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परदे के पीछे के कलाकार....

मंगलवार, 8 मार्च 2011



प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह का दामन लगातार दागदार होता जा रहा है. सीवीसी पीजे थॉमस की नियुक्ति का मामला हो, 2  जी स्पेक्ट्रम घोटाले का मामला हो, देवास अन्तरिक्ष घोटाले का मामला हो या फिर राष्ट्रमंडल खेल घोटाले का जांच-पड़ताल में शक की सुई सीधे प्रधान मंत्री कार्यालय पर आ टिकती है. प्राधानमंत्री को थॉमस की नियुक्ति में अपनी सहभागिता की बात सार्वजनिक रूप से स्वीकार करनी पड़ी.
प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह एक अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त अर्थशास्त्री हैं और उनकी छवि साफ-सुथरी रही है. वे एक गंभीर व्यक्तित्व के सम्मानित राजनेता रहे हैं. वे आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति  से दूर रहे हैं. उनकी एकमात्र कमजोरी यही रही है कि ज़रूरत से ज्यादा शरीफ और सरल रहे हैं. वे गलती नहीं कर सकते तो उसका विरोध भी नहीं कर सकते. चुपचाप यथास्थिति पर टिके हुए धारा के साथ बहते चले जाने के वे आदी रहे हैं. शायद ही कोई भारतवासी इस बात पर यकीन करे कि उन्होंने किसी घोटाले की व्यूहरचना की होगी या उसे अंजाम दिया होगा. स्पष्ट तौर पर कहें तो इसके लिए जिस मानसिक बनावट की या जिस दुस्साहस की ज़रूरत पड़ती है वह उनके पास है ही नहीं. निश्चित रूप से परदे के पीछे कोई और कलाकार अपनी बाजीगरी दिखा रहा था और मनमोहन सिंह चुपचाप इस खेल को देखते रहने को विवश रहे होंगे. चुप्पी तो उनके स्वभाव में है लेकिन उन्हें चुप रहने के लिए कोई दबाव भी झेलना पड़ा होगा. मैं उन्हें कोई ईमानदारी का प्रमाणपत्र देने का या उनकी सफाई देने का प्रयास नहीं कर रहा. कहने का अर्थ यह है कि  वे घोटाले का पैसा रख तो वे सकते हैं लेकिन उसे अंजाम नहीं दे सकते. वे इसके लिए पूरी तरह अयोग्य हैं. परदे के पीछे ज़रूर कोई ऐसा कलाकार है जिसकी किसी बात से वे इंकार नहीं कर सकते. जांच एजेंसियों को और विपक्ष को मनमोहन सिंह पर कीचड उछलने कि जगह उस कलाकार तक पहुंचने और उसकी सच्चाई को दुनिया के सामने लेन कि कोशिश करनी चाहिए इतना बड़ा घोटाला अंजाम देने का माद्दा अकेले ए राजा में नहीं हो सकता और मनमोहन सिंह ए राजा को बचने के लिए चुप्पी नहीं साध सकते.
झारखंड में पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा के नेतृत्व में हुए 4 .5  हज़ार करोड़ के खान आवंटन घोटाले में भी यही हुआ है. सीबीआई यह पता लगा रही है कि उस घोटाले की रकम किन-किन राजनेताओं तक पहुंचाई गयी है. वे एक निर्दलीय विधायक थे. संप्रंग के समर्थन से मुख्यमंत्री बने थे. जाहिर है कि दूसरों की वैसाखी के सहारे कुर्सी पर बैठा निर्दलीय मुख्यमंत्री अकेले दम पर इतना बड़ा घोटाला नहीं कर सकता. वह परदे के पीछे के कलाकारों के इशारे पर चल रहा था. अब सीबीआई  उन्हीं कि तलाश में लगी है. केंद्र में भी जांच एजेंसियों को असली कलाकारों कि तलाश करनी चाहिए.
---देवेन्द्र गौतम

3 comments:

मनोज पाण्डेय 8 मार्च 2011 को 8:34 pm  

बेहतरीन अभिव्यक्ति के लिए बधाईयाँ !

Udan Tashtari 9 मार्च 2011 को 7:22 am  

बात तो सही है..

Tarkeshwar Giri 9 मार्च 2011 को 6:55 pm  

Sara mal Madem ke pass hai. pakka kahrahe hain ahm

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