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भारतीय स्त्री कविता का भास्वर संकलन : `युद्धरत आम आदमी' व 'हाशिए उलाँघती स्त्री'

शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011





भारतीय स्त्री कविता का भास्वर संकलन :  `युद्धरत आम आदमी' व 'हाशिए उलाँघती स्त्री' 
- (डॉ.) कविता वाचक्नवी 





वर्ष 2004 में  रमणिका फ़ाउंडेशन की पत्रिका "युद्धरत आम आदमी" के दो विशेषांकों की योजना रमणिका गुप्ता जी ने बनाई थी। एक विशेषांक भारतीय भाषाओं की स्त्री कविता का और दूसरा स्त्री लेखन (गद्यभाग) का। 


यह निस्संदेह एक बड़ी विशाल व श्रमसाध्य योजना थी। रमणिका दी' अपने जुझारूपन, कर्मठता  और अतीव उत्साह के लिए भी अपने आप में विशिष्ट उदाहरण हैं। 2008 में उन्हें आए हृदयाघात के दिनों में उन्होने स्वयं अस्पताल से ही फोन कर के मुझे अपनी रचनाएँ इन विशेषांकों के लिए भेजने को कहा। मैंने उनके जीवट और आत्मीय स्नेह के चलते इसी उद्देश्य से एक नई  (काफी लंबी ) कहानी लिखी और `सहेली होने का पाप' शीर्षक से सितंबर 2008 में उन्हें  भेज दी। (गत दिनों इस कहानी का नाम बदल कर केवल `पाप' कर दिया है)


इस बीच वर्ष 2009 के दिसंबर माह में भारत जाने पर मैं लंबी अवधि तक (लगभग 15 दिन ) रमणिका जी के आवास पर ही रुकी। उन दिनों "हाशिये उलाँघती स्त्री" के पद्य भाग के दो खंडों में होने की योजना पर कार्य चल रहा था। रमणिका जी रात-रात भर बैठ कर प्रूफ देखा करती थीं और विविध भारतीय भाषाओं की हिन्दी में अनूदित हो कर आई कविताओं के पुनर्लेखन की भी आवश्यकता पड़ा करती थी ताकि उन्हें हिन्दी के मुहावरे में सही सही ढाला जा सके। प्राप्त कविताओं में से कुछ कविताओं को उन दिनों रमणिका जी के साथ बैठ कर नए रूप में ढाला, ढलते देखा। 


अंततः `युद्धरत आम आदमी' का  `हाशिए उलाँघती स्त्री' नामक  भारतीय स्त्री कविता का भास्वर संकलन (2 अंकों में) तैयार हो कर आ गया।  26 मार्च 2011 को इनका लोकार्पण  साहित्य अकादेमी, रमणिका फाउण्डेशन और ‘युद्धरत आम आदमी’ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित एक दिवसीय कार्यक्रम में भव्य तरीके से सम्पन्न हुआ। 


मेरी लेखकीय प्रतियाँ भारत के हमारे डाक पते पर भिजवा दी गईं। जुलाई में  उनकी स्कैन प्रति प्राप्त होने पर उन्हें देख पाने का सुयोग मिला। 


`हाशिये उलाँघती स्त्री' के इस भास्वर संकलन का पहला खंड हिन्दी कविताओं का है व दूसरा खंड हिन्दी में अनूदित भारतीय भाषाओं की कविताओं का।  

दोनों अंकों की संपादक हैं रमणिका गुप्ता जी और अतिथि संपादक हैं  कवयित्री `अनामिका' । 




विशेषांक (प्रथम अंक) में मेरी जो कविताएँ सम्मिलित हैं, वे हैं -

१. बच्चियो
२. रुमालों पर 
३. मैं कुछ नहीं ..... 
४. मैंने दीवारों से पूछा 
५. औरतें डरती हैं
६. गौरैया



 पढ़ते समय कृपया ध्यान रखें कि मेरी इन कविताओं के प्रकाशन में कुछ बहुत भारी त्रुटियाँ रह गई हैं। यथा, पहली वाली कविता में एक अन्य कविता का अंश जुड़ा हुआ है (आधी एक व आधी दूसरी मिला कर ) और अंतिम कविता में भी कुछ ऐसी ही चूक आ गई है। टायपिंग/प्रूफ और वर्तनी की त्रुटियाँ छूट गई हैं।   अस्तु ! इतनी बड़ी योजना में अनेक लोगों व लंबे समय तक चली प्रक्रिया के चलते ऐसी त्रुटियाँ विशेष महत्व नहीं रखतीं।  इन कविताओं का सही पाठ वागर्थ  पर अथवा कविताकोश में संकलित मेरे संकलन पर पढ़ा जा सकता है। :) 

-(डॉ.)  कविता वाचक्नवी











आयोजन के पश्चात रमणिका फाउंडेशन एवं साहित्य अकादेमी द्वारा 26 मार्च 2011 को जारी समाचार की प्रति - 



"राजधानी दिल्ली में पहली बार 25 भिन्न भारतीय भाषाओं की स्त्रीवादी कवयित्रियों की अनुगूंज सुनाई दी। स्त्री मुक्ति और स्त्री सौंदर्य की परिभाषा को नये सिरे से गढ़ते हुए महिला कवियों ने एकमत से कहा कि अब स्त्रीवादी लेखन को लेकर आनंद का समय आया है। मौका था साहित्य अकादेमी, रमणिका फाउण्डेशन और ‘युद्धरत आम आदमी’ के संयुक्त तत्वावधान में ‘हाशिये उलाँघती स्त्री’ कविता-पाठ पर एक दिवसीय कार्यक्रम का। 

26 मार्च को हुए इस कार्यक्रम ब्रजेन्द्र त्रिपाठी ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि साहित्य अकादमी एक सांझे मंच की तरह भारत की तमाम भाषाओं के साहित्य के तौर पर मिलाने का काम कर रहा है। रमणिका फाउण्डेशन के साथ साहित्य अकादमी ने और भी काम किया है। उन्होंने बताया कि रमणिका फाउंडेशन द्वारा तैयार आदिवासी अंक को देख कर एक आदिवासी ने कहा कि ऐसा कार्य तो हमने आज तक नहीं देखा। उन्होंने रमणिका फाउंडेशन के कार्य को रेखंकित करते हुए कहा कि इस आयोजन के जरिये उन्होंने एक इतिहास रच दिया है।

रमणिका गुप्ता अध्यक्ष रमणिका फाउण्डेशन एवं संपादक ‘युद्धरत आम आदमी’ के आरंभिक भाषण में ें ‘हाशिये उलांघती स्त्री’ विषयक गोष्ठी और इसी नाम से इसी विषय पर प्रकाशित युद्धरत आम आदमी के विशेषांक की स्त्री-दिवस के उपलक्ष्य में विशेष चर्चा करते हुए स्त्री मुक्ति की अवधारणा के विकास के बारे में चर्चा की। उन्होंने कहा कि कविता में स्त्री मुक्ति की अवधारणा के बीज हिन्दी में मीरा, पंजाबी में पारो परेमन और में कन्नड़ की अक्कमहा देवी (अक्कअम्मा) तक जाते है। इस संकलन में हमने 334 स्त्री मुक्ति पर लिखने वाली कवयित्रियों को शामिल किया है जिनमें 127 हिन्दी की हैं और 207 हिन्दीतर भाषाओं की। इन सभी भिन्न-भिन्न भाषी कविताओं में स्त्री मुक्ति का एक सुर गूंजा है, भले उसका स्वर, लय या धुन भिन्न-भिन्न हो। अपने आरंभिक वक्तव्य में रमणिका गुप्ता ने विशेषांक की तैयारी के दौरान आई चुनौतियों के बारे में बताया और कहा कि उनकी कोशिश स्त्रिायों को पुरुष के खिलाफ खड़ा करना नहीं है। स्त्री की मुक्ति का अर्थ पुरुष से मुक्त होना लगा लिया जाता है, देह की मुक्ति का आशय यौनता से लगाया जाता है जबकि हमारा आशय मानसिक तथा दैहिक स्तर पर अपने निर्णय लेने के अधिकार से है। उन्होंने स्पष्ट किया कि स्त्री-मुक्ति के आंदोलन का मतलब यह नहीं कि इसमें सिर्फ महिलाएं ही शामिल हों बल्कि यह पुरुषवादी दृष्टि से सोचने-समझने की एक खास मानसिकता में कैद हो चुके समाज को मुक्त करने को आंदोलन है, स्त्री-पुरुष को समाज में समान दर्जा दिलाने की मुहिम है। जाहिर है मुक्ति के इस आंदोलन में स्त्री-पुरुष दोनों की साझी जरूरत है। उन्होंने कहा कि स्त्रियों को पुरुष-दृष्टि से सौंदर्य की परिभाषा गढ़ने की जगह अपनी सौंदर्य-दृष्टि विकसित करनी होगी। उन्होंने कहा कि एक मध्यवर्गीय कामगार महिला, एक मजदूर महिला और एक अभिजात वर्ग की महिला के लिए स्त्री-मुक्ति की अवधारणाएं अलग-अलग हैं। उनके सौंदर्य की कसौटियां भी अलग-अलग हैं। हो सकता है कि एक अभिनेत्री के लिए कमनीय देहयष्टि की जरूरत हो, पर एक मजदूर महिला के लिए स्वस्थ और हट्टे-कट्टे शरीर की आवश्यकता है। इसलिए महिलाओं को भी सौंदर्य-शास्त्रा की पुरुषवादी जकड़न और बाजारवादी दृष्टि से मुक्त होने की जरूरत है, जिसका वे चाहे-अनचाहे शिकार हो जाती हैं।

उन्होंने कहा कि स्त्रियों को अपने सौंदर्य की कसौटी खुद गढ़ने की जरूरत है। उन्हें पुरुषों के लिए नहीं, अपने लिए सुंदर दिखने की जरूरत है। सौंदर्य के चालू मुहावरों के हिसाब से नहीं वरन अपने जरूरत के मुताबिक अपने सौंदर्य की नयी परिभाषा गढ़ने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि यहां असल लड़ाई निर्णय के अधिकार और समानता की है जिससे यह पुरुषवादी समाज हर क्षण आतंकित रहता है। गुजरात की कवयित्री योगिनी श्क्ल की कविता की ओर ध्यान खींचते हुए उन्होंने कहा कि हमारे यहां श्रृंगार की कविताएं खूब होती हैं। विडंबना देखिये कि स्त्रियों को रोशनी कहते हैं और उनसे उनका सूरज छीन लिया जाता है। उन्होंने कहा कि आकर्षण सिर्फ सूरत का नहीं, सीरत का भी होता है। उन्होंने बताया कि पूर्वोत्तर में सूर्य को स्त्राी माना जाता हैµयानी शक्ति का प्रतीक स्त्री है। यह दो संस्कृतियों व मानसिकता के सामाजिक ढांचे में एक महत्त्वपूर्ण फर्क को रेखांकित करता है। 

