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तबाही को आमंत्रित करती सभ्यता

शनिवार, 7 सितंबर 2019




दिनांक 060919

यह सभ्यता उन गलतियों की वज़ह से तबाह हो रही है जो हम जानबूझकर करते हैं...
तारीख़ बदल गयी है लेकिन मंजर वही है... अँधेरी रात और घनघोर वर्षा में डूबता जगदलपुर शहर । रात के दो बज रहे हैं अचानक कुछ गिरने की आवाज़ से नींद खुली तो देखा कमरे में पानी भरा हुआ है।
हमारा घर जगदलपुर के पॉश इलाके में है जहाँ एन.एम.डी.सी. के अधिकारियों से लेकर आई.जी. और कमिश्नर जैसे बड़े-बड़े प्रशासनिक अधिकारी भी रहते हैं। इसी साल जुलाई में भी यह शहर इसी तरह पानी में डूबा था किंतु सबक नहीं लिए जाने की परम्परा को निभाते हुए कोई सबक नहीं लिया गया । इस बार स्थिति ज़्यादा ही गम्भीर है।
विज्ञान एक ऐसा दैत्य है जिसे सम्हालना बहुत मुश्किल है । तबाही के दिन हमारी कोई भी उन्नत तकनीक किसी को भी बचा नहीं सकेगी ।  वह एक ऐसी घड़ी होगी जब कुछ भी हमारे पक्ष में नहीं होगा - न पद ...न पैसा

डायल 112...
पानी घरों के अंदर घुस चुका है, सारा सामान भीग रहा है। रात के ढाई बजे मैंने डायल 112 को फ़ोन करके सहायता की याचना करनी चाही। उधर से कहा गया कि आवाज़ नहीं सुनाई दे रही है, बी.एस.एन.एल की सेवा से हम बहुत अच्छी तरह परिचित हैं। हमने दोबारा और तिबारा फोन लगाया ...उधर से वही आवाज़...”आपकी आवाज़ स्पष्ट नहीं है, कृपया दोबारा लगाएँ” । इस बार हमने दूसरे मोबाइल से सम्पर्क किया, बात हुयी, उधर से कहा गया “शीघ्र ही आपसे सम्पर्क किया जाएगा”। पिछले बार भी यही कहा गया था, वह सम्पर्क आज तक नहीं हुआ। यूँ, वारिश के अलावा अन्य मामलों में डायल 112 की सेवा तुरन्त मिल जाया करती है जिसके लिए हम छत्तीसगढ़ शासन और डायल 112 की टीम के ऋणी हैं।
डायल 112 के बाद हमने कुछ और लोगों को फ़ोन करके उन्हें इत्तला दी कि आपके घर में पानी घुस चुका है कृपया अपने ज़रूरी सामान को बचाने का प्रयास करें । जिन्हें फ़ोन किया गया उनमें तीसरे नम्बर पर एक बंदा ऐसा भी है जो पिछले पाँच साल से मेरे साथ शत्रुवत व्यवहार करता आ रहा है । कहीं पढ़ा था, आपत्तिकाल में शत्रु और मित्र का भेद समाप्त हो जाना चाहिए ।
दरअसल यह हमें भी पता है कि जब सड़क पर जाघों तक पानी बह रहा हो तो ऐसे में डायल 112 की सेवा भी क्या कर सकेगी। हमने उन्हें सुझाव दिया कि जे.सी.बी. भेज कर बाउण्ड्रीवाल के कुछ हिस्से को तोड़ दिया जाय तो पानी घरों से बाहर निकलना शुरू हो जाएगा । पिछली बार की वारिश में हमारे पड़ोसी गुड्डू ख़ान ने अपनी जे.सी.बी. मँगवाकर कुछ मलबा हटाकर सफ़ाई की थी तो पानी घरों से बाहर निकलने लगा था। इस बार गुड्डू ख़ान हैदराबाद में हैं और डायल 112 वाले जे.सी.बी. की सेवा उपलब्ध नहीं करवा पा रहे हैं।
फ़िलहाल अब घर-घर में डल झील का आनंद प्राप्त करना हो गया आसान । बस, एक कमरे से दूसरे कमरे में जाने के लिए हमें एक शिकारा बनवाना पड़ेगा । इसके बाद तो सब कश्मीर ही कश्मीर हो जायेगा ।

