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इंजीनियरस की परेशानी.......(सत्यम शिवम)

बुधवार, 23 फ़रवरी 2011


कहता हूँ मै इक ऐसी कहानी.
इंजीनियरस की परेशानी,
इक इंजीनियर की जुबानी।

कहने को तो कुछ दिन में अब,
मै भी इंजीनियर कहलाऊँगा,
टेक्नोलाजी और साफटवेयरस के ही,
गीत सबको सुनाऊँगा,

पर दर्द का ये किस्सा पुराना,
डिग्री के वास्ते खत्म हुई है मेरी जवानी।

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तुम्हारे वो गीत याद है मुझे.......(सत्यम शिवम)

मंगलवार, 22 फ़रवरी 2011

जब कभी सुनता हूँ वो गीत याद आने लगती हो तुम।उस गीत से जुड़ी है तुम्हारी यादें।साधारण सा इक गीत बस तुम्हारी होंठों का स्पर्श पाकर इक विशिष्ट सा हो गया था मेरे लिए।जमाने के लिए वो गीत होगा कोई मधुर संगीत सा पर मेरे लिए तो वो प्राण श्वासों से निकलने वाला जीवन संगीत था।जो हर पल मेरी धड़कनों के संग प्रवाहीत होकर मेरे वजूद का तुम्हारे प्रीत की लय पर समर्पित होना बताता था।जब कभी सुनता हूँ कही भी,किसी वक्त सारा माहौल बिल्कुल बदल जाता है और इक अदृश्य सी सुनहरी चादर ओढ़े तुम्हारी यादें मुझे अपने आगोश में लेने लगती है और सपनों की दुनिया में खड़ी कही तुम किसी परी सी अपने पास बुलाती हो।मै दौड़ा दौड़ा जाता हूँ तुम्हारे पास और जब तुम्हे छूने की सारी कोशिशे व्यर्थ हो जाती है,तभी जाग जाता हूँ निंद से।


संगीत से सनी गीत में कैद तुम्हारी यादें मेरे लिए प्रेम रस में डुबे वैसे गीत है,जिसे एक बार सुनने के बाद बार बार उसे ही सुनने को जी करता है।उस गीत से होती मेरी सुबह और मेरी शाम।उस गीत पे मानों लिखी हो हमारे प्रीत के सुनहरे गुजरे दिनों के नाम।वो गीत मानों मेरी रुह से समा जाती हो हौले से मेरे जेहनोदिल में और पुकारती हो मुझे "आ जाओ ना तुम"।


मन करता फिर खींच लाऊँ उन पलों को अतीत से और तुम्हें दुल्हन बना ले आऊँ अब तो।पर मेरी विवशता तब एहसास कराती है,उस गीत का होना....पर तुम्हारे ना होने का।

आज तुम नहीं हो,पर दो बोल तुम्हारे गीतों के याद है मुझे।जिसे मैने बड़ी संजीदगी से छुपा लिया था उस रात जब तुमने इन्हें गुनगुनाया था।तुम गाती थी और मै खो जाता था कही।उस वक्त पता नहीं चला कि न जाने कितना सम्मोहन था तुम्हारे उन गीतों में,जो अब से कई सालों बाद भी इक अनोखी डोर में बाँध कर रखेगा मुझे।शायद वही है वो दिल के तार जिनसे इन गीतों का मधुर स्वर तुम्हारे पास से मेरे पास आ जाता है कभी कभी।


गीत की हर पंक्ति पूछती है शायद मुझसे,कि क्या अब तुम्हें मन नहीं करता फिर से उन दिनों में लौटने को।पर बेचारे इन गीतों को क्या पता है हम इंसानों की लाचारी।हमारे विवशता को तो बस रात के सुनसान सन्नाटे और जिंदगी के खामोश सफर ही समझ सकते है।इन गीतों को क्या पता मौन का एकाकीपन।