समारोह के मुख्य अतिथि प्रसिद्ध चिंतक भाषा रिसर्च एंड पब्लिकेशन सेंटर के सचिव तथा रमणिका फाउण्डेशन के ट्रस्टी सदस्य गणेश नारायण देवी ने युद्धरत आम आदमी पत्रिका के विशेषांक हाशिये उलांघती स्त्री का विमोचन किया और गोष्ठी के उद्घाटन व्याख्यान में कहा कि शिक्षा और चिकित्सा के स्तर पर केवल गरीब स्त्रिायों की ही नहीं सम्पन्न स्त्रियों की भी उपेक्षा की जाती है। उन्होंने बताया कि पश्चिमी देशों में तो उन्नीसवीं सदी के मध्य तक महिलाओं को लेखक ही नहीं माना गया। हमारे यहां स्थिति थोड़ी भिन्न थी। हमारे यहां मीरा को भले जहर पीना पड़ा था लेकिन उनकी कविताएं घर-घर पहुंचीं। उन्होंने कहा कि अब स्त्रियों की दशा में थोड़ा सुधार आया है और देश में शिखर के संवैधानिक पदों पर महिलाएं जरूर आ गयी हैं पर आम महिलाओं की हालत में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं आया है। अखबार की खबरों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि महिलाएं और भी असुरक्षित होती जा रही हैं। एक तरफ देश का विकास हो रहा है और इस इन्फ्रास्ट्रक्चरल विकास का बोझ जैसे महिलाओं के सिर पर ही डाल दिया गया है। उन्होंने ‘हाशिये उलांघती स्त्राी’ विशेषांक के प्रकाशन को तमाम निराशाओं के बीच अंधेरे में उम्मीद की चमक बिखेरने वाला ऐतिहासिक घटना कहा। उन्होंने आगे कहा कि स्त्री-स्वर का इस स्वरूप में आना एक नयां इतिहास गढ़ना है। आशीष नंदी को याद करते हुए उन्होंने कहा कि गांधीजी ने सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा और नमक सत्याग्रह का तरीका स्त्रियों से ही ग्रहण किया। उन्होंने साहित्य अकादमी से अपेक्षा की कि इन दोनों खण्डों का सम्मिलित भाषाओं में भी अनुवाद किया जाना चाहिए।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रख्यात कवि तथा ललित कला अकादमी के अध्यक्ष अशोक वाजपेयी ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि साहित्य अपने अंधेरों के समक्ष खड़ा होने की हिम्मत जुटाता है, उससे भागता नहीं है और न ही उसे छुपाने की कोशिश करता है। स्त्रियों का यह लेखन साहित्य में लोकतंत्रा को मजबूत स्थिति प्रदान करता है। इस संग्रह में संग्रहित कविताओं को उन्होंने नयी दुस्साहसिकता का उपक्रम कहा। रमणिका गुप्ता की बात की ताईद करते हुए उन्होंने कहा कि साहित्य का सृजन करने वाली स्त्रियों को पुरुषों की स्थापित सौंदर्य दृष्टि से अलग हट कर अपनी सौंदर्य दृष्टि गढ़नी चाहिए। साथ ही यह अपेक्षा भी दर्ज की कि स्त्रियों के साहित्य से एक नये तरह का कर्म-सौंदर्य निकलना चाहिए। उन्होंने कहा कि स्त्रियां अपने लेखन में बहुत हद तक सामाजिकता की बात करती हैं लेकिन उसमें उनकी अंतरंगता गायब है। 

प्रसिद्ध कवयित्री एवं युद्धरत आम आदमी के ‘हाशिये उलांघती स्त्री’ के विशेष अंक की अतिथि संपादक अनामिका ने अपने बीज भाषण में बताया इस संकलन में संकलिता कविताएं एफ.आई.आर. की तरह उपस्थित हैं। यह स्त्री आंदोलन ऐसा आंदोलन है जिसने एक बूंद भी खून नहीं बहाया और चहुंमुखी विस्तारित हो रहा है। स्त्रियों को अपने भीतर झांकने के लिए प्रेरित करती हैं ये कविताएं नए मानदंड, नए प्रतिमान गढ़ती हैं ये कविताएं। उन्होंने कहा कि स्त्री चेतना की बेल कैद की दीवारों के ऊपर चढ़ कर आजादी का अनुभव करने लगी हैं। उन्होंने कहा कि यह बेल अब इस कदर ऊपर चढ़ गयी है कि हमें अब इनसे आनंद फल पाने की उम्मीद बांधनी चाहिए। 

मलयालम की आलोचक के. वनजा ने दक्षिण भारत में स्त्री मुक्ति की काव्यधारा के विकास पर अपना आलेख पढ़ा। युद्धरत आम आदमी की सहयोगी संपादक दलित आलोचक एवं कवयित्री हेमलता महिश्वर ने उत्तर भारत की काव्य धारा में स्त्री मुक्ति के अंकुरों के पेड़ बनने तक की विकास यात्रा का ब्योरा देते हुए बताया कि समस्त कवयित्रियों के स्वर में एकसूत्राता दृष्टव्य होती है। यह एकसूत्राता स्वयं के प्रति निष्ठुर समाज के प्रत्येक अत्याचार का विरोध अभिधा, व्यंजना एवं लक्षणा में व्यक्त करती हैं। यह पहला अवसर था जब बाइस विभिन्न भारतीय भाषाओं की स्त्रीवादी कवयित्रियां, दिल्ली में एक मंच पर उपस्थित हुईं। इस सत्रा में के. वनजा की ‘चित्रा मुद्गलः एक मूल्यांकन’ नामक आलोचनात्मक पुस्तक का विमोचन अशोक वाजपेयी और गणेश देवी ने किया। 

उद्घाटन सत्रा में सलमा, प्रतिभा नंदकुमार, ग्रेस कुजूर ने काव्य पाठ किया। तीसरे सत्रा में दीप्ति नवल का शामिल होना कार्यक्रम का अतिरिक्त आकर्षण था। कविता-पाठ के तीन सत्रों में अपनी कविताओं से श्रोताओं को आंदोलित करने वालों में प्रमुख थी बी. संध्या (मलयालम), कुट्टी रेवती (तमिल), शाहजहाना (तेलुगू) सोमा बंद्योपाध्याय (बांगला), मीनाक्षी गोस्वामी बरठाकुर (असमिया), जोगमाया चकमा (चकमाµत्रिपुरा) हीरा बनसोडे (मराठी), उषा उपाध्याय (गुजराती), दाँङी चाँडथू (मिजो), लाइरेनलाकपम (पैतैµमणिपुरी), निरुपमा दत्त(पंजाबी), शुभा, सविता सिंह, रंजना जायसवाल, अनिता भारती (हिंदी), विभा रानी (मैथिली), निर्मला पुतुल (संथाली), सरिता बड़ाइक (नगपुरिया झारखंड), दरख़्शां अंदराबी (कश्मीरी), तरन्नुम रियाज (उर्दू)श्, दीप्ति नवल, लक्ष्मी कन्नन (अंग्रेजी)। इस आयोजन में हिन्दी की तीन, अंग्रेजी की दो, उर्दू, मराठी, गुजराती, पंजाबी, बांगला, ओड़िया, मिजो, चकमा, मणिपुरी-पैतै, असमिया, संथाली, नगपुरिया, कश्मीरी, तेलुगू, मलयालम, कन्नड़ भाषा की एक-एक, तमिल की दो। 

रमणिका गुप्ता द्वारा संपादित ‘युद्धरत आम आदमी’ के ‘हाशिये उलांघती स्त्री’ कविता अंक की अतिथि संपादक हैं अनामिका। सम्पादन सहयोग में हेमलता महिश्वर, कंचन शर्मा और उषा उपाध्याय, साॅलजी थॅमस, हरीश परमार हरप्रीत और विपिन चैधरी का नाम लिया गया!

भारतीय स्त्री कविता के इस भास्वर संकलन पर 2004 से काम शुरु हुआ। सात-आठ वर्षों के अथक संयुक्त श्रम का नतीजा है हिन्दी और हिन्दीतर कविताओं पर केन्द्रित ये दो भाग जिनका लोकार्पण इस अवसर पर गणेश नारायण देवी के हाथों हुआ। स्त्री-मुक्ति आंदोलन की चार पीढ़ियाँ भारतीय भाषाओं में अपनी सर्जना का प्रकाश कैसे फैला रही हैµ इसका जायजा यहाँ मिलता है।

इस अवसर पर रमणिकाजी की कहानी ‘नई मेनका’ का सजीव पाठ एवितोको की ओर से मुम्बई की विभा रानी ने किया। विभा रानी के नाटक ‘आओ तनिक प्रेम करें’ और ‘अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो’ पर मोहन राकेश अवार्ड 2005 मिला। उनके ब्लाॅग ‘छम्मकछल्लो कहिस’ पर 2009 में लाडली इंडिया अवार्ड मिला। कार्यक्रम के तीन सत्रों का कुशल संचालन अल्का सिन्हा, सुधीर सागर और पूनम तुषामड़ ने किया।"

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आसमान पर थूकने वाले लोगों का थूक उनके मुंह पर ही आन गिरा ...बेईमान सांसदों को जनता से धोखे के लियें दंड कोन देगा ..अन्ना अपने आस्तीन के साँपों को मारे

