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आज मेरी जिंदगी का बीसवां काला दिवस हे

गुरुवार, 10 मार्च 2011

 
दोस्तों आज मेरी जिंदगी का अबिस्वान काला दिवस हे आज के  दिन ही में एक खतरनाक महिला के साथ बेड़ियों में जकड़ा गया था हंसी हंसी में में खुद उम्र केद की सजा मंज़ूर कर रहा हूँ यह में सपने में भी नहीं सोच पा रहा था मीठा लड्डू खाने के चक्कर में में धोखे में आ गया . १० मार्च १९९१ का वोह काला दिन मुझे मोत के मुंह में धकेलने , मेरी जिनगी उम्र भर के लियें केद करने के लियें लोग एकत्रित हुए नाचे गाये मुझे घोड़ी पर बिठाया गया और फिर हमें राजस्थान के ही नवाबों की नगरी टोंक ले जाया गया वहां एक रिजवाना नाम की खतरनाक एब्दार लडकी को मेरा इन्तिज़ार था जी हाँ इस महिला का नाम रिजवाना स्कुल का हे लेकिन अकिकी नाम रईसुन्निसा  रखा गया था निकाह इसीस नामा से हुआ मेरा भी निकाह अकिकी नाम अजहर से हुआ अब मेरा नाम तो अख्तर खान अकेला और जो मेरे साथ जेलर बना कर उम्र केद की सजा भुगताने के लियें भेजी गयी उसका नाम रिजवाना हमारे पास निकाहनामा अजहर और रईसुन्निसा का अब बताओ हम क्या करें खेर रस्मों के नाम पर मुझे उल्लू बनाया गया सालियों और सलेजों ने बेवकूफ बनाकर बीवी मुट्ठी खोल में तेरा गुलाम कहलवाया और बस तबसे आज तक में भुगत रहा हूँ . 


मेरी यह जो जेलर हे कहने को तो टोंक नवाब साहब की भतीजी हे माशा अल्लाह तीन भाई और चार  बहनें और हें सभी खतरनाक हे मेरी इस बर्बादी के बाद मेरे दो छोटे साले कमर और फर्रुख थे सो मेने भी उन्हें बर्बाद करने की ठानी जयपुर के हमारे साडू इकबाल खान साहब और सलेज रुखसाना ,टोंक के साडू बड़े दादा और रिसर्च ऑफिसर सलेज नादिरा ने मिल कर षड्यंत्र किया और साले कमर को एक खतरनाक सलज वफरा  से फंसा दिया बेचारे एक हंसते खेलते साले की बोलती बंद हे सलेज जादूगरनी हे हजारा पद्धति हें सो उन्होंने हमारे साले पर पढ़ कर फूंका अब वोह हुक्म के गुलाम हे मुझे लगा मेरे आंसू पोंछने वालों में अब एक और शामिल हो गये हें फिर दुसरा छोटा साला फर्रुख थे बस उनके खिलाफ भी षड्यंत्र रचा और उन्हें मिस यूनिवर्स तबस्सुम से उलझा दिया अब इस बेचारे की तो क्या कहूँ बस आप खुद ही समझ जाओ मेरे पास कहने के लियें अलफ़ाज़ नहीं हे बढ़े साले हें जिन्हें भय्या कहते हें बाहर पुरे टोंक में शेर समझे जाते हें लेकिन घर में हमारी सबसे बढ़ी सलेज अफशां के सामने उनकी घिग्घी बन जाती हे कुल मिला कर हम सभी साडू और साले बहनोई एक ही दर्द के मारे हें हमारे सास ससुर बाल ठाकरे और मुल्लानी जी हमारे इस हाल पर हमारा मजाक उडहाते रहते हें हम खामोश गर्दन झुकाए बेठे रहते हें . 

इस खतरनाक जेलर के बारे में में आपको बताऊं यह कोटा में उर्दू की लेक्चरार हें और बच्चों को पढाती हे इसलियें वाही लहजा वाही डांटने का अंदाज़ घर में चलता हे आप अंदाजा लगायें में किन हालातों में सांस ले रहा होउंगा मेरी बोलती बंद हे इसी उठा पटक में मेरे इस जेलर ने मूल के साथ तीन ब्याज दिए पहला लडका शाहरुख खान जो ट्वेल्थ का एक्जाम दे रहा हे आई आई टी की तय्यारी कर रहा हे अगर आपकी दुआ लग गयी तो उसका सेलेक्शन हो जाएगा , एक बच्ची जवेरिया नाइंथ में हे जबकि एक प्यारी  बिटिया सदफ अख्तर जो अभी फर्स्ट में पढ़ रही हे . 


जेलर जिसके हंटर से मेरी बोलती बंद हे उसकी जुबां कभी अगर चलती हे तो केंची से भी खतरनाक होती हे मोहल्ले और परिवारों में उसने जादू करके खुद को अच्छा साबित कर रखा हे मेरे पापा हाजी असगर अली खान को भी उसने वक्त पर खाना चाय नाश्ता दे कर पता रखा हे हमारी मम्मी रशीदा खानम हे बस इस जेलर की केंची के आगे उनकी तो बोलती बंद हे एक भाई परवेज़ खान जो सुधा अस्पताल में मेनेजर हे उसकी बीवी रूपी भी टोंक की हे इसलियें इनकी यूनियन जिंदाबाद हो रही हे और दोस्तों में अकेला पढ़ जाने से अख्तर खान अकेला हो गया हूँ और यह जेलर मुझ पर हावी हे अब मेरे लियें तो खुदा खेर करे हे ना मेरी दर्द भरी कहानी जो आज काला दिवस के दिन नई हो गयी हे . अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

3 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) 10 मार्च 2011 को 12:51 pm  

इस काले दिवस पर भी आपको बधाई और शुभकामनायें

ललित शर्मा 10 मार्च 2011 को 12:52 pm  

ओहे इतना बड़ा हादसा। मेरी तो रुह कांप गयी, अरे यार कांप क्या गयी मैं खुद कांप रहा हूँ। चाय का कप रकाबी पे डांस कर रहा है, ये ल्लो ये चाय भी गयी। कोई बात नहीं कोटा आकर वसूल लेंगे।

हमारी तो दुआ यही है कि आप ताजिन्दगी अंग्रेजों के जमाने की जेलर की कैद से आजाद न हो पाएं। यूं ही हथकड़ी बेड़ियों में जकड़े रहें। आपको दिली मुबारक बाद, जेलर साहिबा को हमारा सलाम पहुंचा दीजिएगा।

रवीन्द्र प्रभात 11 मार्च 2011 को 1:20 pm  

सार्थक प्रस्तुति, बधाईयाँ !

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