काश कोई समझ सकता इस मौन की चुप्पी के पीछे का रहस्य।क्यों बोले वो,कितना बुलाया,कई बार आवाज लगाया।कितने दिनों तक लगातार तुम्हें पुकारता रहा,पर जब उसे विश्वास हो गया अब तो सब व्यर्थ है।हो गया शांत और रहने लगा मौन।


तुम्हारे वो गीत पूछते है मुझसे "आ जाओ ना,मै कब से राह देख रही हूँ"।पर तुम कहा कहती हो अब आने के लिए।काश कभी ऐसा होता उन गीतों से होकर तुम्हारी कही कुछ बातें भी मेरे कानों को छुकर निकल जाती।तब तो जीवन का मेरा संगीत पूर्णरुपेण और सार्थक हो पाता।तुम अपने उन गीतों से कभी मेरे पास आती और कुछ बातें कर फिर लौट जाती।

शायद उस वक्त जब मै अपने जीवन के अंतिम पलों में जी रहा होऊँगा।तुम्हारे ये गीत मुझे फिर लौटने को कहेंगे गुजरे दिनों में।थोड़ा दुख तो होगा पर इक संतुष्टि होगी मुझे मरने के बाद ही सही पर,उस क्षण गीत के संग उसके उस गायक से भी मुलाकात हो जायेगी मेरी।छोड़ गया था जो मुझे मेरे जीवन के सफर में तन्हा मुझे और मै तुम्हे भर लूँगा बाहों में और एक गुजारिश मेरे दिल की तब भी तुमसे होगी "सुनाओ ना वो गीत फिर से एक बार" और तुम फिर से कई सदियों पुरानी वो अपने प्यार का राग छेड़ देती और आँखों से आँसू बरसने लगते तुम्हारे और गला भी भर जाता और वो गीत तुम्हारी भर्रायी हुई आवाज में मानों इस जमाने से कहता "हमने अपना प्यार पा लिया,मर के ही तो क्या हुआ.....पर जिंदगी तो मिल गई ना............। 



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कसम…..(सत्यम शिवम)

रविवार, 20 फ़रवरी 2011

आज है तुझको कसम,
कि जग को तु सँवार दे।
हाथ में भविष्य तेरे,
मानवों के हित का।
मुख पे है जो दिव्य आभा,
जगती से तेरे जीत का,
बढ़ता ही चल उन राहों में,
जो राह स्वर्ग तक जाती है,
रोक ना तु अब पग इक पल यहाँ,
जो बंधन तुझे मिटना सिखाती है।

खो जा उसमें तब मिलेगी मँजिल,
अपने सुख दुख तु वार दे।

आज है तुझको कसम,
कि जग को तु सँवार दे।

जो झुक गया,जो रुक गया,
इंसान वो सच्चा नहीं।
जिस राह में बस फूल बिछा,
वो राह कभी अच्छा नहीं।

काँटों पे चल,अग्नि में जल,
होता है तो हो जाने दे अब,
अपने जीवन के अवसान का पल।

हार गया तन जीवन में तो क्या,
आत्मा को विजय का हार दे।

आज है तुझको कसम,
कि जग को तु सँवार दे।

प्रलोभन राहों में है मगर,
तेरी इच्छा तो अनंत की है।
थक कर ना सोना है तुझे,
तेरे तन ने आज ये कसम ली है।

भयमुक्त निडर सा चलना है,
तुझे आसमान की राहों पे,
अब ना किसी से डरना है,
दर्द से या अपनों के आहों से।

भूल जा बीती सारी असफलता,
अपनों को भी तु विसार दे।

आज है तुझको कसम,
कि जग को तु सँवार दे।

माँ की ममता की दुहाई,
पत्नी के सिंदूर का कसम।
बहना के निंदिया का वास्ता,
कभी ना ले तु दम में दम।

आक्रोश अपना संचित कर उर में,
क्रोध ज्वार को कर ले तु शांत,
प्रबल वेग चतुराई से अपने,
सब को दे दे तु क्षण में मात।