संसद के अंदर और संसद के बाहर अन्ना की आलोचना करने वाले सत्ताधारी लोगों के चेहरे पर कल लोकपाल के बहुत का जो तमाचा पढ़ा है उससे वोह सभी हमेशां के लियें लडखडा गए हैं और अब उनका राजनीति में सम्भाल पाना मुश्किल ही नहीं ना मुमकिन लग रहा है जो गलती अन्ना के खिलाफ सत्ता पक्ष ने की वही गलती अन्ना ने आखरी लम्हों में कुछ अपनों के हाथों गुमराह होकर सत्ता के खिलाफ घुटने टेक कर की लेकिन फिर भी अन्ना तो हीरो थे और हार कर भी हीरो बन कर उभरे है सरकार के पास तो अब सम्भलने का वक्त नहीं लेकिन अन्ना के पास अभी सम्भलने का बहुत वक्त है अगर वोह ज़िम्मेदारी से सम्भले तो एक बार फिर वोह २०१२ के जनता हीरो साबित होंगे .......... दोस्तों आप सभी जानते है के देश में लोकपाल के नाम पर कोंग्रेस हो चाहे भाजपा हो सभी दलों ने नोटंकी की है और खासकर कोंग्रेस और सहयोगी दलों की नोटंकी तो देश को कभी माफ़ नहीं करना चाहिए .सब जानते हैं के अन्ना के आन्दोलन के बाद कथित ठंडे बसते में पढ़े लोकपाल बिल से धूल छंटी कमजोर लोकपाल बिल को और कमजोर बनाया गया अन्ना और समर्थकों ने वकीलों ने इसका जब विरोध किया तो कोंग्रेस और समर्थित दलों ने सभी का मजाक उढ़ाया ..अन्ना और समर्थकों को डराया धमकाया और यहाँ तक के उन पर हमले करवाने की साजिशें तक रचीं अन्ना के खिलाफ जनता को भडकाया गया उनकी टीम में फुट डाली गयी और आखिर आखरी लम्हों में जब लोकसभा में लंगडा और कमजोर लोकपाल बिल पेश हुआ तो अन्ना ने हुनकर भरी लेकिन उन्हें उनके समर्थकों ने कोंग्रेस से इन्टरनल पेक्ट कर दिल्ली से महाराष्ट्र भेज दिया उनकी दलील थी दिल्ली में ठंड है अन्ना नहीं माने तो अन्ना को समझाया गया के आपका और आपके लोकपाल का शिवसेना खुला विरोध कर रही है इसलियें अगर महाराष्ट्र मुंबई शिवसेना के गढ़ में यह अनशन होगा तो देश देखेगा और सरकार पर दबाव बढ़ेगा लेकिन सब बेकार लोकसभा में बिल पेश हुआ अन्ना अनशन पर बेठे बीमार हुए भीड़ जमा नहीं हुई और लोकसभा में कोग्न्रेस के सांसदों के नहीं पहुंचने पर भी यह बिल सपा और बसपा के सांसदों के वाक् आउट के बाद पारित कर दिया गया अन्ना घबरा गये उनके समर्थक जो पहले से ही कोंग्रेस से मेच फिक्सिंग कर चुके थे फिर अन्ना को अनशन तोड़ने और जेल भरो आन्दोलन खत्म करने का एलान करवाने में कामयाब हुए बस यहीं अन्ना से चुक हो गयी उन्होंने अपने आस्तीन में पलने वाले साँपों को नहीं पहचाना और वोह खुद जो शेर कहलाते थे सरकार के सामने मेमने से नज़र आने लगे निराश हताश अन्ना घबरा गये थे लेकिन कहते हैं के जनहित में लोकहित में इश्वर खुदा अल्लाह का नाम लेकर अगर कोई काम किया जाए तो गेब से उसमे खुदा मदद करता है यहाँ भी यही सब हुआ ..हरे थके अन्ना रालेगन पहुंच कर हताशा और निराशा के दोर में थे वोह असमंजस में चल रहे थे लेकिन अचानक कोंग्रेस और सत्ता पक्ष का सुख भोग रहे साथी दलों के दिल और दिमाग में खुदा आने कोंग्रेस को पांच राज्यों के चुनाव की राजनीती के तहत पटखनी देने की बात डाल दी ...दोस्तों कितनी अजीब बात है के जो तुन मूल ..जो राष्ट्रीय जनता दल ..जो सपा जो भाजपा इस सरकारी लोकपाल को लोकसभा में पारित करवाने में मदद गार थे वही लोग सोदेबाज़ी फेल हो जाने पर राज्यसभा में बदल गये एक ही दल का लोकसभा और राज्यसभा में अलग अलग चेहरे नज़र आया तुन्मुल और लालू दल सरकार के और लोकपाल के खिलाफ सरकार का ब्लड प्रेशर हाई था दिन भर सभी कोंग्रेसी नेताओं का ब्लड प्रेशर बढ़ा रहा और खुद कोंग्रेस अपने ही आस्तीन में पलने वाले साँपों के हाथों ढ्सी गयी करोड़ों करोड़ रूपये इस बिल के पारित होने में सांसदों के भत्तों पर खर्च हुए अन्ना के आन्दोलन में खर्च हुए और नतीजा वही ढ़ाक के तीन पात ...जरा सोचो अगर अन्ना का अनशन जारी रहता अगर जेल भरो आन्दोलन की तय्यारी रहती तो आज अन्ना को जो लोग रणछोड़ दास मेच फिक्सिंग का आरोपी समझ रहे है वोह नहीं समझा जाता .खेर कहावत है के आसमान पर थूकने वाले का थूक उसी के मुंह पर आकर गिरता है और सत्ता पक्ष उनके समर्थित दलों का थूक उन्हीं के मुंह पर आन गिरा लालू ने बिहार में कोंग्रेस के कारण अपनी हर का बदला ले लिया तो बसपा और सपा ने एक बार फिर उत्तरप्रदेश में अपनी रणनीति पक्की कर ली ...नुकसान हुआ तो कोंग्रेस को और अन्ना की छवि को कोंग्रेस के पास तो अब सम्भलने का वक्त नहीं है लेकिन अन्ना के पास अभी वक्त ही वक्त है अन्ना को अब फिर एक बार खुद की टीम का शुद्धिकरण करना होगा आस्तीन के साँपों को खत्म करना होगा और फिर जो कहा है वोह करके दिखने के लियें आगामी चुनावों में लोकपाल के मामले में सभी राजनितिक दलों को पटखनी देने के लीयें साफ छवि वाले निर्दलीय प्र्त्याक्षियो को आगामी चुनाव में खड़ा कर जरा कुछ ऐसा कर दिखाना होगा के देश को पता लग जाये के यहाँ लोकतंत्र है यहाँ संसद में जीत कर जाने वाले लोग गुंडा गर्दी के बल पर अगर जनता की भावनाओं को नज़र अंदाज़ कर मनमानी करना चाहते हैं तो जनता उन्हें सबक सिखाना चाहती है हमे बताना होगा के यह मेरा भारत महान है यहाँ जनता जनार्दन थी ..जनार्दन है और जनार्दन रहेगी जय भारत जय जवान जय किसान जय हिंदुस्तान ..........अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

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विदेश में पहली बार ब्लॉगर हुए सम्मानित

मंगलवार, 27 दिसंबर 2011

बैंकाक । साहित्य, संस्कृति और भाषा की अंतरराष्ट्रीय वेब-पत्रिका सृजनगाथा डॉट कॉम तथा छत्तीसगढ़ राज्य की बहुआयामी साहित्यिक संस्था सृजन-सम्मान का यह वैश्विक अभियान हिन्दी और साहित्य के लिए प्रतिबद्ध अन्य संस्थानों के लिए भी अनुकरणीय है । लगातार 4 वर्षों तक विदेश में जाकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी साहित्य के लिए काम करना निश्चित ही घर-फूंक तमाशा जैसा है किन्तु इन संगठनों ने इसे सच साबित कर दिखाया है । - यह कहना था नागपुर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. प्रमोद कुमार शर्मा का । वे थाईलैंड, पटाया में आयोजित चतुर्थ अंतरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन के अध्यक्ष मंडल के रूप में उपस्थित थे । अध्यक्ष मंडल के दूसरे सदस्य वरिष्ठ कथाकार श्रीमती संतोष श्रीवास्तव (मुंबई) ने कहा कि रायपुर जैसे छोटी जगह से यह पहल महत्वपूर्ण है । उन्होंने फ्रांस, जर्मनी, रूस आदि देशों में हिन्दी के विस्तार के लिए हिन्दी सिनेमा की भूमिका को विस्तार से रखा । आलोचक डॉ. प्रेम दुबे ने कहा कि हिन्दी को अंतरराष्ट्रीय बनाने में इंटरनेट की भूमिका अहम् है । यद्यपि हिन्दी के साहित्यकार निरंतर अपनी भाषिक संस्कृति को इंटरनेट के माध्यम से विस्तारित कर रहे हैं किन्तु अभी मुख्यधारा के साहित्य को नेट पर रखा जाना शेष है । इसके अलावा कई वक्ताओं ने वैश्विक हिन्दी की दिशा पर अपनी बात रखी । समारोह के प्रारंभ में आयोजन के संयोजक और सृजनगाथा डॉट कॉम के संपादक जयप्रकाश मानस ने स्वागत भाषण देते हुए विस्तार से अंतरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलनों के बारे में बताया । इस आयोजन को थाईलैंड में आयोजित करने के मूल उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए वेब पत्रिका सृजनगाथा के संपादक जय प्रकाश मानस ने बताया कि सांस्कृतिक दृष्टि से भारत और थाईलैंड में कई समानताएं हैं । भारत से निकल कर बौद्ध धर्म जहां थाई संस्कृति में विलीन हो गया वहीं भारतीय नृत्य शैलियों का यहाँ व्यापक प्रसार हुआ । बौद्ध यहां का मुख्य धर्म है। गेरुए वस्त्र पहने बौद्ध भिक्षु और सोने, संगमरमर व पत्थर से बने बुद्ध यहां आमतौर पर देखे जा सकते हैं। यहां मंदिर में जाने से पहले अपने कपड़ों का विशेष ध्यान रखा जाता है । इन जगहों पर छोटे कपड़े पहन कर आना मना है। थाईलैंड के शास्त्रीय संगीत चीनी, जापानी, भारतीय ओर इंडोनेशिया के संगीत के बहुत समीप जान पड़ता है। यहां बहुत की नृत्य शैलियां हैं जो नाटक से जुड़ी हुई हैं। इनमें रामायण का महत्वपूर्ण स्थान है। इन कार्यक्रमों में भारी परिधानों और मुखोटों का प्रयोग किया जाता है। यहाँ अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मलेन आयोजित करने के पीछे पवित्र उद्देश्य यही था कि हिंदी संस्कृति को थाई संस्कृति के करीब लाना और हिंदी भाषा को यहाँ के वैश्विक वातावरण में प्रतिष्ठापित करना ।

