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एक कत्ता

रविवार, 10 अप्रैल 2011


(जंतर-मंतर के नाम)

दो कदम पीछे हटे हैं वो अभी 
एक कदम आगे निकलने के लिए.
ये सियासत का ही एक अंदाज़ है 
झुक गए हैं और तनने के लिए.

-----देवेंद्र गौतम  

6 comments:

वन्दना अवस्थी दुबे 10 अप्रैल 2011 को 12:32 pm  

बहुत सुन्दर कता है. सियासत में झुकना भी कूटनीति का ही एक हिस्सा है.

रेखा श्रीवास्तव 10 अप्रैल 2011 को 2:43 pm  

वे तनने के लिए झुके हों तो भी क्या? अगर जन एक बार जाग्रत हुआ तो फिर अंजाम कुछ न कुछ निकलेगा ही और वो वक्त के अँधेरे में है. बहुत सटीक लिखा है. इन्तजार है कल का ......

Kajal Kumar 10 अप्रैल 2011 को 3:26 pm  

वाह बहुत बढ़िया लिखा है आपने. सही बात है कि लड़ाईयां न तो यूं ही जीती जाती हैं न ही यूं हारी जाती हैं...लंबा बहुत लंबा रास्ता बाक़ी है अभी

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