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साप्ताहिक ब्लाग वार्ता

सोमवार, 11 अप्रैल 2011


 आकांक्षा यादव ने अन्ना हजारे के आंदोलन पर कुछ सवाल खड़े किये है अपने ब्लाग शब्द-शिखर पर
आजकल अन्ना हजारे चर्चा में हैं और साथ ही भ्रष्टाचार और जन लोकपाल को लेकर उनका अभियान भी. चारों तरफ अन्ना के गुणगान हो रहे हैं, कोई उन्हें गाँधी बता रहा है तो कोई जे.पी. कोई कैंडल-मार्च निकाल रहा है तो कोई उनके पक्ष में धरने पर बैठा है. राजनेता से लेकर अभिनेता तक, मीडिया से लेकर युवा वर्ग तक हर कोई अन्ना के साथ खड़ा नजर आना चाहता है. 
अन्य देशों में हुए आंदोलनों को देखकर इस भ्रम में रहने वाले कि अन्ना के इस आन्दोलन के बाद भारत में भी क्रांति आ जाएगी, क्या अपनी अंतरात्मा पर हाथ रखकर बता सकेंगें कि वो जब मतदान करते हैं, तो किन आधारों पर करते हैं. चंद लोगों को छोड़ दें तो अधिकतर लोग अपनी जाति-धर्म-परिचय-राजनैतिक दल जैसे आधारों पर ही मतदान करते हैं. उनके लिए एक सीधा-साधा ईमानदार व्यक्ति किसी काम का नहीं होता, आखिरकार वह उनके लिए थाने-कोर्ट में पैरवी नहीं कर सकता, किसी दबंग से लोहा नहीं ले सकता या उन्हें किसी भी रूप में उपकृत नहीं कर सकता. जिस मीडिया के लोग आज अन्ना के आन्दोलन को धार दे रहे हैं, यही लोग उन्हीं लोगों के लिए पेड-न्यूज छापते हैं और उन्हें विभिन्न समितियों के सदस्य और मंत्री बनाने के लिए लाबिंग करते हैं, जिनके प्रेरित होकर गांधीगिरी करते हैं, कभी दूसरे से. याद रखिये दूसरों की हाँ में हाँ मिलाकर और मौका देखकर भीड़ का हिस्सा बन जाने से न कोई क्रांति आती है और न कोई जनांदोलन खड़ा होता है. इसके लिए जरुरी है कि लोग स्वत: स्फूर्त प्रेरित हों और वास्तविक व्यवहार में वैसा ही आचरण करें. जिस दिन हम अपनी अंतरात्मा से ऐसा सोच लेंगें उस दिन हमें किसी बाहरी रौशनी (कैंडल) की जरुरत नहीं पड़ेगी
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जबकि प्रगतिशील ब्लाग लेखक संघ पर प्रकाशित “चार दिन बनाम चालीस साल” आलेख में देवेंद्र गौतम की उक्ति “इस घटना ने जनतंत्र में तंत्र पर जन की पकड़ को मज़बूत किया है.यह भ्रष्टतंत्र के खिलाफ जनतंत्र की जंग के शुरूआत है. अभी कई मरहले पार करने हैं. कई अवरोध हटाने हैं. जनमानस में नै आशाओं का संचार हुआ है. अन्ना हजारे के नेतृत्व में  एक सकारात्मक बदलाव की ओर कारवां निकल पड़ा है. अहिंसक लड़ाई की इस जीत से बन्दूक की नली से सत्ता की उत्पत्ति का इंतजार करने वाले लोगों को भी कुछ सबक लेनी चाहिए.     पठन योग्य एवम उल्लेखनीय कही जा सकती है
अविनाश वाचस्पति ब्लाग पर अविनाश जी का चिंतन देखिये
ॐ जै भ्रष्टाचार हरे
मैं भ्रष्टाचार  महान ।
 मुझे क्या कर पायेगा अन्ना हजारे परेशान।
जादू की छड़ी हूं।
मजबूती से खड़ी हूं।
मुझे न हिला सके कोई भूकंप, न कोई सुनामी, चाहे कहते रहो उसे कुनामी।
मैं भी ऐसा शिष्टाचार, जिससे बढ़कर नहीं कोई व्यवहार, न कोई त्योहार।
त्योहार पर भी मेरे से ही सधता है त्योहार।
 आप कहते हैं गिफ्ट,
पर वहां पर होता हूं मैं शिफ्ट।
नहीं बनी कोई ऐसी की, जो कर सके मुझे डिलीट,
 मैं हूं ऐसा इलीट। बजा देता हूं ईमानदारी की ईंट से ईंट।
चाहे कितनी हो मजबूत ईंटों की भीत।
सबके भीतर चला जाता है।
सबको लुभाता है।
मोहक हूं। काला हूं तो क्या हुआ, हूं तो धन ही ।
देश का बैंक नहीं तो विदेश का ही सही।
वहां अधिक सुरक्षित हूं।
सफल हूं, उन्नत हूं, उपजाऊं हूं,
सबके मन को भाऊं हूं।
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डा० मोनिका शर्मा अपने ब्लाग “परवाज़ …शब्दों के पंख” पर महिलाऒं की सेहत को लेकर चिंतित होकर सूचित करतीं हैं-“हमारे घरों में हालात कुछ ऐसे हैं की उनसे कोई पूछता नहीं और वे किसी को बताती नहीं। महिलाएं अपनी शारीरिक और मानसिक तकलीफों के बारे में खुलकर बात नहीं कर पाती। नतीजतन उन्हें न तो सही समय पर इलाज मिल पाता है और न ही सलाह। देश के ग्रामीण इलाकों में तो स्थितियां और भी बदतर हैं । वहां तो जागरुकता की आज भी इतनी कमी है कि महिलाएं कई बार शारीरिक और मानसिक विकारों के इलाज के लिए नीम हकीमों में उलझ जाती..है। 
चाहे गांव हो या शहर ऐसे कई किस्से आपको सुनने, जानने को मिल जायेंगें कि जब तक महिलाएं डॉक्टर पास इलाज के लिए आती हैं तब तक ज्यादातर मामलों में बीमारी काफी बढ चुकी होती है। जिसकी सबसे बड़ी वजह जानकारी की कमी और पारिवारिक सहयोग का अभाव है। आज भी अनगिनत औरतों के साथ उनके पति हिंसात्मक व्यवहार करते हैं । यहां इस विषय में बात इसलिए कर रही हूं क्योंकि घरेलू हिंसा महिला स्वास्थ्य से एक जुड़ा अंतरंग पहलू है। चारदीवारी के भीतर महिलाओं के साथ होने वाला यह बर्ताव उन्हें सामाजिक, राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर सशक्त बनाने की सारी कवायदों को तो बेमानी साबित करता ही है उन्हें कई तरह की मनोवैज्ञानिक बीमारियों की ओर भी धकेलता है।
 
