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फुरुषोत्तम

मंगलवार, 22 फ़रवरी 2011


http://www.davidchess.com/pictures/sims2_a/Jane_dreaming.jpg

किस किस को सोचिए किस किस को रोइए
आराम बड़ी चीज है ,मुंह ढँक के सोइए ....!!
"जीवन के सम्पूर्ण सत्य को अर्थों में संजोए इन पंक्ति के निर्माता को मेरा विनत प्रणाम ...!!''




आपको नहीं लगता कि जो लोग फुर्सत में रहने के आदि हैं वे परम पिता परमेश्वर का सानिध्य सहज ही पाए हुए होते हैं। ईश्वर से साक्षात्कार के लिए चाहिए तपस्या जैसी क्रिया उसके लिए ज़रूरी है वक़्त आज किसके पास है वक़्त पूरा समय प्रात: जागने से सोने तक जीवन भर हमारा दिमाग,शरीर,और दिल जाने किस गुन्ताड़े में बिजी होता है। परमपिता परमेश्वर से साक्षात्कार का समय किसके पास है...?

लेकिन कुछ लोगों के पास समय विपुल मात्रा में उपलब्ध होता है समाधिष्ठ होने का ।
इस के लिए आपको एक पौराणिक कथा सुनाता हूँ ध्यान से सुनिए
एकदा -नहीं वन्स अपान अ टाइम न ऐसे भी नहीं हाँ ऐसे
"कुछ दिनों पहले की ही बात है नए युग के सूत जी वन में अपने सद शिष्यों को जीवन के सार से परिचित करा रहे थे नेट पर विक्की पेडिया से सर्चित पाठ्य सामग्री के सन्दर्भों सहित जानकारी दे रहे थे " सो हुआ यूँ कि शौनकादी मुनियों ने पूछा -"हे ऋषिवर,इस कलयुग में का सारभूत तत्व क्या है.....?

ऋषिवर:-"फुर्सत"

मुनिगण:- "कैसे ?"
ऋषिवर :- फुरसत या फुर्सत जीवन का एक ऐसा तत्व है जिसकी तलाश में महाकवि गुलजार की व्यथा से आप परिचित ही हैं आपने उनके गीत "दिल ढूँढता फ़िर वही " का कईयों बार पाठ किया है .
मुनिगण:- हाँ,ऋषिवर सत्य है, तभी एक मुनि बोल पड़े "अर्थात पप्पू डांस इस वज़ह से नहीं कर सका क्योंकि उसे फुरसत नहीं मिली और लोगों ने उसे गा गाकर अपमानित किया जा रहा है ...?"
ऋषिवर:-"बड़े ही विपुल ज्ञान का भण्डार भरा है आपके मष्तिस्क में सत्य है फुर्सत के अभाव में पप्पू नृत्य न सीख सका और उसके नृत्य न सीखने के कारण यह गीत उपजा है संवेदन शील कवि की कलम से लेकिन ज्यों ही पप्पू को फुरसत मिलेगी डांस सीखेगा तथा हमेशा की तरह पप्पू पास हो जाएगा सब चीख चीख के कहेंगे कि-"पप्पू ....!! पास होगया ......"

मुनिगण:-ये अफसर प्रजाति के लोग फुरसत में मिलतें है .... अक्सर ...........?

ऋषिवर:-" हाँ, ये वे लोग हैं जिनको पूर्व जन्म के कर्मों के फलस्वरूप फुरसत का वर विधाता ने दिया है
मुनिगण:-"लेकिन इन लोगों की व्यस्तता के सम्बन्ध में भी काफी सुनने को मिलता है ?
ऋषिवर:-"इसे भ्रम कहा जा सकता है मुनिवर सच तो यह है कि इस प्रजाति के जीव व्यस्त होने का विज्ञापन कर फुरसत में होतें है, "

