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ग़ज़ल

रविवार, 6 मार्च 2011


मेरी छत पर देर तक बैठा रहा.
इक कबूतर खौफ में डूबा हुआ.

हमने दरिया से किनारा कर लिया.
अब कोई कश्ती न कोई नाखुदा.

झूट के पहलू में हम बैठे हुए
सुन रहे हैं सत्यनारायण कथा.

देर तक बाहर न रहिये, आजकल
शह्र का माहौल है बदला हुआ.

ऐसी तनहाई कभी देखी न थी
इतना सन्नाटा कभी छाया न था.

पांचतारा जिंदगी जीते हैं वो
आमलोगों से उन्हें क्या वास्ता.

ख्वाब में जो बन गए थे दफअतन
पूछ मत अब उन घरौंदों का पता.

-----देवेन्द्र गौतम

5 comments:

akhtar khan akela 6 मार्च 2011 को 1:35 pm  

vaah bhaai vaah behtrin gzl behtrin rchnaa . akhtar khan akela kota rajsthan

दिगम्बर नासवा 6 मार्च 2011 को 2:04 pm  

झूट के पहलू में हम बैठे हुए
सुन रहे हैं सत्यनारायण कथा....

वह कमाल की ग़ज़ल है साहब ... लाजवाब ..

मनोज पाण्डेय 6 मार्च 2011 को 8:26 pm  

पांचतारा जिंदगी जीते हैं वो
आमलोगों से उन्हें क्या वास्ता.
लाजवाब ....

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