कार्यक्रम का संचालन साहित्य वैभव के संपादक डॉ. सुधीर शर्मा ने किया । इस मौके पर स्वर्णभूमि एअरपोर्ट के स्टेशन मास्टर व हिन्दी सेवी श्री संजय सिंह विशेष रूप से उपस्थित थे ।

सुधीर सक्सेना, गीताश्री और संदीप तिवारी को सृजनगाथा सम्मान

दूसरे सत्र में वरिष्ठ कवि व 'दुनिया इन दिनों' के प्रधान संपादक डॉ. सुधीर सक्सेना, भोपाल को उनकी कविता संग्रह 'रात जब चंद्रमा बजाता है' तथा स्त्री विमर्श के लिए प्रतिबद्ध लेखिका व आउटलुक, हिन्दी की सहायक संपादिका, गीताश्री को उनकी संपादित कृति 'नागपाश में स्त्री' तथा युवा पत्रकार, दैनिक भारत भास्कर (रायपुर) के संपादक श्री संदीप तिवारी 'राज' की पहली कृति 'ये आईना मुझे बूढ़ा नहीं होने देता' के लिए वर्ष 2011 के सृजनगाथा सम्मान (www.srijangatha.com ) से नवाजा गया । यह निर्णय देश के चुनिंदे 1000 युवा साहित्यकार-पाठकों की राय पर निर्धारित किया गया था। सम्मान स्वरूप उन्हें 11-11 हजार का चेक, प्रशस्ति पत्र, प्रतीक चिन्ह और साहित्यिक कृतियां भेंट की गईं ।

विदेश में पहली बार ब्लॉगर हुए सम्मानित

इसके अलावा पहली बार देश से बाहर थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक में आयोजित किसी अन्तराष्ट्रीय सम्मलेन में हिन्दी के चार ब्लॉगर एकसाथ सम्मानित हुए, जिसमें रवीन्द्र प्रभात , नुक्कड़ ब्लॉग की कथा लेखिका अलका सैनी (चंडीगढ़)और उडिया भाषा के अनुवादक ब्लॉगर दिनेश कुमार माली प्रमुख थे । लघु पत्रकारिता के लिए आधारशिला के संपादक दिवाकर भट्ट (देहरादून), ग़ज़लगो सुमीता केशवा (मुंबई) तथा पत्रकारिता के लिए बीपीएन टाईम्स के संपादक ताहिर हैदरी (रायपुर), पीपुल्स समाचार दैनिक के युवा पत्रकार ब्रजेश शुक्ला (जबलुपुर) को भी सृजनश्री सम्मान से अलंकृत किया गया ।

कृतियों का विमोचन

इस अवसर पर हिन्दी साहित्य को ब्लॉगिंग से जोड़ने वाली पत्रिका वटवृक्ष के तृतीय अंक का लोकार्पण भी हुआ, इसके बाद दिनेश कुमार माली की पुस्तक बंद दरवाजा (साहित्य अकादमी से सम्मानित ओडिया लेखिका सरोजिनी साहू के कथा संग्रह का हिन्दी अनुवाद), चित्रकार व कवि डॉ.जे.एस.बी.नायडू की दो किताबों का भी विमोचन हुआ, जिसमें जाने कितने रंग प्रमुख है ।

कविता पाठ :

अंतिम सत्र कविता पाठ की अध्यक्षता की वरिष्ठ कवि डॉ. सुधीर सक्सेना ने की, विशिष्ट अतिथि थे आधार शिला के संपादक डॉ. दिवाकर भट्ट और पांडुलिपि के संपादक जयप्रकाश मानस । इस सत्र में डॉ.जे.एस.बी.नायडू,  दिनेश माली, सुमीता केशवा, सीमा श्रीवास्तव, लतिका भावे, युक्ता राजश्री झा, रवीन्द्र प्रभात, डॉ. सुधीर शर्मा, डॉ. दीपक बी. जोशी, संदीप शर्मा आदि ने कविता पाठ किया ।


पेंटिग प्रदर्शनी

चौंथे अंतरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन की खास विशेषता रही दो चित्रकारों की पेंटिग्स की खुली प्रदर्शनी । ये दो कलाकार थे डॉ. जे.एस.बी.नायडू(रायपुर) तथा नागपुर विश्वविद्यालय के फाईन आर्ट संकाय के विभागाध्यक्ष तथा वरिष्ठ चित्रकार डॉ. दीपक बी. जोशी । श्री नायडू के चित्रों की प्रदर्शनी बैंकाक आर्ट गैलरी में भी प्रदर्शित की गई जिसे उल्लेखनीय प्रतिसाद मिला । इस तरह प्रकृति की अनुपम छटा से ओतप्रोत दक्षिण पूर्वी एशिया का एक महत्वपूर्ण देश थाईलैंड की राजधानी और सांस्कृतिक राजधानी क्रमश: बैंकॉक और पटाया में दिनांक 16 से 21 दिसम्बरतक चतुर्थ अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन का आयोजन हुआ । यह आयोजन बैकाक स्थित फुरामा सिलोम तथा पटाया स्थित मंत्रपुरा रिशोर्ट के सभागार में आयोजित हुआ जिसमें बड़ी संख्या में हिंदीप्रेमियों ने प्रतिभागिता रेखांकित की ।

पांचवा अंतरराष्ट्रीय आयोजन रुस में
इस आयोजन में वैभव प्रकाशन का उल्लेखनीय सहयोग रहा । सृजन-सम्मान की ओर से महासचिव जयप्रकाश मानस और डॉ. सुधीर सक्सेना ने घोषणा की कि अगला आयोजन 24जून से 1 जुलाई तक रुस के मास्को, ताशकंद, समरकंद और उज्बेकिस्तान में होगा जिसमें बड़ी संख्या में देश और विदेश के साहित्यकार, रंगकर्मी, हिन्दी-अध्यापक, ब्लॉगर्स तथा पत्रकार भाग लेंगे ।

उल्लेखनीय है कि साहित्य, संस्कृति और भाषा के लिए प्रतिबद्ध साहित्यिक संस्था (वेब पोर्टल )सृजन गाथा डॉट कॉम पिछले पाँच वर्षों से ऐसी युवा विभूतियों को सम्मानित कर रही है जो कला, साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दे रहे हैं । इसके अलावा वह तीन अंतरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलनों का संयोजन भी कर चुकी है जिसका पिछला आयोजन मॉरीशस में किया गया था । अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी और हिंदी-संस्कृति को प्रतिष्ठित करने के लिए संस्था द्वारा, किये जा रहे प्रयासों और पहलों के अनुक्रम में इस बार 15से 21 दिसंबर तक थाईलैंड में चतुर्थ अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन का आयोजन किया गया। सम्मेलन में हिंदी के आधिकारिक विद्वान,अध्यापक, लेखक, भाषाविद्, पत्रकार, टेक्नोक्रेट एवं अनेक हिंदी प्रचारक के रूप में डॉ. डी.के.जोशी, डॉ. कल्पना टेंभुलकर, डॉ. सुखदेव,अखिल सिंह, डॉ. सत्यविश्वास, क्रियेटिव्ह टेव्हल्स के डायरेक्टर विक्की मल्होत्रा, सन्नी मलहोत्रा सहित 50 से अधिक भारतीय तथा थाईलैंड के संस्कृतिकर्मियों ने भाग लिया तथा बैंकाक, पटाया, कोहलर्न आईलैंड, कोरल आईलैंड, थाई कल्चरल शो, गोल्डन बुद्ध मंदिर, विश्व की सबसे बड़ी जैम गैलरी, सफारी वर्ल्ड आदि स्थलों का सांस्कृतिक अध्ययन और पर्यटन के अवसर का भी लाभ उठाया ।

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रामनाथ सिंह अदम गोंडवी के साथ हिंदी संस्थान लखनऊ में

रविवार, 25 दिसंबर 2011

रामनाथ सिंह अदम गोंडवी के साथ हिंदी संस्थान लखनऊ में


हिंदी संस्थान में श्री रामनाथ सिंह अदम गोंडवी के साथ कवि कैलाश निगम, श्री गजेन्द्र सिंह पूर्व विधायक, जवाहर कपूर, वाई.एस लोहित एडवोकेट












रामनाथ सिंह अदम गोंडवी को सम्मान पत्र देते हुए नवीन सेठ, पूर्व विधायक गजेन्द्र सिंह, जवाहर कपूर, वाई एस लोहित







डॉ रामगोपाल वर्मा, बृजमोहन वर्मा , रणधीर सिंह सुमन सम्मान पत्र देते हुए रामनाथ सिंह अदम गोंडवी को








गजेन्द्र सिंह पूर्व विधायक व नवीन सेठ अंग वस्त्रं भेट करते हुए।






















नवीन सेठ श्री रामनाथ सिंह अदम गोंडवी के सम्मान में दो शब्द कहते हुए

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अंदाज ए मेरा: मुर्गा लडाई का रोमांच

रविवार, 18 दिसंबर 2011

अंदाज ए मेरा: मुर्गा लडाई का रोमांच: स्‍पेन, पुर्तगाल और अमेरिका का बुल फायटिंग (सांड युध्‍द) का नजारा मैंने टीवी पर देखा है..... रोमांच का आलम वहां होता है इस खेल के दौरान पर ...