मुनिगण:-कैसे...? तनिक विस्तार से कहें ऋषिवर

ऋषिवर:-"भाई किससे मिलना है किससे नहीं कौन उपयोगी है कौन अनुपयोगी इस बात की सुविज्ञता के लिए इनको विधाता नें विशेष गुण दिया है वरदान स्वरुप इनकी घ्राण-शक्ति युधिष्ठिर के अनुचर से भी तीव्र होती है मुनिवर कक्ष के बाहर खडा द्वारपाल इनको जो कागज़ लाकर देता है उसे पड़कर नहीं सूंघ कर अनुमान लगातें हैं कि इस आगंतुक के लिए फुरसत के समय में से समय देना है या नहीं ? "

मुनिगण:-वाह गुरुदेव वाह आपने तो परम ज्ञान दे ही दिया ये बताएं कि क्या कोई फुरसत में रहने के रास्ते खोज लेता है सहजता से ...?

कुछ ही क्षणों उपरांत सारे मुनि कोई न कोई बहाना बना के सटक लिए फुरसत पा गए और बन गए ""फ़ुरुषोत्तम -जीव "

गुरुदेव सूत जी ने एकांत में मुनियों से फुरसत पा कर वृक्षों को जो कहा वो कुछ इस तरह था
फुर्सत और उत्तम शब्द के संयोजन से प्रसूता यह शब्द आत्म कल्याण के लिए बेहद आवश्यक और तात्विक-अर्थ लेकर धरातल पर जन्मां है आज यानी 18 दिसम्बर 2011 को इस शब्द का जन्मदिन जो नर नारी पूरी फुर्सत से मनाएंगें वे स्वर्ग में सीधे इन्द्र के बगल वाली कुर्सी पर विराजेंगे । इस पर शिवानन्द स्वामी एक आरती तैयार करने जा रहें हैं आप यदि कवि गुन से लबालब हैं तो आरती लिख लीजिए अंत में लिखना ज़रूरी होगा :

कहत "शिवानन्द स्वामी जपत हरा हर स्वामी " पंक्ति का होना ज़रूरी है।

6 comments:

रवीन्द्र प्रभात 22 फ़रवरी 2011 को 1:20 pm  

आपके कहने का अंदाज़ कुछ अलग है गिरीश भाई , आज के दौर पर सटीक व्यंग्य के लिए बधाईयाँ !

मनोज पाण्डेय 22 फ़रवरी 2011 को 2:02 pm  

बहुत सुन्दर और चिंतन को मजबूर करता हुआ आलेख, अच्छा लगा !

ब्रजेश सिन्हा 22 फ़रवरी 2011 को 3:18 pm  

इस आलेख में गज़ब का आकर्षण है , सुन्दर और लालित्यपूर्ण भाषा के प्रयोग हेतु आपका आभार ....!

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" 22 फ़रवरी 2011 को 3:50 pm  

वैसे देखा जाय तो हमारे देश का लगभग ९० प्रतिशत लोग फुरुशोत्तम हैं ... इस बात का सबूत है "क्रिकेट" ...
जिस देश में यह खेल इतनी ज्यादा प्रसिद्धि प्राप्त कर चुकी हो ... उस देश की जनता के पास फुर्सत का भण्डार नहीं होगा तो और किसके पास होगा ...
आप अपने चारो तरफ देख लीजिए ... जैसे ही कोई क्रिकेट मैच शुरू होता है ... लोग बाग सारे काम धंदे छोड़कर रेडियो और टीवी से ऐसे चिपक जाते हैं जैसे कि गुड से मक्खी ...
हजारों लोग दफ्तर से छुट्टी लेकर क्रिकेट देखने लगते हैं ... छात्र स्कूल/कॉलेज से भागकर क्रिकेट देखते हैं ... गृहिणियां घर बार भूलकर और बच्चे पढाई भूलकर बस क्रिकेटग्रस्त रोगी बन जाते हैं ...
हमसे ज्यादा फुर्सत में कोई नहीं है ... कोई हो भी नहीं सकता है ...

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