनायें !

मनोज पाण्डेय 20 फ़रवरी 2011 को 8:11 am  

मासूम भाई , यदि आपका अभिप्राय कुछ ब्लॉग पर नियमित होने वाली चिट्ठा चर्चा या ब्लॉग चर्चा से है तो मैं सहमत हूँ , क्योंकि ब्लॉग विश्लेषण अत्यंत व्यापक और विस्तृत मामला है !
आदरणीय अमर कुमार जी, आप हिंदी ब्लॉगजगत के पुराने और अनुभवी योद्धा हैं आप इस ब्लॉग पर आये मैं धन्य हो गया ! आपके सुझाव मेरे लिए कीमती है, आपका आभार !

कौशलेन्द्र 23 फ़रवरी 2011 को 11:34 pm  

भाई मनोज पाण्डेय जी ! मैं यह सब क्या पढ़ रहा हूँ ? मन में क्लेश हो रहा है ........मैं कुछ दिन और प्रतीक्षा करूंगा ......और इसके बाद निर्णय करूंगा कि मुझे कहाँ रहना है ........साहित्य के मंच पर यह सब ......? मैं अपनी ऊर्जा को व्यर्थ जाया करने के पक्ष में बिलकुल भी नहीं हूँ. लखनऊ अपनी तहजीब और नजाकत के लिए मशहूर है. बहुत तकलीफ हो रही है आज . मैं लड़ाई भी लड़ता हूँ तो उसका एक स्तर होता है........एक मर्यादा होती है. मैं जहां भी रहता हूँ वहां शालीनता होनी चाहिए. जहां शालीनता नहीं वहां मैं भी नहीं. मैं अपनी छोटी सी दुनिया में ही ठीक हूँ.

काजल कुमार Kajal Kumar 27 नवंबर 2011 को 9:17 am  

आह मैं इस पोस्ट को पढ़ने में कुछ महीने लेट हो गया. :)

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