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क्या सिर्फ़ लिख कर ब्लागिंग की जाए : गिरीश बिल्लोरे मुकुल


पद्मसिंह जी के ब्लाग पद्मावलि से साभार 
  हिन्दी ब्लागिंग अब केवल लिपि आधारित ब्लागिंग नहीं रह गई है लोग आडियो-वीडियो ब्लागिंग के लिये भी आगे आ रहे हैं इनमें मध्य-प्रदेश सबसे अव्वल है इन्दौर से अर्चना चावजी “मेरे मन की’’(http://archanachaoji.blogspot.com) ब्लाग पर पाडकास्ट जिसे “आडियो-पोस्ट” का नाम दिया जा सकता है, प्रस्तुत करतीं हैं. इधर जबलपुर एक एक मशहूर ब्लागर महेंद्र मिश्रा एवम भाई डा० विजय तिवारी किसलय भी अपने वेबकास्टिंग  ब्लाग (http://bambuser.com/channel/vijaytiwari5)पर वीडियो-ब्लागिंग अर्थात वेबकास्टिंग करतें हैं.मुझे साल भर पहले उम्मीद न थी कि दिसम्बर 2010 को मेरे द्वारा खोजी गई वेबकास्टिंग को इतनी लोकप्रियता हासिल होगी.
                         पच्चीस बरस पहले किसी को भी यह गलत फ़हमी सम्भव थी कि मीडिया के संस्थागत संगठनात्मक स्वरूप में कोई परिवर्तन सहज ही न आ सकेगा. रेडियो,सूचना का आगमन अखबार, टी. वी.टेलेक्स,टेली-प्रिंटर, फ़ैक्स,फ़ोन,तक सीमित था. संचार बहुत मंहगा भी था तब. एक एक ज़रूरी खबर को पाने-भेजने में किस कदर परेशानी होती थी उसका विवरण  आज की पीड़ी से शेयर करो तो वह आश्चर्य से मुंह ताक़ती कभी कह भी देती है –“ओह ! कितना कुछ अभाव था तब वाक़ई !!”
    और अब उन्हीं ज़रूरतों की बेचैनीयों ने बहुत उम्दा तरीके से “सबसे-तेज़” होने की होड़ लगा दी.इतना ही नहीं   “मीडिया के संस्थागत संगठनात्मक स्वरूप में बदलाव” एकदम क़रीब आ चुका है.ब्लागिंग के विभिन्न स्वरूपों जैसे टेक्स्ट, के साथ ही साथ नैनो और माइक्रो ब्लागिंग का ज़माना भी अब पुराना हो चला तो फ़िर नया क्या है.. नया कुछ भी नहीं बस एकाएक गति पकड़ ली है वेबकास्टिंग ने पाडकास्टिंग के बाद . और यही परम्परागत दृश्य मीडिया के संस्थागत आकार के लिये विकल्प बन चुका है. लोगों के हाथ में थ्री-जी तक़नीक़ी वाले सेलफोन हैं.जिसके परिणाम स्वरूप अन्ना के तिहाड़ जेल में जाने पर वहां जमा भीड़ का मंज़र लोग अपने घर-परिवार को दिखाते रहे. जबकि  न्यूज़ चैनल से खबर आने में देर लगी. हिन्दी ब्लागिंग में वेब कास्टिन्ग का प्रयोग उत्तराखण्ड के खटीमा शहर में दिनांक 09-01-2011 एवम 10-01-2011 को  साहित्य शारदा मंच के तत्वावधान में डारूपचन्द्र शास्त्री मयंक’ की  दो पुस्तकों क्रमशः सुख का सूरज” (कविता संग्रह) एवं नन्हें सुमन (बाल कविता का संग्रह) का लोकार्पण समारोह एवं ब्लॉगर्स मीट के सीधे प्रसारण से किया गया. जिसमें  किसी भी हिंदी ब्लॉगर सम्मलेन और संगोष्ठी के लिए यह प्रथम अवसर था जिसका जीवंत प्रसारण अंतर्जाल के माध्यम से किया हो. समारोह का जीवंत प्रसारण पूरे समारोह के दौरान खटीमा से पद्मावलि ब्लॉग के पद्म सिंह और अविनाश वाचस्पति के साथ  जबलपुर से मिसफिट-सीधीबात  ब्लॉग के संचालक यानी  मैने किया . बस फ़िर क्या था सिलसिला जारी रहा बीसीयों टाक-शो, साक्षात्कार के साथ साथ दिल्ली से 30 अप्रैल 2011 के कार्यक्रम का सीधा प्रसारण किया. यह प्रयोग सर्वथा प्रारम्भिक एकदम कौतुकपूर्ण  प्रदर्शन था लोग जो हिंदी ब्लागिंग के लिये समर्पित हैं उनको यह क़दम बेहद रुचिकर लगा.
 वेबकास्टिंग क्या है ?
वेबकास्टिंग किसी भी घटना का सीधा अथवा रिकार्डेड  प्रसारण है जो थ्री-जी तक़नीकी के आने के पूर्व यू-ट्यूब, ustream, अथवा बैमबसर, जैसी साइट्स के ज़रिये सम्भव थी. आप इसके ज़रिये घटना को रिकार्ड कर लाईव अथवा रिकार्डेड रूप में अंतरजाल पर अप-लोड कर सकतें हैं.
  इसके लिये आप http://bambuser.com/  अथवा www.ustream.tv पर खाता खोल के जीवंत कर सकते हैं उन घटनाओं को आपके इर्द गिर्द घटित हो रहीं हों. इतना ही नहीं इस तक़नीकी के ज़रिये आप भारत में पारिवारिक एवम घरेलू आयोजनो को अपने उन नातेदारों तक भेज सकतें हैं जो कि विश्व के किसी भी कोने में हैं अपनी रोज़गारीय मज़बूरी की वज़ह से.आपसे दूर हैं . यदी भारत में नेट की स्पीड में धीमापन खत्म हुआ तो वेबकास्टिंग आने वाले समय में व्यवसायिक स्वरूप ले सकती . आम इन्सान अपने वैवाहिक पारिवारिक समारोहों में विश्व में बसे अपने नाते-रिश्तेदारों तक सजीव प्रसारण भेज सकते हैं जिसे केवल वे ही लोग देख सकते हैं जिनको आयोजक चाहें. 

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अभिव्यक्ति के नाम पर भड़ास की छूट दे दी जाए?

शनिवार, 17 दिसंबर 2011

इन दिनों सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर लगाम कसे जाने की खबर पर हंगामा मचा हुआ है। खासकर बुद्धिजीवियों में अंतहीन बहस छिड़ी हुई है। लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की दुहाई देते हुए जहां कई लोग इसे संविधान की मूल भावना के विपरीत और तानाशाही की संज्ञा दे रहे हैं, वहीं कुछ लोग अभिव्यक्ति की आजादी के बहाने चाहे जिस का चरित्र हनन करने और अश्लीलता की हदें पार किए जाने पर नियंत्रण पर जोर दे रहे हैं।
यह सर्वविदित ही है कि इन दिनों हमारे देश में इंटरनेट व सोशल नेटवर्किंग साइट्स का चलन बढ़ रहा है। आम तौर पर प्रिंट और इलैक्ट्रॉनिक मीडिया पर जो सामग्री प्रतिबंधित है अथवा शिष्टाचार के नाते नहीं दिखाई जाती, वह इन साइट्स पर धड़ल्ले से उजागर हो रही है। किसी भी प्रकार का नियंत्रण न होने के कारण जायज-नाजायज आईडी के जरिए जिसके मन जो कुछ आता है, वह इन साइट्स पर जारी कर अपनी कुंठा शांत कर रहा है। अश्लील चित्र और वीडियो तो चलन में हैं ही, धार्मिक उन्माद फैलाने वाली सामग्री भी पसरती जा रही है। राजनीति और नेताओं के प्रति उपजती नफरत के चलते सोनिया गांधी, राजीव गांधी, मनमोहन सिंह, कपिल सिब्बल, दिग्विजय सिंह सहित अनेक नेताओं के बारे में शिष्टाचार की सारी सीमाएं पार करने वाली टिप्पणियां और चित्र भी धड़ल्ले से डाले जा रहे हैं। प्रतिस्पद्र्धात्मक छींटाकशी का शौक इस कदर बढ़ गया है कि कुछ लोग अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के बारे में भी टिप्पणियां करने से नहीं चूक रहे। ऐसे में केन्द्रीय दूरसंचार और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री कपिल सिब्बल ने जैसे ही यह कहा कि उनका मंत्रालय इंटरनेट में लोगों की छवि खराब करने वाली सामग्री पर रोक लगाने की व्यवस्था विकसित कर रहा है और सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स से आपत्तिजनक सामग्री को हटाने के लिए एक नियामक व्यवस्था बना रहा है तो बवाल हो गया। इसे तुरंत इसी अर्थ में लिया गया कि वे सोनिया व मनमोहन सिंह के बारे में आपत्तिजनक सामग्री हटाने के मकसद से ऐसा कर रहे हैं। एक न्यूज चैनल ने तो बाकायदा न्यूज फ्लैश में इसे ही हाइलाइट करना शुरू कर दिया, हालांकि दो मिनट बाद ही उसने संशोधन किया कि सिब्बल ने दोनों का नाम लेकर आपत्तिजनक सामग्री हटाने की बात नहीं कही है।
बहरहाल, सिब्बल के इस कदम की देशभर में आलोचना शुरू हो गई। बुद्धिजीवी इसे अभिव्यक्ति की आजादी पर अंकुश के रूप में परिभाषित करने लगे, वहीं मौके का फायदा उठा कर विपक्ष ने इसे आपातकाल का आगाज बताना शुरू कर दिया। हालांकि सिब्बल ने स्पष्ट किया कि सरकार का मीडिया पर सेंसर लगाने का कोई इरादा नहीं है। सरकार ने ऐसी वेबसाइट्स से संबंधित सभी पक्षों से बातचीत की है और उनसे इस तरह की सामग्री पर काबू पाने के लिए अपने पर खुद निगरानी रखने का अनुरोध किया, लेकिन सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स के संचालकों ने इस बारे में कोई ठोस जवाब नहीं दिया। उनका तर्क ये था कि साइट्स के यूजर्स के इतने अधिक हैं कि ऐसी सामग्री को हटाना बेहद मुश्किल काम है। अलबत्ता ये आश्वासन जरूर दिया कि जानकारी में आते ही आपत्तिजनक सामग्री को हटा दिया जाएगा।
जहां तक अभिव्यक्ति की आजादी का सवाल है, मोटे तौर पर यह सही है कि ऐसे नियंत्रण से लोकतंत्र प्रभावित होगा। इसकी आड़ में सरकार अपने खिलाफ चला जा रहे अभियान को कुचलने की कोशिश कर सकती है, जो कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए घातक होगा। लेकिन सवाल ये उठता है कि क्या अभिव्यक्ति की आजादी के मायने यह हैं कि फेसबुक, ट्विटर, गूगल, याहू और यू-ट्यूब जैसी वेबसाइट्स पर लोगों की धार्मिक भावनाओं, विचारों और व्यक्तिगत भावना से खेलने तथा अश्लील तस्वीरें पोस्ट करने की छूट दे दी जाए? व्यक्ति विशेष के प्रति अमर्यादित टिप्पणियां और अश्लील फोटो जारी करने दिए जाएं? किसी के खिलाफ भड़ास निकालने की खुली आजादी दे दी जाए? सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर इन दिनों जो कुछ हो रहा है, क्या उसे अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर स्वीकार कर लिया जाये?
चूंकि ऐसी स्वच्छंदता पर काबू पाने का काम सरकार के ही जिम्मे है, इस कारण जैसे ही नियंत्रण की बात आई, उसने राजनीतिक लबादा ओढ लिया। राजनीतिक दृष्टिकोण से हट कर भी बात करें तो यह सवाल तो उठता ही है कि क्या हमारा सामाजिक परिवेश और संस्कृति ऐसी अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर आ रही अपसंस्कृति को स्वीकार करने को राजी है? माना कि इंटरनेट के जरिए सोशल नेटवर्किंग के फैलते जाल में दुनिया सिमटती जा रही है और इसके अनेक फायदे भी हैं, मगर यह भी कम सच नहीं है कि इसका नशा बच्चे, बूढ़े और खासकर युवाओं के ऊपर इस कदर चढ़ चुका है कि वह मर्यादाओं की सीमाएं लांघने लगा है। अश्लीलता व अपराध का बढ़ता मायाजाल अपसंस्कृति को खुलेआम बढ़ावा दे रहा है। जवान तो क्या, बूढ़े भी पोर्न मसाले के दीवाने होने लगे हैं। इतना ही नहीं फर्जी आर्थिक आकर्षण के जरिए धोखाधड़ी का गोरखधंधा भी खूब फल-फूल रहा है। साइबर क्राइम होने की खबरें हम आए दिन देख-सुन रहे हैं। जिन देशों के लोग इंटरनेट का उपयोग अरसे से कर रहे हैं, वे तो अलबत्ता सावधान हैं, मगर हम भारतीय मानसिक रूप से इतने सशक्त नहीं हैं। ऐसे में हमें सतर्क रहना होगा। सोशल नेटवर्किंग की  सकारात्मकता के बीच ज्यादा प्रतिशत में बढ़ रही नकारात्मकता से कैसे निपटा जाए, इस पर गौर करना होगा।
-tejwanig@gmail.com

