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संगठन की कमान अब भी संघ के हाथों में है

शनिवार, 2 अप्रैल 2011

यानि कि वसुंधरा राजे को फ्री हैंड तो नहीं दिया गया है
हालांकि यह सही है कि भाजपा हाईकमान के पास पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का कोई तोड़ नहीं, इस कारण मजबूरी में उन्हें फिर से विधानसभा में विपक्ष का नेता बनाना पड़ा, मगर उनकी विरोधी लॉबी भी चुप नहीं बैठी है, यही वजह है कि संगठन में वसुंधरा लॉबी को नजरअंदाज कर यह साबित कर दिया गया है कि पार्टी दोनों के बीच संतुलन बैठा कर ही चलना चाहती है।

उल्लेखनीय है कि लम्बी जद्दोजहद के बाद जब वसुंधरा को फिर से विपक्ष नेता बनाया गया तो उन्हें राजस्थान से रुखसत करने का सपना देख रहे भाजपा नेताओं के सीनों पर सांप लौटने लगे थे। रही सही कसर वसुंधरा के तेवरों ने कर दी। सब जानते हैं कि वसुंधरा किस प्रकार आंधी की माफिक पूरे राज्य में छा जाने की तैयारी कर रही हैं। ऐसे में विरोधी लॉबी ने हाईकमान पर दबाव बनाना शुरू कर दिया कि चलो विधायक दल में बहुमत भले ही वसुंधरा के पास हो, मगर संगठन में तो उनको तवज्जो दी ही जा सकती है। असल में इसी विरोधी लॉबी के कारण ही भाजपा की कुछ सीटें खराब हुई थीं और वसुंधरा राजे दुबारा सरकार बनाने में नाकमयाब हो गईं। भले ही भाजपाई इस तथ्य को स्वीकार न करें, मगर मन ही मन वे जानते हैं कि प्रदेश की कितनी सीटों पर संघ और भाजपा के बीच टकराव की नौबत आई थी। वसुंधरा लॉबी तो चाहती ही ये थी कि वे फिर राजस्थान का रुख न करें, मगर एक तो अंतर्विरोध के बावजूद काफी संख्या में भाजपा विधायक जीत कर आ गए, दूसरा अधिसंख्य विधायक वसुंधरा खेमे के ही थे। इस कारण वसुंधरा का पलड़ा भारी हो गया। सब जानते हैं कि हाईकमान पार्टी की दुर्दशा के लिए मूल रूप से वसुंधरा राजे के साथ पार्टी में आई नई अपसंस्कृति को ही दोषी मानता था, इस कारण उसने सबसे पहले वसुध्ंारा पर इस्तीफे का दबाव बनाया। वसुंधरा को कितना जोर आया पद छोडऩे में, यह भी किसी से छिपा हुआ नहीं है। वे जानती थीं कि ऐसा करके हाईकमान उनसे राजस्थान छुड़वाना चाहता है। इसी कारण बड़े ही मार्मिक शब्दों में कहती थीं कि वे राजस्थान वासियों के प्रेम को भूल नहीं सकतीं और आजन्म राजस्थान की ही सेवा करना चाहती हैं। वे अपने दर्द का बखान इस रूप में भी करती थीं कि उनकी मां विजयाराजे ने भाजपा को सींच कर बड़ा किया है, उसी पार्टी में उन्हें बेगाना कैसे किया जा रहा है। उनका इशारा साफ तौर पर उन दिनों की ओर था, जब भाजपा काफी कमजोर थी और विजयराजे ही पार्टी की सबसे बड़ी फाइनेंसर थीं। अटल बिहारी वाजपेयी व लाल कृष्ण आडवाणी से कंधे से कंधा मिला कर उन्होंने पार्टी को खड़ा किया था।

बहरहाल, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष अरुण चतुर्वेदी ने जिस तरह संगठन के विस्तार में वसुंधरा लॉबी को दरकिनार किया है, उससे साफ संकेत मिलता है कि हाईकमान वसुंधरा विरोधियों को भी पूरी तवज्जो देना चाहता है, ताकि वह आगे चल कर वसुंधरा के हाथों पूरी तरह से ब्लैकमेल न होता रहे। हाईकमान समझता है कि जो महिला विधायकों की ताकत के दम पर उसको लोकतंत्र व बहुमत का उपदेश दे कर बगावत के स्तर पर टकराव मोल ले सकती है, आगामी विधानसभा चुनाव में टिकटों के बंटवारे के वक्त भी भिड़ सकती है। ऐसे में हाईकमान के ही इशारे पर प्रदेश अध्यक्ष चतुर्वेदी ने अपने पत्ते खोले हैं। संगठन में किस तरह वसुंधरा विरोधियों को चुन-चुन कर स्थान दिया गया है, इसका एक उदाहरण ही काफी है कि गुर्जर आंदोलन के दौरान वसुंधरा के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले प्रहलाद गुंजल को प्रदेश उपाध्यक्ष बनाया गया है। समझा जाता है कि ऐसा इसलिए भी किया गया है कि ताकि आगामी विधानसभा चुनाव के वक्त दोनों गुटों के नेगोसिएशन की नौबत आए और दोनो पर ही दबाव रहे कि वे नेगोसिएशन के बाद बनाए गए प्रत्याशियों के लिए एकजुट हो कर काम करें। हाईकमान पिछले अनुभव से भी सबक सीख रहा है कि वसुध्ंारा को फ्री हैंड देने व संघ को अपेक्षित सीटें नहीं देने के कारण टकराव हुआ और भाजपा सत्ता में आने से वंचित रह गई। हाईकमान यह भी अच्छी तरह से समझता है कि वसुंधरा के चक्कर में संघ को कमतर आंका गया तो वह पार्टी की जमीन ही खिसका सकता है। कुल मिला कर संगठन में हुए विस्तार से यह साबित हो गया है कि विधायकों की ताकत के कारण भले ही वसुंधरा पावर में हैं, मगर संगठन में अब भी संघ की ही चल रही है। ऐसे में केवल वसुंधरा के सहारे ही टिकट हासिल करने की सोच रखने वालों की आशाओं पर पानी फिर गया है। उन्हें संगठन के नेताओं के आगे भी नतमस्तक होना पड़ेगा।
-तेजवानी गिरधर, अजमेर

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