मिसफ़िट पर गिरीष बिल्लोरे, लाल बवाल ब्लाग पर बवाल इस सप्ताह जबलपुर आए डा० कुमार विश्वास के मंचीय हथकंडों से दु:खी नज़र आए. इन ब्लाग्स पर “अपने कार्यक्रम के दौरान कुमार विश्वास ने जो मंचीय अपराध किये वे ये रहे  
1.          मध्य-प्रदेश के माननीय विधान-सभा अध्यक्ष मान० ईश्वर दास जी रोहाणी के आगमन पर अपमान जनक टिप्पणी 
2.           श्री अलबेला खत्री जी का नाम आयोजकों पर दवाब डाल के कार्ड से हटवाया. और जब वे उड़ीसा के लम्बे सफ़र के बाद जबलपुर में कार्यक्रम स्थल पर पहुंचे तो उनको "अभद्रता पूर्वक "अलबेला अलबेला का संबोधन करना.
3.           टीनएज़र्स की तालियाँ बटोरने के चक्कर में वरिष्ठ नेताओं, साहित्यकारों, शिक्षकों एवं कलाप्रेमियों की खिल्लियाँ उड़ाना कविकर्म कदापि कहीं हो सकता... निश्चित रूप से ये किसी के माँ- बाप तो नहीं सिखाते फिर किसके दिए संस्कारों का विकृत स्वरूप कहा जाएगा. 
4.          भारतीय प्रेम को पाश्चात्य सेक्स से तुलना करने वाला रटा हुया जुमला
5.          इटारसी म०प्र० के कवि राजेंद्र मालवीय की कविता को अपने साथ हुई घटना के रूप में व्यक्त करना
6.          वयोवृद्ध  श्रीयुत रोहाणी जी के समक्ष स्वल्पहार रखते समय अभद्रता पूर्वक कटाक्ष करना. 
7.          उनके प्रस्थान के समय अभद्रता पूर्वक इशारे  करना.
जबकि बवाल केवल एक शेर में सारी बात कह गये :-

कटाक्षे-आज़म डॉ. कुमार विश्वास जी के जबलपुर में कार्यक्रम पर उनके सम्मान में...........

