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व्यवस्था का नाभिनाल बना काला धन

गुरुवार, 17 मार्च 2011


  आजकल काले धन को लेकर जो चिंताएं जताई जा रही हैं उनका कुछ औचित्य समझ में नहीं आ रहा है.काला धन तो मौजूदा व्यवस्था का प्राणवायु है. इसके बगैर तो कुछ हो ही नहीं सकता. जिन्दगी की गाड़ी बढ़ ही नहीं सकती. राजनैतिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक तमाम गतिविधियां काले धन के सहयोग से ही संचालित होती हैं. वर्षो पूर्व बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री डा.जगन्नाथ मिश्र ने एक साक्षात्कार के दौरान खुले तौर पर कहा था कि "करप्सन इज ए पार्ट ऑफ़ आवर नेशनल लाइफ". यह बात पूरी तरह सत्य साबित हो रही है. राजनीति के क्षेत्र में देखें तो एक पार्टी के संचालन में करोड़ों का खर्च आता है. यह पैसा क्या मजदूरी करके लाया जाता है...? जाहिर तौर पर चंदे से आता है. यह चंदा देता कौन है? क्या 50  प्रतिशत से ज्यादा गरीबी रेखा से नीचे की आबादी का वहन करने वाली भारतीय जनता. बेरोजगारी का दंश झेलता युवा वर्ग.... अपनी अस्मिता तलाशती महिलाएं.... कुपोषण के शिकार बच्चे या फिर उपेक्षा को अपनी नियति में चुके सीनियर सिटिज़न....? जाहिर है कि दो नंबर का व्यवसाय करने वाले लोग अपने काले धन का एक हिस्सा राजनेताओं को देकर एक मौन समझौता करते हैं.सत्ता में आने के बाद उनके अवैध धंधों को संरक्षण और नए आर्थिक स्रोतों के दरवाज़े खोलने में मदद. वे चंदा देकर राजनेताओं के समक्ष  चारा डालते हैं.   एक चुनाव लड़ने में करोड़ों का खर्च किया जाता है. यह पैसा इसी तरह के स्रोतों से आता है. चुनाव आयोग ने भी उम्मीदवारों के खर्च की एक सीमा तय कर दी है. एक आम समाजसेवक के पास चुनाव लड़ने का न्यूनतम निर्धारित खर्च भी कहां से आता है. यह न कोई बताता है न कोई पूछता है. एक धरना या प्रदर्शन जैसे कार्यक्रम में भी लाखों का  खर्च आता है. यह पैसा भी काले बाज़ार से ही तो आता है. सच यही है कि काले धन के बिना राजनीति नहीं हो सकती. सांस्कृतिक  गतिविधियों का संचालन भी म्हणत मजदूरी के पैसों से संभव नहीं है. इसके लिए भी काले धन के किसी प्रायोजक की ज़रुरत पड़ती है. इसके बिना कोई बड़ा आयोजन नहीं हो सकता. कोई सामाजिक आयोजन भी इसके बिना नहीं हो सकता. यदि बेटी कि शादी करनी है तो लाख-डेढ़ लाख तो टेंट वाला ही ले लेगा. पांच-दस लाख तो किधर घुस जायेंगा पता भी नहीं चलेगा. बच्चे कि छाती से लेकर मुंडन तक, उसकी शिक्षा से लेकर भरण-पोषण तक. हर कदम पर पैसे की ज़रुरत पड़ेगी. इसलिए नौकरी-पेशा लोग रिश्वत के रस्ते तलाशते हैं. व्यवसायी मिलावट का धंधा करते हैं. अफसरों की मिलीभगत से अवैध कमी करते हैं. काले धन के बिना समाज में अपनी प्रतिष्ठा बचाना मुश्किल होता है. धर्मकर्म भी खर्चीला शगल है. एक निम्न मध्यवर्ग का व्यक्ति अपनी सामान्य कमाई से वह ईश भक्ति भी नहीं कर सकता. सछ पूछें तो मासिक बज़ट के बाहर का कोई भी खर्च ऊपरी कमाई के बिना संभव नहीं. फिर काले धन को लाकर इतनी चिंता किसलिए. विपक्ष विदेशी बैंकों में जमा भारतीय काला धन की वापसी के लिए और इस दिशा में सर्कार की उदासीनता को लेकर उग्र हो रहा है. आखिर खरबों-ख़राब की इस राशि को विदेश में रखने की ज़रूरत क्यों पड़ी. हमारी प्रणाली में ही तो कहीं इसके कारण नहीं मौजूद नहीं. यह राशि ज़बरन लाना संभव नहीं दिखता. यदि एक खास प्रतिशत कर जमाकर देश के बैंकों में उसे जमा करने का प्रस्ताव दिया जाये और उनके स्रोत पर पर कोई सवाल न पूछने का आश्वासन दिया जाये तो शायद विदेशी बैंकों के देशी खाताधारी उसे खुद ही वापस ले आयें. वरना एक दूसरे के विरुद्ध आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति का यह मात्र एक हथियार बना रहेगा. काला धन के समाजशास्त्र को समझने और उसके अनुरूप रणनीति बनाकर उसे बाज़ार में लाने की ज़रूरत है.

-----देवेन्द्र गौतम

1 comments:

Dinesh pareek 17 मार्च 2011 को 9:55 am  

आपका ब्लॉग पसंद आया....इस उम्मीद में की आगे भी ऐसे ही रचनाये पड़ने को मिलेंगी

कभी फुर्सत मिले तो नाचीज़ की दहलीज़ पर भी आयें-
http://vangaydinesh.blogspot.com/

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