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बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

साहित्य की दुश्मन हें सरकारें

दोस्तों अव्वल तो इन दिनों साहित का अर्थ ही बदल गया हे जो कल लुटेरे हुआ करते थे आज वोह साहित्य के दूकानदार बने बेठे हें पहले साहित्य लिखने समझने और सुनने के लियें बहुत बढा कलेजा चाहिए था में मेरी बात बताता हूँ प्रारम्भ काल यानि बचपन में में भी पत्रकारिता के साथ साथ लोटपोट,चम्पक,चंदामामा ,नन्दन और लोकल समाचारों में कहानी कविताएँ छपवाकर तीसमारखां समझता था .।

मेने उर्दू साहित्य में एम ऐ करने का मन बनाया मेरे और साथी भी थे हमारे गुरु भी विख्यात शायर थे एम ऐ के दोरान जब बढ़े शायर,उर्दू साहित्यकारों को पढ़ा तो लगा हम इनका मुकाबला कभी नहीं कर सकेंगे रदीफ़ काफिया,प्लाट किरदार और भी साहित्य शायरी की बहुत बहुत विधाओं को जान्ने का अवसर मिला उर्दू केसे पैदा हुई फिर उर्दू को केसे ज़िंदा रखने का प्रयास किया फिर अब उर्दू को केसे खत्म किया जा रहा हे पढ़ा फिर एल एल बी के बाद निठल्ले तो सोचा हिंदी साहित्य भी पढ़ डालें सो हिंदी में एम ऐ बात वही साहित्य लिखने के फार्मूले वही बस लेखक अलग तरीके अलग अलफ़ाज़ शब्द अलग विचार एक श्र्गार रस, वीर रस ,सभी रसों ने साहित्य को सरोबार कर दिया फिर मुझे पत्रकारिता क्षेत्र में पहले पत्रकार फिर सम्पादक का काम करने को अवसर मिला इस दोरान साहित्यकारों,रचनाकारों,कवि,शायरों और घसियारों से मिलने का मोका मिला कोटा मेले दशहरे में सिफारिशें केसे लगती थीं केफ भोपाली कोटा में क्या करते थे अपनी गजलों को केसे बेच कर जाते थे सब जानते हें ।
मुम्बई भी कई बार किसी सिलसिले में जाना हुआ वहां देखा एक लेखक कई दर्जन लोगों को नोकर रखता हे एक खानी की थीम देता हे सब अलग अलग लिखते हें और मुख्य लेखक उन्हें भुगतान करता हे उस कहानियों के समूह में से काट छांट कर अपनी कहानी बनाता हे फिल्म वालों को बेच देता हे खेर यह तो साहित्य विक्रेताओं की बात हुई लेकिन टी वी ने अब साहित्य को चाहे आम कर दिया हो लेकिन लिखा जाने वाला साहित्य कम पढ़ा जाने लगा और पढ़ा जाने वाला साहित्य सुना जाने लगा इस बिगड़ी और बदली परिस्थिति को बदलने कोई भी आगे नहीं आया जो जानते हें साहित्य किया हे जो लिखते हें कविता,गजल,कहानी,लेख रिपोर्ताज क्या हें उनका हाल आप और हम सब जानते हें आज की जनता का टेस्ट क्या हे आप और हम देखेंगे तो शर्म के मारे मर जायेंगे आज मुन्नी बदनाम हो गयी ,पप्पू पास हो गया , शीला जवान हो गयी,ऐ बी सी डी छोडो ,एक दो तीन ,मुन्ना बाही मोटर चली जेसे गाने हिट होते हें तो जनता की सोच पर अफ़सोस होता हे ना गीत हे न संगीत हे ना अलफ़ाज़ हें ना विचार हें ना फलसफा हे लेकिन गीत सुपर हिट हे कुल मिला कर अगर मेरे शब्दों में कहा जाए के इन दिनों साहित्य गरीब की जोरू सबकी भाभी बन गयी हे और साहित्य के साथ सरे राह बलात्कार ही बलात्कार हो रहा हे यही वजह हे के आज साहित्य तार तार हे जो साहित्यकार हें उनकी एक अलग कतार हे उनकी आँखों में आंसू चेहरे पर प्यास समाज में उपेक्षा टूटा हुआ घर फटे कपडे दो रोटी की आस उसका सरमाया हे जो दूकानदार हे उनके पास चमचमाती गाडिया हे बंगले हें कई प्रकाशन हे कविसम्मेलन के मुशायरे के साहित्यिक संस्थाओं के बुलावे हें लेकिन कुछ हे जो संघर्ष कर रहे हें और उम्मीद में हें के वोह इस जंग को जीत कर रहेंगे देश में चाहे कभी लिखा जाने वाला साहित्य हो चाहे बोला जाने वाला चाहे छापा जाने वाला साहित्य हो भी साहित्यकारों को कामयाबी का इन्तिज़ार हे आज अकादमियों में सरकार का कब्जा हे अकादमी में राजनीति हो रही हे हमारे अपने राजस्थान की बात करें यहाँ उर्दू,हिंदी,सिन्धी,पंजाबी साहित्य अकादमी में अध्यक्ष पद रिक्त पढ़े हें साहित्यिक गतिविधियाँ नोकर शाहों के हवाले हें कमोबेश देश और दुसरे राज्यों में साहियिक संस्थाओं का यही हाल हे जो निजी साहित्यिक संस्ताये हें वहां संथा अधिनियम की पालना नहीं हे सियासत ने वहां की आमदनी देख कर कब्जा कर लिया हे सदस्य गेर साहित्यकार बने हें और हालात यह हें के चुनाव में गेर साहित्यकार ही संस्थाओं के मालिक बने बेठे हें । अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

4 comments:

रवीन्द्र प्रभात 16 फ़रवरी 2011 को 10:43 am  

साहित्यकारों,रचनाकारों,कवि,शायरों और घसियारों से मिलने का मोका मिला कोटा मेले दशहरे में सिफारिशें केसे लगती थीं केफ भोपाली कोटा में क्या करते थे अपनी गजलों को केसे बेच कर जाते थे सब जानते हें ।


बहुत अच्छी वार्ता !

Kajal Kumar 16 फ़रवरी 2011 को 10:48 am  

चकलाघर से हैं तथाकथित कला/साहित्य के कुछ धंधे तो पर फिर भी रोइए जार-जार क्या....कीजिये हाय-हाय क्यूँ

अख़्तर खान 'अकेला' 16 फ़रवरी 2011 को 10:54 am  

rvindr ji or kaajl ji ne drd ko smjha dhnyvad. akhtar khan akela kota rajsthan

मनोज पाण्डेय 16 फ़रवरी 2011 को 2:27 pm  

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति है भाई जी, ऐसे ही लिखते रहिये !

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