बे‍अदबज़बानी, लम्पटता के क़ब्ज़े में ही आलम था !
वो साबुत लौट के इसकर गए, के सब्र हमारा कायम था !!
”पाठकों ने भी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है बकौल विजय तिवारी “किसलय”:- “संस्कारों का सन्देश देने वाली संस्कारधानी जबलपुर में विगत ७ मार्च को एक कमउम्र और ओछी अक्ल के बड़बोले लड़के ने असाहित्यिक उत्पात से जबलपुर के प्रबुद्ध वर्ग और नारी शक्ति को पीड़ित कर स्वयं को शर्मसार करते हुए माँ सरस्वती की प्रदत्त प्रतिभा का भी दुरूपयोग किया है. टीनएज़र्स की तालियाँ बटोरने के चक्कर में वरिष्ठ नेताओं, साहित्यकारों, शिक्षकों एवं कलाप्रेमियों की खिल्लियाँ उड़ाना कविकर्म कदापि कहीं हो सकता... निश्चित रूप से ये किसी के माँ- बाप तो नहीं सिखाते फिर किसके दिए संस्कारों का विकृत स्वरूप कहा जाएगा.  
इन ब्लाग्स के पते हैं:-
ज़ील ब्लाग पर डा० दिव्या श्रीवास्तव पूनम जी से  दो प्रश्न करतीं हैं --
              एक:-क्या खिलाड़ियों को इतनी तुच्छ मानसिकता का समझा की वो इस घिनौनी पेशकश से खुश होंगे ? विश्व विजेताओं के पास एक खूबसूरत परिवार और शुभचिंतक मित्र होते हैं जिनके साथ वे अपनी खुशियाँ बांटते हैं।
              दो:-२८ वर्षों बाद मिलने वाली जीत पर निर्वस्त्र होना गवारा है , लेकिन क्या ४२ वर्षों बाद भ्रष्टाचार से मुक्ति जो अन्ना हजारे दिलायेंगे , उसके लिए भी वो निर्वस्त्र होना पसंद करेंगी जहाँ करोड़ों देशभक्तों की भीड़ है और एक ७३ वर्षीय वृद्ध देश की खुशहाली के लिए , निस्वार्थ भाव से , अपनी सेहत के साथ समझौता करके , भूखा प्यासा , भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रहा है ?
(जील ब्लाग का पता :-“ http://zealzen.blogspot.com/2011/04/blog-post_09.html” )
रश्मि प्रभा जी के “मेरी भावनाएं ” ब्लाग पर एक कविता  मातृत्व कुल का मान
कल्पना परिकल्पना के ब्रह्ममुहूर्त का कलरव
वर्तमान परिवेश में
कर्ण जल से अभिषेक करने को उद्दत
शांत मौन पवन
कर्ण का नया रूप
कुंती से अलग अस्तित्व लिए
खुद में परिपूर्ण !
वरदान और कवच की मांग
अब मुमकिन नहीं
कर्ण को नहीं रही ज़रूरत
क्षत्रियता के प्रमाण की
सूतपुत्र कर्ण
राधे के प्यार से प्रस्फुटित
अपनी रगों की ताकत का अभिषेक
सूर्यरश्मियों से कर रहा है ...
अचंभित है कुंती
कर्ण के परिवर्तित वर्तमान से !
पानी में प्रवाहित कर जिस कर्ण को
कुंती ने खुद के लिए
मुक्ति का मार्ग प्रशस्त किया था
उस कर्ण को
उसके अधिकारों कर्तव्यों की आड़ में ले
फिर से बाजी जीतना चाहती थी
पर आज कर्ण
सिर्फ राधा का उत्तरदायी बन
ओज से परिपूर्ण है
महाभारत का विजयी है
राधा के मातृत्व कुल का मान है !
अगर तू गीत गाता है तो बस तू गीत गाता चल
टोटकों से निकल बाहर खुद को आज़माता चल
तेरी ताक़त तेरी शोहरत नही,तेरी वफ़ादारी-
सभी से मत बना रिश्ते बना तो फ़िर निभाता चल.

2 comments:

Kajal Kumar's Cartoons काजल कुमार के कार्टून 11 अप्रैल 2011 को 11:32 am बजे  

वाह कहीं बढ़िया. संबंधित ब्लागों पर जाने की ज़रूरत ही नहीं बची.

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