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खुद के गिरेबां में भी झांके टीम अन्ना

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2011

इसमें कोई दोराय नहीं है कि आर्थिक आपाधापी और भ्रष्ट राजनीति के कारण भ्रष्टाचार के तांडव से त्रस्त देशवासियों की टीम अन्ना के प्रति अगाध आस्था और विश्वास उत्पन्न हुआ है और आम आदमी को उनसे बड़ी उम्मीदें हैं, मगर टीम के कुछ सदस्यों को लेकर उठे विवादों से तनिक चिंता की लकीरें भी खिंच गई हैं। हालांकि कहने को यह बेहद आसान है कि सरकार जवाबी हमले के बतौर टीम अन्ना को बदनाम करने के लिए विवाद उत्पन्न कर रही है, और यह बात आसानी से गले उतर भी रही है, मगर मात्र इतना कह कर टीम अन्ना के लिए बेपरवाह होना नुकसानदेह भी हो सकता है। इसमें महत्वपूर्ण ये नहीं है कि किन्हीं विवादों के कारण टीम अन्ना के सदस्य बदनाम हो रहे हैं, बल्कि ये महत्वपूर्ण है कि विवादों के कारण भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़ा हुआ आंदोलन प्रभावित हो सकता है। आंदोलन के नेता भले ही अन्ना हजारे हों, मगर यह आंदोलन अन्ना का नहीं, बल्कि जनता का है। यह वो जनता है, जिसमें भ्रष्टाचार के खिलाफ गुस्सा है और उसे अन्ना जैसा नेता मिल गया है, इस कारण वह उसके साथ जुड़ गई है।
वस्तुत: जब से टीम अन्ना का आंदोलन तेज हुआ है, उसके अनेक सदस्यों को विवादों में उलझाने की कोशिशें हुई हैं। पुराने मामलों को खोद-खोद कर बाहर निकाला जा रहा है। साफ तौर पर यह बदले की भावना से की गई कार्यवाही प्रतीत होती है। लेकिन इसका ये मतलब भी नहीं है कि टीम अन्ना पर लगे आरोप पूरी तरह से निराधार हैं। जरूर कुछ न कुछ तो बात है ही। अरविंद केजरीवाल के मामले को ही लीजिए। यह सवाल जरूर वाजिब है कि उन पर बकाया की याद कई साल बाद और आंदोलन के वक्त की कैसे आई, मगर यह भी सही है कि केजरीवाल कहीं न कहीं गलत तो थे ही। और यही वजह है कि उन्होंने चाहे अपने मित्रों से ही सही, मगर बकाया चुकाया ही है। इसी प्रकार किरण बेदी पर हो आरोप लगा, वह भी आंदोलन में सक्रिय भागीदारी का प्रतिफल है, मगर उससे भी कहीं न कहीं ये बात तो उठी ही है कि किरण बेदी ने कुछ तो चूक की ही है, वरना उन्हें राशि लौटने की बात क्यों कहनी पड़ती। प्रशांत भूषण का विवाद तो साफ तौर पर आ बैल मुझे मार वाली कहावत चरितार्थ करता है। लोकतंत्र में हर व्यक्ति को अपना विचार रखने की आजादी है, मगर एक ओर जब पूरा देश टीम अन्ना को आदर्श मान कर आंदोलनरत थी, तब प्रशांत भूषण का कश्मीर के बारे में निजी विचार जाहिर करना बेमानी था ही, टीम अन्ना को मुश्किल में डालने वाला था। जाहिर तौर पर आज यदि प्रशांत भूषण को पूरा देश जान रहा है तो उसकी वजह है टीम अन्ना का आंदोलन, ऐसे में टीम अन्ना के प्रमुख प्रतिनिधि का निजी विचार अनावश्यक रूप से पूरी टीम के लिए दिक्कत का कारण बन गया। उससे भी बड़ी बात ये है कि यदि किसी एक सदस्य के कारण आंदोलन पर थोड़ा भी असर पड़ता है, तो यह ठीक नहीं है। अत: बेहतर ये ही होगा भी वे पूरा ध्यान आंदोलन पर ही केन्द्रित करें, उसे भटकाने वालों को कोई मौका न दें।
वस्तुत: टीम अन्ना के सदस्यों को यह सोचना होगा कि आज वे पूरे देश के एक आइडल के रूप में देखे जा रहे हैं, उनका व्यक्तित्व सार्वजनिक है, तो उन्हें अपनी निजी जीवन को भी पूरी तरह से साफ-सुथरा रखना होगा। लोग उनकी बारीक से बारीक बात पर भी नजर रख रहे हैं, अत: उन्हें अपने आचरण में पूरी सावधानी बरतनी होगी। जब उनका एक नार पूरे देश को आंदोलित कर देता है तो उनकी निजी बात भी चर्चा की विषय हो जाती है। टीम के मुखिया अन्ना हजारे को ही लीजिए। हालांकि वे मूल रूप से अभी जनलोकपाल बिल के लिए आंदोलन कर रहे हैं, मगर उनके प्रति विश्वास इतना अधिक है कि देश के हर ज्वलंत मुद्दे पर उनकी राय जानने को पूरा देश आतुर रहता है। तभी तो जैसे ही केन्द्रीय मंत्री शरद पवार को एक युवक ने थप्पड़ मारा तो रालेगणसिद्धी में मौजूद मीडिया ने उनकी प्रतिक्रिया भी जानने की कोशिश की। बेहतर तो ये होता कि वे इस पर टिप्पणी ही नहीं करते और टिप्पणी करना जरूरी ही लग रहा था तो इस घटना का निंदा भर कर देते, मगर अति उत्साह और कदाचित सरकार के प्रति नाराजगी के भाव के कारण उनके मुंह से यकायक ये निकल गया कि बस एक ही थप्पड़। हालांकि तुरंत बाद उन्होंने बयान को सुधारा, मगर चंद दिन बाद ही फिर पलटे और उसे जायज ठहराने की कोशिश करते हुए नए गांधीवाद की रचना करने लगे। उन्हें ख्याल में रखना चाहिए कि आज यदि वे पूज्य हो गए हैं तो उसकी वजह ये है कि उन्होंने गांधीवाद का सहारा लिया। विचारणीय है कि आज जब अन्ना हजारे एक आदर्श पुरुष और प्रकाश पुंज की तरह से देखे जा रहे हैं तो उनकी हर छोटी से छोटी बात को आम आदमी बड़े गौर से सुनता है। ऐसे में उनका एक-एक वाक्य सधा हुआ होना ही चाहिए। देखिए न, चंद लफ्जों ने कैसे अन्ना को परेशानी में डाल दिया। अव्वल तो उन्हें पहले केवल लोकपाल बिल पर ही ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। यदि सभी राष्ट्रीय मुद्दों और घटनाओं पर भी अपनी राय थोपने का ठेका लेंगे तो आंदोलन गलत दिशा में भटक सकता है।
बहरहाल, इन सारी बातों के बाद भी जहां तक आंदोलन का सवाल है, वह जिस पवित्र उद्देश्य को लेकर हो रहा है, उसके प्रति जनता पूरी तरह से समर्पित है, मगर टीम अन्ना को अपने व्यक्तिगत आचरण पर पूरा ध्यान रखना चाहिए। इससे विरोधियों को अनावश्यक रूप से हमले करने का मौका मिलता है। आज पूरा देश यही चाहता है कि आंदोलन कामयाब हो, मगर छोटी-छोटी बातों से अगर आंदोलन प्रभावित होता है तो यह जनता के साथ अन्याय ही कहलाएगा, जिसके सामने एक लंबे अरसे बाद आशा की किरण चमक रही है।
tejwanig@gmail.com

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गुरुवार, 8 दिसंबर 2011

मेरे हाइकू--1- उड़ती तुम, चिढाती बागंवा को, आजाद मै हूं-2- पेड़ो का वस्त्र, जब तक हरा था, सूखा धरा का। 3-- मै पर्वत हूं, द्रढता ले लो मेरी , गिरो, खड़े हो। 4 मै फूल हूं, इच्छा है मेरी चढूं, वीरों की अर्थी ।

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सिर्फ हंगामा करना मेरा मकसद नहीं आप लोगों के साथ मिलकर अराजकता फेलाने वालों को सबक सिखाना ही मेरा मकसद