वरुण देवता हमसे बेहद ख़फ़ा हैं क्योंकि हमने प्रकृति के साथ बेहद बदसलूकी की है...
जगदलपुर शहर में इधर कुछ वर्षों में तेजी से कंक्रीट के जंगल खड़े किए जाते रहे हैं किंतु पानी के निकास की कहीं कोई व्यवस्था नहीं की गयी । कुछ कॉलौनीज़ तो ऐसी भी हैं जिनके चारों ओर बाउण्ड्रीवाल बनाकर किलेबंदी भी कर दी गई जिससे वारिश का पानी बाहर नहीं निकल पाता । यदि इन दीवालों को तोड़ दिया जाय तो कम से कम घरों को पानी में डूबने से बचाया जा सकता है किंतु इन बाउण्ड्रीवाल को तोड़ने में किसी अधिकारी की कोई दिलचस्पी नहीं है ।

पॉलीथिन बैग्स का अंधाधुंध दुरुपयोग और बेवकूफ़ाना ढंग से बनाये गये घर अब घरवालों के लिए मुसीबत बन चुके हैं । ऐसे ही हालातों में किसी दिन यह सभ्यता नष्ट हो जायेगी । लेकिन यह सब जानते हुये भी सुधार के बारे में कभी कोई नहीं सोचेगा । विकास और आधुनिकता का सभ्यताओं और प्रकृति के साथ यही तो तकाज़ा है ।

कामायनी...
“हिम गिरि के उत्तुंग शिखर पर बैठ शिला की शीतल छाँह...एक व्यक्ति भीगे नयनों से देख रहा था प्रबल प्रवाह” – कामायनी लिखने से पहले क्या जयशंकर प्रसाद के भी घर में घुसकर गुस्साये पानी ने कभी ऐसी ही मनमानी की होगी! 

भोर के पाँच बज रहे हैं, रात भर हुयी घनघोर वारिश कुछ कम ज़रूर हुई किंतु बंद अभी भी नहीं हुयी। हम अपनी श्रीमती जी के साथ रात भर कमरों से पानी उलीचते रहे और ज़रूरी सामान को बचाने की कोशिश करते रहे। लगातार तीन घंटे की मशक्कत के बाद हम दोनों ने घर का सारा पानी उलीच कर निकाल दिया। पानी के साथ कमरों में आकर ठहर गये गंदे कीचड़ को हमारी प्रतीक्षा है । बाहर आँगन में अभी भी जलस्तर ऊँचा है । घर के बाहर की सड़क पर पानी जाँघों तक है । पानी अब रुक-रुक कर बरस रहा है ।

नागलोक...  
पौ फटने लगी है। श्रीमती जी ने दरवाजा खोला तो देखता हूँ कि पानी में तैरता हुआ एक ज़हरीला नाग घर के अंदर घुसने की कोशिश कर रहा है। श्रीमती जी ने झट से दरवाज़ा बंद कर दिया। नाग देवता को शरण के लिए अब कहीं और जाना होगा। मैं कुछ क्षणों के लिए नाग बनकर पानी में तैरता हुआ किसी आदमी के घर में शरण पाने की उम्मीद में घुसने की कोशिश करता हूँ। घर की मालिकिन मुझे देखते ही दरवाज़ा बंद कर लेती है.. मुझे बुरा लगता है और मैं निराश हो जाता हूँ। आज मुझे कोई भी अपने घर में नहीं घुसने देगा... सनसिटी के लोग ऐसे ही हैं। कम से कम प्राकृतिक आपदा के समय तो सहयोग करना चाहिये। मैं ज़हरीला हूँ तो इसमें मेरी क्या गलती है? पिछले महीने अमेज़ॉन के जंगल में आग धधकती रही, हमारे कितने भाई-बहन और रिश्तेदार आग में ज़िंदा जलकर ख़ाक हो गए! उफ़्फ़! ये आदमी लोग ख़ुद भी तबाह होते हैं और हमें भी तबाह करते हैं।
मैं एक बार फिर दरवाज़ा खोलता हूँ ...यह देखने के लिए कि नाग देवता अभी हैं या कहीं और चले गए। हाँ! वे जा चुके हैं । भोर का उजाला थोड़ा और बढ़ गया है । काश! लोगों के दिमाग़ों तक भी यह उजाला पहुँच पाता।

