प्रगतिशील ब्लॉग लेखक संघ. Blogger द्वारा संचालित.
प्रगतिशील ब्लॉग लेखक संघ एक अंतर्राष्ट्रीय मंच है जहां आपके प्रगतिशील विचारों को सामूहिक जनचेतना से सीधे जोड़ने हेतु हम पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं !

तुम्हारे वो गीत याद है मुझे.......(सत्यम शिवम)

मंगलवार, 22 फ़रवरी 2011

जब कभी सुनता हूँ वो गीत याद आने लगती हो तुम।उस गीत से जुड़ी है तुम्हारी यादें।साधारण सा इक गीत बस तुम्हारी होंठों का स्पर्श पाकर इक विशिष्ट सा हो गया था मेरे लिए।जमाने के लिए वो गीत होगा कोई मधुर संगीत सा पर मेरे लिए तो वो प्राण श्वासों से निकलने वाला जीवन संगीत था।जो हर पल मेरी धड़कनों के संग प्रवाहीत होकर मेरे वजूद का तुम्हारे प्रीत की लय पर समर्पित होना बताता था।जब कभी सुनता हूँ कही भी,किसी वक्त सारा माहौल बिल्कुल बदल जाता है और इक अदृश्य सी सुनहरी चादर ओढ़े तुम्हारी यादें मुझे अपने आगोश में लेने लगती है और सपनों की दुनिया में खड़ी कही तुम किसी परी सी अपने पास बुलाती हो।मै दौड़ा दौड़ा जाता हूँ तुम्हारे पास और जब तुम्हे छूने की सारी कोशिशे व्यर्थ हो जाती है,तभी जाग जाता हूँ निंद से।


संगीत से सनी गीत में कैद तुम्हारी यादें मेरे लिए प्रेम रस में डुबे वैसे गीत है,जिसे एक बार सुनने के बाद बार बार उसे ही सुनने को जी करता है।उस गीत से होती मेरी सुबह और मेरी शाम।उस गीत पे मानों लिखी हो हमारे प्रीत के सुनहरे गुजरे दिनों के नाम।वो गीत मानों मेरी रुह से समा जाती हो हौले से मेरे जेहनोदिल में और पुकारती हो मुझे "आ जाओ ना तुम"।


मन करता फिर खींच लाऊँ उन पलों को अतीत से और तुम्हें दुल्हन बना ले आऊँ अब तो।पर मेरी विवशता तब एहसास कराती है,उस गीत का होना....पर तुम्हारे ना होने का।

आज तुम नहीं हो,पर दो बोल तुम्हारे गीतों के याद है मुझे।जिसे मैने बड़ी संजीदगी से छुपा लिया था उस रात जब तुमने इन्हें गुनगुनाया था।तुम गाती थी और मै खो जाता था कही।उस वक्त पता नहीं चला कि न जाने कितना सम्मोहन था तुम्हारे उन गीतों में,जो अब से कई सालों बाद भी इक अनोखी डोर में बाँध कर रखेगा मुझे।शायद वही है वो दिल के तार जिनसे इन गीतों का मधुर स्वर तुम्हारे पास से मेरे पास आ जाता है कभी कभी।


गीत की हर पंक्ति पूछती है शायद मुझसे,कि क्या अब तुम्हें मन नहीं करता फिर से उन दिनों में लौटने को।पर बेचारे इन गीतों को क्या पता है हम इंसानों की लाचारी।हमारे विवशता को तो बस रात के सुनसान सन्नाटे और जिंदगी के खामोश सफर ही समझ सकते है।इन गीतों को क्या पता मौन का एकाकीपन।

काश कोई समझ सकता इस मौन की चुप्पी के पीछे का रहस्य।क्यों बोले वो,कितना बुलाया,कई बार आवाज लगाया।कितने दिनों तक लगातार तुम्हें पुकारता रहा,पर जब उसे विश्वास हो गया अब तो सब व्यर्थ है।हो गया शांत और रहने लगा मौन।


तुम्हारे वो गीत पूछते है मुझसे "आ जाओ ना,मै कब से राह देख रही हूँ"।पर तुम कहा कहती हो अब आने के लिए।काश कभी ऐसा होता उन गीतों से होकर तुम्हारी कही कुछ बातें भी मेरे कानों को छुकर निकल जाती।तब तो जीवन का मेरा संगीत पूर्णरुपेण और सार्थक हो पाता।तुम अपने उन गीतों से कभी मेरे पास आती और कुछ बातें कर फिर लौट जाती।

शायद उस वक्त जब मै अपने जीवन के अंतिम पलों में जी रहा होऊँगा।तुम्हारे ये गीत मुझे फिर लौटने को कहेंगे गुजरे दिनों में।थोड़ा दुख तो होगा पर इक संतुष्टि होगी मुझे मरने के बाद ही सही पर,उस क्षण गीत के संग उसके उस गायक से भी मुलाकात हो जायेगी मेरी।छोड़ गया था जो मुझे मेरे जीवन के सफर में तन्हा मुझे और मै तुम्हे भर लूँगा बाहों में और एक गुजारिश मेरे दिल की तब भी तुमसे होगी "सुनाओ ना वो गीत फिर से एक बार" और तुम फिर से कई सदियों पुरानी वो अपने प्यार का राग छेड़ देती और आँखों से आँसू बरसने लगते तुम्हारे और गला भी भर जाता और वो गीत तुम्हारी भर्रायी हुई आवाज में मानों इस जमाने से कहता "हमने अपना प्यार पा लिया,मर के ही तो क्या हुआ.....पर जिंदगी तो मिल गई ना............। 



2 comments:

वन्दना 22 फ़रवरी 2011 को 4:18 pm  

अपने साथ बहा ले गये…………भावो का सुन्दर सम्प्रेक्षण्।

रवीन्द्र प्रभात 22 फ़रवरी 2011 को 4:21 pm  

इस खुबसूरत भाव के लिए बधाईयाँ !

एक टिप्पणी भेजें

About This Blog

भारतीय ब्लॉग्स का संपूर्ण मंच

join india

Blog Mandli

  © Blogger template The Professional Template II by Ourblogtemplates.com 2009

Back to TOP