मंगलवार, 6 दिसंबर 2011


जी हाँ मेरे दोस्तों मेरे ब्लोगर..ट्विटर और फेसबुक ब्रदर्स सिस्टर्स मेरी एक कोशिश एक पहल का कुछ नतीजा सामने आया और इंटरनेट के नाम पर गंदगी फेलाने वालों को सबक सिखाने के मामले में पहल शुरू हुई ......... दोस्तों जो मेरे ब्लॉग पढ़ते हैं जो मुझे जानते हैं जो मुझे मानते हैं उन्हें पता है के इंटरनेट के नाम पर फर्जी आई डी बना कर या फिर खुद की आई डी से किसी भी व्यक्ति का मजाक उडाना किसी के भी धर्म का उपहास उड़ाना देश में साम्प्रदायिक सद्भाव और अमन चेन को बिगाड़ने के लियें कोरी बकवास बाज़ी करा इंटरनेट के कुछ अपराधियों की आदत बन गयी है और उनके दिमाग में सिर्फ एक ही बात है के हम तो अपने कमरे में बेठ कर यह अपराध बढ़ी चालाकी से कर रहे हैं हमे कोन और केसे पकड़ सकेगा ..... मेने पहले भी अपने ऐसे साथियों को चेताया था उनसे हाथ जोड़ कर निवेदन किया था इस के मामले में जो कानून हैं जो सजा के प्रावधान है किन किन को सजा मिली है और कोन है ऐसे बेवकूफ जिन्होंने खेल खेल में ऐसा अपराध कर अपनी जिंदगी बर्बाद कर ली है लेकिन कानून को हंसी खेल समझने वाले लोगों ने सरकार की काहिली का खूब फायदा उठाया .......... दोस्तों चेतावनी के बाद जब सुधार नहीं आया तो मेने आप लोगों की सहमती लेकर इस मामले में दोषी लोगों को सज़ा दिलवाने के लियें कार्यवाही शुरू की मेने इस मामले में प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह ..... सोनिया गाँधी ॥ राहुल गाँधी । कपिल सिब्बल और महामहिम राष्ट्रपति महोदया को पत्र लिखे ओन लाइन शिकायतें दर्ज करवाई शिकायत दर्ज हुई अधिकारी नियुक्त हुए और मेरी शिकायत और कानूनी प्रावधान सही निकलने पर ऐसे लोगों के खिलाफ कार्यवाही के पहले एक चेतावनी देने का निर्णय सरकार ने लिया जो ठीक और स्वागत योग्य था मुझे खुद राहुल गांधी ने धन्यवाद पत्र लिखा और इसे एक अहम सुझाव माँगा अपने एक मित्र से उत्तर प्रदेश में इस मामले में जनहित याचिका लगवाई लेकिन उदयपुर में ऐसे अपराधियों की वजह से हंगामा हुआ उत्तर प्रदेश इन्दोर में तमाशा हुआ राहुल गाँधी के नाम से फर्जी आई डी बनाई गयी और अपराधी पकड़े गये ऐसे हालातों में जो लोग वाक् और अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का दुरूपयोग कर देश के कानूनों को तोड़ कर अगर अराजकता फेलाना चाहते है तो वोह देश के दुश्मन है ॥ में या मेरा कोई भी दोस्त समर्थक कभी भी लिखने और बोलने की आज़ादी के खिलाफ नहीं रहे हमेशा इस मामले में मिलकर लड़ाई लड़ी है खुद एक पत्रकार समाजसेवक और वकील के नाते मेने खुद ने कई बढ़ी लडाइयां इस मामले में लड़ी हैं और जीती हैं ..... आप खुद बताएं कोई आप को माँ बहन की गली दे और कहे के यह बोलने की स्वतन्त्रता है कोई आपके नंगे फोटू नकली बनाकर किसी के साथ स्केन कर प्रकाशित करे और कहे के यह तो लिखने और प्रकाशन की स्वंतन्त्रता है तो जनाब इससे बुरा और क्या होगा । जो लोग ऐसा अपराध करते हैं उन्हें हमे और आपको मिलकर बेनकाब करना होगा ताकि हमारा सुकून हमारे लिखें बोलने और पढने की आज़ादी शान्ति सद्भाव बना रहे ... अभी कल ही मेने फेसबुक खोली मेने देखा एक अजमेर के पत्रकार सज्जन ने राहुल गाँधी ॥ मनमोहन और चिदम्बरम के मुखोटे लगाकर नंगे लोगों की अश्लील तस्वीर के साथ जोड़ दिए और उनके हाथ नग्न तस्वीर में उनके लिंग पर लगा दिए अब आप खुद बताइए क्या यह वाक् और अभिव्यक्ति की स्वत्न्र्ता है क्या यह एक सोशल साईट से जुड़े लोगो के साथ मजाक और उनका अपमान नहीं अगर हाँ तो दोस्तों मेने ठानी है के इन जनाब को पहले एक बार इस आलेख के माध्यम से चेताता हूँ के वोह अपनी गलती मानले और सार्वजनिक रूप से एक माफ़ी नाम इस संदेश के साथ के यह गलत बात है और ऐसी गलती के लियें किसी को माफ़ नहीं करना चाहिए प्रकाशित करें वरना कानूनी कार्यवाही अदालत सजा और सुनवाई क्या होती है इसका प्रेक्टिकल जब देखने को मिलेगा तो जिंदगी का आधा वक्त घर परिवार छोड़ कर कोटा की अदालतों में गुजर जाएगा इसलियें कहता हूँ भाई माफ़ करो अपने गुस्से को काबू रखो जानवर मत बनो और इंसान बनकर हमारे देश के इस कानून संविधान की रक्षा करो कानून और संविधान के दायरे में रह कर देश में अराजकता फेलाने वालों से निर्भीक और निडर होकर उनके अपराध उजागर कर उनके खिलाफ मुकदमे दर्ज करवाकर उनसे निपटो किसी का अपमान करने या किसी के धर्म का मजाक उढ़ा लेने से हम महान नहीं बन जाते हमारे शरीर में किसी का गंदा खून बह रहा है सिर्फ ऐसी गलती से हम यही साबित करते है तो दोस्तों आओं एक प्यार भरा सुकून और शांति वाला ज्ञानवर्धक सूचनाओं का आदान प्रदान करने वाला नेटवर्क तय्यार करें जिसमे अगर कोई इतना समझाने पर भी नहीं मानकर कोड में खाज बनता है तो फिर उसे दंडित करवाएं करोगे मेरी मदद या मुझे यूँ ही इस लड़ाई में अकेला रखोगे मेरे भाई मेरी बहनों मेरे बुजुर्गों ............. अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

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केन्द्र को हिला कर रख दिया मायावती ने

हाल ही उत्तरप्रदेश विधानसभा में मुख्यमंत्री सुश्री मायावती की बसपा सरकार ने राज्य को चार राज्यों में बांटने का प्रस्ताव पारित कर केन्द्र सरकार को हिला कर रख दिया है। हालांकि छोटे राज्यों का मुद्दा पहले भी गरमाता रहा है और उसकी वजह से कुछ राज्यों के टुकड़े भी किए गए हैं, मगर मायावती ने एक राज्य को चार हिस्सों में बांटने का प्रस्ताव पारित करवा एक नया संकट पैदा कर दिया है।
सर्वविदित ही है कि देश में पहले से कुछ राज्यों में विभाजन को लेकर आंदोलन हो रहे हैं। आन्ध्रप्रदेश से तेलंगाना अलग करने को लेकर लंबे अरसे से टकराव जारी है। वहा उग्र और भारी उठापटक वाला आंदोलन चल रहा है। महाराष्ट्र और कर्नाटक के बीच बेलगांव को लेकर चल रही खींचतान के कारण अनेक जानें जा चुकी हैं। ऐसे में जाहिर है कि मायावती के इस नए पैंतरे से अन्य प्रांतों में भी यह आग भड़क सकती है। हालांकि जैसे ही प्रस्ताव पारित हुआ तो देशभर के बुद्धिजीवी इसी बहस में उलझ गए कि राज्यों के पुनर्गठन व छोटे राज्यों के क्या लाभ-हानि होते हैं, मगर धरातल की सच्चाई ये है कि मायावती यह प्रस्ताव पूरी तरह राजनीति से प्रेरित है।
जहां तक इस मुद्दे के सैद्धांतिक पक्ष की बात है, पक्ष-विपक्ष दोनों के अपने-अपने तर्क हैं, जो अपनी-अपनी जगह सही ही प्रतीत होते हैं।  छोटे राज्यों की पैरवी करने वाले यह तर्क दे रहे हैं कि बड़े राज्य में कानून-व्यवस्था को संभालना बेहद कठिन होता है और सरकारों का ज्यादा समय कानून-व्यवस्था की समस्याओं से जूझने में ही खर्च होता है। और इसकी वजह से सरकारें विकास की ओर पर्याप्त ध्यान नहीं दे पातीं। उनका तर्क है कि छोटे राज्य में विकास करना आसान होता है, क्योंकि वहां सामान्य कामकाज की समस्याएं कम होती हैं, सभी जिलों पर पकड़ अच्छी होती है, इस कारण विकास पर ज्यादा ध्यान दिया जा सकता है। दूसरी ओर छोटे राज्यों के खिलाफ राय रखने वालों की मान्यता है कि छोटे राज्यों के सामने सदैव संसाधनों के अभाव की समस्या रहती है। ऐसे में वे या तो अपने निकटवर्ती राज्य से प्रभावित रहते हैं या केन्द्र सरकार के रहमो-करम पर निर्भर। केन्द्र पर निर्भरता के चलते उसकी अपनी स्वायत्तता प्रभावित होती है। ये तो हुई तर्क-वितर्क की बात, मगर धरातल पर जा कर देखें तो निर्णय करने में भारी असमंजस उत्पन्न होता है। यह सर्वविदित ही है कि छोटे राज्य मणिपुर, मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम राजनीतिक अस्थिरता से गुजरते रहते हैं और वे विकास के मामले में पिछड़ते जा रहे हैं। बिहार को काट कर बनाए गए झारखंड की बात करें तो वहां की हालत काफी खराब है। विकास करना तो दूर हर वक्त राजनीतिक अस्थिरता बनी रहती है। इसके ठीक विपरीत मध्यप्रदेश को काट कर बनाए गए छत्तीसगढ़ में पर्याप्त प्रगति हुई है। हालांकि इसके पीछे वहां की सरकार की कार्यकुशलता की दुहाई दी जाती है। बड़े राज्यों में विकास कठिन है, इस तर्क का समर्थन करने वाले उत्तरप्रदेश और जम्मू-कश्मीर का उदाहरण देते हैं। जम्मू-कश्मीर में अकेले कश्मीर घाटी में व्याप्त आतंकवाद की वजह से पूरे राज्य का विकास ठप पड़ा है। इसी वजह से कुछ लोग सुझाव देते हैं कि राज्य को जम्मू, कश्मीर और लद्दाख में बांट दिया जाए, ताकि कम से कम जम्मू व लद्दाख तो प्रगति करें। उधर गुजरात जैसा बड़ा राज्य प्रगति के ऐसे आयाम छू रहा है, जिसकी देश ही नहीं बल्कि विश्व में भी तारीफ हो रही है। वह एक आदर्श विकास मॉडल के रूप में उभर आया है। 
कुल मिला कर सवाल ये खड़ा होता है कि आखिर सही क्या है? छोटे राज्य का आकार तय करने का फार्मूला क्या हो? और उसका उत्तर ये ही है कि भौगोलिक स्थिति, संसाधनों और जनभावना को ध्यान में रख कर ही निर्णय किया जाना चाहिए। लेरिक सच्चाई इसके ठीक विपरीत है। इस मुद्दे को लेकर लगातार राजनीति होती है। राजनीतिक दल अपने-अपने हित के हिसाब से पैंतरे चलते हैं। उत्तप्रदेश की बात करें तो हालांकि मोटे तौर पर मायावती ने ध्यान तो जनता की मांग का रखा है, मगर उसमें भी इस बात का ध्यान ज्यादा रखा है कि उनकी पार्टी को ज्यादा से ज्यादा लाभ हो। अर्थात चार राज्य होने पर चारों में ही उनकी पार्टी की सरकार बने। और इसी चक्कर में कुछ जिलों के बारे में किया गया निर्णय साफ तौर पर अव्यावहारिक है। कांग्रेस व भाजपा सहित अन्य दल जानते हैं कि मायावती के इस पैंतरे से बसपा को ही ज्यादा फायदा होने वाला है। वे समझ रहे हैं कि चार राज्य तो होंगे जब होंगे, मगर चंद माह बाद ही होने जा रहे विधानसभा चुनाव में मायावती इसका सीधा-सीधा फायदा उठा सकती हैं। इस कारण वे जम कर विरोध कर रहे हैं। हालांकि वे भी छोटे राज्यों के पक्षधर तो हैं, मगर मायावती की चाल के आगे निरुतर हो गए हैं। उनके पास ऐतराज करने को सिर्फ ये है कि अगर मायावती को यह निर्णय करना ही था तो साढ़े चार साल तक क्या करती रहीं, ऐन चुनाव के वक्त ही क्यों निर्णय किया? अर्थात वे केवल राजनीतिक लाभ की खातिर ऐसा कर रही हैं। उनका दूसरा तर्क ये है कि जिस तरह से प्रस्ताव पारित किया गया, वह अलोकतांत्रिक है क्योंकि इस पर न तो जनता के बीच सर्वे कराया गया और न ही अन्य दलों से राय ली गई। आरोप-प्रत्यारोप के बीच तर्क भले ही कुछ भी दिए जाएं, मगर यह बिलकुल साफ है कि राज्यों के पुनर्गठन के मामले में सियासत ज्यादा हावी है और इसी कारण विकास के मौलिक सिद्धांत के नजरअंदाज होने की आशंका अधिक है।
इससे भी अहम पहलु ये है कि भले ही राज्यों का पुनर्गठन करना केन्द्र सरकार के हाथ में है, मगर देश की एकता व अखंडता की जिम्मेदारी के नाते मायावती ने उसके सामने एक संकट तो खड़ा कर ही दिया है। पहले से ही अनेक भागों में पनप रहे अलगाववाद को इससे बल मिलने की आशंका है। देखते हैं कि अब केन्द्र इस मामले में क्या रुख अख्तियार करता है।
tejwanig@gmail.com

