प्रगतिशील ब्लॉग लेखक संघ. Blogger द्वारा संचालित.
प्रगतिशील ब्लॉग लेखक संघ एक अंतर्राष्ट्रीय मंच है जहां आपके प्रगतिशील विचारों को सामूहिक जनचेतना से सीधे जोड़ने हेतु हम पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं !

ग़ज़लगंगा.dg: देवता जितने भी थे पत्थर के थे

गुरुवार, 12 जुलाई 2012

कुछ ज़मीं के और कुछ अंबर के थे.
अक्स  सारे  डूबते  मंज़र  के  थे.

कुछ इबादत का सिला मिलता न था
देवता जितने भी थे पत्थर के थे.

दिल में कुछ, होठों पे कुछ, चेहरे पे कुछ
किस कदर मक्कार हम अंदर के थे.

खुल के कुछ कहने की गुंजाइश न थी
हम निशाने पर किसी खंज़र के थे.

मेरी बातें गौर से सुनते थे सब
हम उड़ाते जब तलक बेपर के थे.

आस्मां को नापना मुश्किल न था
फ़िक्र में हमलोग बालो-पर के थे.

उलझनों में इस कदर जकड़े थे हम
हम न दफ्तर के न अपने घर के थे.

तोड़ डाली वक़्त ने सारी अकड़
तेज़ वर्ना हम भी कुछ तेवर के थे.

-----देवेंद्र गौतम


'via Blog this'

एक टिप्पणी भेजें

About This Blog

भारतीय ब्लॉग्स का संपूर्ण मंच

join india

Blog Mandli

  © Blogger template The Professional Template II by Ourblogtemplates.com 2009

Back to TOP