बदहवास सी एक नन्हीं चिड़िया मुंडेर पर आकर इधर-उधर देख रही है । पंछियों का कलरव आज सुनायी नहीं दे रहा है । वे सब परेशान हैं और शायद मन ही मन आदमी प्रजाति को कोस रहे हैं। चिड़िया उड़ गयी, श्रीमती जी ने दरवाज़ा खुला देखा तो चीख पड़ीं ...”ज़ल्दी बंद करो बाहर पानी में साँप हैं घर में घुस जायेंगे”। मैं दरवाज़ा खुला रखना चाहता हूँ ...किंतु चाहकर भी ऐसा नहीं कर सकूँगा । मैंने दरवाज़ा बंद कर दिया है । छत्तीसगढ़ का यह हिस्सा नागलोक है । कभी यहाँ नागवंशी राजा हुआ करते थे। अब राजा तो नहीं रहे किंतु नाग यहाँ आज भी बहुतातायत से मिलते हैं ।

असली साम्यवाद...
नौ बजे तक सड़क का जलस्तर काफ़ी कम हो चुका था और अब हॉस्पिटल जाया जा सकता था । रास्ते में कई जगह सड़क पानी के प्रवाह से कटी हुई मिली । कल तक जो सड़क ठीक-ठाक थी आज वहाँ एक से ढाई फ़िट गहरे गड्ढे बन चुके थे और उनमें पानी भरा हुआ था । हम जैसे-तैसे हॉस्पिटल पहुँचे तो प्रवेश द्वार क्षतिग्रस्त मिला । पूरे हॉस्पिटल में गाद वाले कीचड़ का आलम था । दवाइयों वाले स्टोर रूम में कीचड़ ही कीचड़ था। ज़मीन पर रखे सारे भीगे कार्टून कीचड़ में सने हुए थे । डॉ. क्रांति मण्डावी सारे कर्मचारियों के साथ स्वयं भी सफाई अभियान में लगी हुयी थीं । वे इस समय एक मेहनतकश स्वीपर की भूमिका में थीं और ओ.पी.डी. में भर गये पानी और कीचड़ को निकाल-निकाल कर फेंक रही थीं, फ़ार्मासिस्ट लोग झाड़ू और पानी का पाइप लेकर फ़र्श साफ़ कर रहे थे । जाते ही हमने भी एक झाड़ू थाम ली । हमने अपने जीवन में यह पहला ऐसा हॉस्पिटल देखा जहाँ आवश्यकता पड़ने पर डॉक्टर से लेकर स्वीपर तक सभी लोग मिलजुल कर बिना किसी अहं के किसी भी तरह के काम में जुट जाया करते हैं । ख़ासतौर पर सफ़ाई के समय हमने किसी भी अधिकारी या कर्मचारी में पद के अहंकार का लेश भी नहीं देखा । डॉक्टर्स की भागीदारी केवल दिखावे के लिए नहीं होती बल्कि वे भी कंधे से कंधा मिलाकर पसीना बहाते हैं । यह एक गौरवशाली परम्परा है जिसमें साम्यवाद के सिद्धांत का वास्तविकता के धरातल पर सही अनुवाद देखा जा सकता है ।

बी.एस.एन.एल. सेवाओं में स्पंदन की तलाश...

वारिश ने बी.एस.एन.एल. सेवाओं को स्पंदनहीन कर दिया । फ़िलहाल हमारा लैण्ड लाइन बिना कोई धारा समाप्त किये ही कश्मीर हो गया है, ब्रॉड बैण्ड कनेक्शन भी मृत हो चुका है। दुनिया से कटकर हम सत्तर के दशक के चाइना बन चुके हैं ...दुनिया से अलग एक अज़ूबी दुनिया के वाशिंदे ।  कहा नहीं जा सकता कि हमारी बी.एस.एन.एल. सेवायें कब तक कश्मीर या चाइना बनी रहेंगी । ज़रूरी नहीं कि सरकार ही कर्फ़्यू लगाएपवन देव, वरुण देव और अग्नि देव क्रुद्ध होने पर कभी भी कर्फ़्यू लगा सकते हैं । उनका लगाया कर्फ़्यू कोई तोड़ कर दिखाये तो भला!  

1 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 9 सितंबर 2019 को 7:16 am  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (10-09-2019) को     "स्वर-व्यञ्जन ही तो है जीवन"  (चर्चा अंक- 3454)  पर भी होगी।--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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