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ग़ज़लगंगा.dg: ख्वाहिशों के जिस्मो-जां की.....

शनिवार, 3 दिसंबर 2011

ख्वाहिशों के जिस्मो-जां की बेलिबासी देख ले.

काश! वो आकर कभी मेरी उदासी देख ले.


कल मेरे अहसास की जिंदादिली भी देखना

आज तो मेरे जुनूं की बदहवासी देख ले.


हर तरफ फैला हुआ है गर्मपोशी का हिसार

वक़्त के ठिठुरे बदन की कमलिबासी देख ले.


आस्मां से बादलों के काफिले रुखसत हुए

फिर ज़मीं पे रह गयी हर चीज़ प्यासी देख ले.


और क्या इस शहर में है देखने के वास्ते

जा-ब-जा बिखरे हुए मंज़र सियासी देख ले.


वहशतों की खाक है चारो तरफ फैली हुई

आदमी अबतक है जंगल का निवासी देख ले.


एक नई तहजीब उभरेगी इसी माहौल से

लोग कहते हैं कि गौतम सन उनासी देख ले.



---देवेंद्र गौतम

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राजनीति ज्यादा हो रही है छोटे राज्यों के मुद्दे पर

गुरुवार, 1 दिसंबर 2011

उत्तरप्रदेश विधानसभा में हाल ही मुख्यमंत्री सुश्री मायावती की पहल पर बहुजन समाज पार्टी की सरकार द्वारा पारित राज्य को चार भागों में बांटने का प्रस्ताव पारित किए जाने का मुद्दा इन दिनों गर्माया हुआ है। हालांकि प्रत्यक्षत: तो यही लग रहा है कि राज्यों के पुनर्गठन और छोटे राज्यों के लाभ-हानि को लेकर बहस हो रही है, मगर वस्तुत: इसके पीछे राजनीति कहीं ज्यादा नजर आती है।
छोटे राज्यों के पक्षधर यह तर्क दे रहे हैं कि बड़े राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था संभालना कठिन काम है और सरकार का अधिकतर समय उस व्यवस्था को कायम रखने में खर्च होता है, इससे विकास की ओर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा सकता। जबकि छोटे राज्य में विकास करना आसान होता है। दूसरी ओर इसके विपरीत राय रखने वालों का कहना है कि छोटे राज्य के सामने संसाधनों का अभाव होने की आशंका रहती है, इस कारण केन्द्र अथवा अन्य राज्य के प्रति उसकी निर्भरता बढ़ जाती है। दोनों पक्षों के तर्क अपने-अपने हिसाब से ठीक ही प्रतीत होते हैं। मगर धरातल की तस्वीर कुछ और ही है। अलग-अलग मामलों में अलग-अलग तर्क सही बैठ रहे हैं।
बानगी देखिए। एक ओर मणिपुर, मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम जैसे छोटे-छोटे राज्य विकास के मामले में पिछड़ रहे हैं, जबकि गुजरात जैसा बड़ा राज्य प्रगति के नए आयाम छू रहा है। इसी प्रकार बिहार को काट कर बनाए गए झारखंड की हालत खराब है और वहां राजनीतिक अस्थिरता साफ देखी जा सकती है। विकास तो दूर की बात है। उधर मध्यप्रदेश को काट कर बनाए गए छत्तीसगढ़ में पर्याप्त प्रगति हुई है। हालांकि इसके पीछे वहां की सरकार की कार्य कुशलता की दुहाई दी जाती है। बड़े राज्यों में विकास कठिन है, इस तर्क का समर्थन करने वाले उत्तरप्रदेश और जम्मू-कश्मीर का उदाहरण देते हैं। जम्मू-कश्मीर में अकेले कश्मीर घाटी में व्याप्त आतंकवाद की वजह से पूरे राज्य का विकास ठप पड़ा है। इसी वजह से कुछ लोग सुझाव देते हैं कि राज्य को जम्मू, कश्मीर और लद्दाख में बांट दिया जाए, ताकि कम से कम जम्मू व लद्दाख तो प्रगति करें।
कुल मिला कर सवाल ये खड़ा होता है कि आखिर छोटे राज्य का आकार तय करने का फार्मूला क्या हो? और उसका उत्तर ये ही है कि दोनों की पक्षों की बातों में सामंजस्य बैठा कर धरातल के तथ्यों को ध्यान में रखते हुए निर्णय किया जाए। बीच का रास्ता निकाला जाए। मगर वस्तुत: ऐसा हो नहीं पा रहा। पुनर्गठन को लेकर होती सियासत के कारण टकराव की नौबत तक आ गई है। महाराष्ट्र और कर्नाटक के बीच बेलगांव को लेकर चल रही खींचतान के कारण अनेक जानें जा चुकी हैं। आन्ध्रप्रदेश से तेलंगाना अलग करने को लेकर लंबे अरसे से टकराव जारी है। अर्थात पुनर्गठन की सारी खींचतान सियासी ज्यादा है। उत्तप्रदेश की बात करें तो हालांकि मोटे तौर पर मायावती ने जनता की मांग का ध्यान रखा है, मगर उसमें भी इस बात का ध्यान ज्यादा रखा है कि उनकी पार्टी को ज्यादा से ज्यादा लाभ हो। अर्थात चार राज्य होने पर चारों में ही उनका वर्चस्व हो। और इसी चक्कर में कुछ जिलों के बारे में किया गया निर्णय साफ तौर पर अव्यावहारिक  हो गया है। अन्य राजनीतिक दलों की परेशानी ये है कि ताजा निर्णय से बसपा को ही ज्यादा फायदा होने वाला है। एक तो जल्द ही होने वाले विधानसभा चुनाव में बसपा जनहित का ध्यान रखे जाने के निर्णय के कारण ज्यादा वोट बटोर सकती है और दूसरा ये कि यदि मायावती के मुताबिक बंटवारा होता है तो उनमें भी बसपा ही ज्यादा फायदे में रहने वाली है। इस कारण वे जम कर विरोध कर रहे हैं। वे छोटे राज्यों के पक्षधर तो हैं, लेकिन उनक ऐतराज ये है कि अगर मायावती को यह निर्णय करना ही था तो साढ़े चार साल तक क्या करती रहीं, ऐन चुनाव के वक्त ही क्यों निर्णय किया? अर्थात वे केवल राजनीतिक लाभ की खातिर ऐसा कर रही हैं। उनका दूसरा तर्क ये है कि जिस तरह से प्रस्ताव पारित किया गया, वह अलोकतांत्रिक है क्योंकि इस पर न तो जनता के बीच सर्वे कराया गया और न ही अन्य दलों से राय ली गई। बसपा ने एकतरफा निर्णय कर बिना बहस कराए ही प्रस्ताव पारित कर दिया। आरोप-प्रत्यारोप के बीच तर्क भले ही कुछ भी दिए जाएं, मगर यह बिलकुल साफ है कि राज्यों के पुनर्गठन के मामले में सियासत ज्यादा हावी है और इसी कारण विकास के मौलिक सिद्धांत के नजरअंदाज होने की आशंका अधिक है।
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