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बुधवार, 18 अक्तूबर 2017


मन के अंधियारे को दूर भगाएं
चलो प्रेम का दीप  जलाएं

साथ चले न कोई जो तेरे
खुद को मन का साथी बना ले
असफलता से डर मत पगले
प्रयास के पथ को गले लगा ले

कोशिश की हार नही होती है
हर दिल मे ये विश्वास जगाएं
मन की अँधियारे को दूर भगाएँ
चलो प्रेम का दीप जलाएं

क्या तेरा है क्या मेरा है
ये जग दो दिन का बसेरा है
सद्कर्म किये जा पगले
हंस कर तू मिल सब से गले

मन का गुलाब सदा  ही रहे खिला
संघर्ष कांटे है उनका भी संग निभाएँ
मन के अंधियारे को दूर भगाएँ
चलो प्रेम का दीप जलाएं

बिना भाव  के मन पाषाण है
सबके कल्याण में तेरा भी कल्याण है
जहाँ भी प्रेम से मन सिंचित हो गया
धीर विश्वास भी वहीं पल्लिवत हो गया

रूठें न  कभी  भी जीवन मे अपने
भौतिक दौलत  भले ही कम हो जाये।
मन के अंधियारे को दूर भगाएँ
चलो प्रेम का दीप जलाएं



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