उपेक्षाओं,आलोचनाओं से ना घबराना,
पी जा जहर अपमान का,
जो तुझे संसार दे।

आज है तुझको कसम,
कि जग को तु सँवार दे।

दीप्त दीप्त जीत से संलीप्त,
मग्न मग्न कर्मों में संलग्न,
अवसर ना कोई गवाना,
हर पल तु बस चलते जाना।

सुदूर हो या पास हो,
मन में तेरे विश्वास हो,
इक लगन हो बस जीत की,
वैराग्य जगत से प्रीत की।

टल जाएँगे बाधाएँ पल में,
हर विघ्न बाधा को संहार दे।

आज है तुझको कसम,
कि जग को तु सँवार दे।

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मेरी भावनाएँ,कितनी निरर्थक…….(सत्यम शिवम)

गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011

कैसी है मेरी भावनाएँ,तुमने जानने कि कोशिश कि है कभी।बस कह दिया इक पल में निरर्थक है तुम्हारी भावनाएँ।बड़ा वक्त लगता है ह्रदय की सरिता में इक भावना के कमल खिलाने में।इंसान अपनी भावनाएँ व्यक्त करता है,पर कैसे उसकी सार्थकता का दावा कर सकता है वो?वो खुद नहीं जानता कि उसकी भावनाएँ कौन सा रँग ले लेगी किस क्षण।

भावना मनुष्य के सद्विचारों का इक ऐसा उन्नत बीज होता है,जो इक सच्चे इंसान को जन्म देता है।भावों से भरा दिल हर किसी का नहीं होता।ये तो मिल जाता है,हजारो लाखों में किसी एक को।भावनाएँ ना सीखी जा सकती है,और ना दिखाई जा सकती है।ये तो उद्गार होता है,इक सच्चे इंसान के दिल का।छलकता है उसकी बातों से,महकता है उसके व्यक्तित्व में।

कहते है बिन भाव के आदमी शव होता है।बिन इंसानियत के एक उत्कृष्ट समाज,परिवार और राष्ट्र की कल्पना ही नहीं की जा सकती।भावनाएँ ना तो हमें विरासत में मिलती है और ना सिखते है हम देख कर इसे।ये तो एक सच्चे इंसान में इंसानियत की पहली और आखिरी निशानी होती है।

जब भावनाओं का सागर उमरने लगता है और इंसान की आत्मा गोते  लगाने लगती है उसमें तो वही भावनाएँ दो बूँद बन कर हमारी आँखों से भी बह जाते है।खुशी के पल में प्रफुल्लित आँसू और दुख के क्षण में आह्लादित आँसू।आँसू एकमात्र वैसे संवेदना वाहक होते है,जो इंसान की भावनाओं का जीवंत रुप ले लेते है।ये एहसास सब ने किया होगा,आँखे जितना बरसती है मन हल्का होता जाता है।भावनाएँ पूर्ववत स्वरुप को धारण कर लेती है और मिलन विरह दोनों बस इक पल में दृष्टिगोचर होने लगता है।

आज के आधुनिक परिवेश में बस व्यवसायिक दृष्टि ही सफलता का आधार बन गया है,तो हमारी भावनाएँ कितनी निरर्थक है।भावनाओं की सार्थकता तो बस इक कलाकार जान सकता है,जो अपनी भावनाओं को ही संगीतबद्ध करता है,भावनाओं की ही लेखनी चलाता है,और उसे ही गुनगुना कर सफल होता है।

कैनवास पर जो आकृति इक चित्रकार बना देता है कल्पनाओं का आखिर वो क्या होता है,भावनाएँ ही तो होती है उस कलाकार की जो स्केच से कैनवास पर खुद खुद इक रुप में दिखने लगती है।भावनाएँ ही कला है,इक कलाकार का आजीवन मीत।

प्रेमी की भावनाएँ प्रेमिका के प्रतीक्षा की चँद घड़ियाँ ही बया कर देती है।कैसे इक युगल विरह वेदना को सहता है और कैसे दूर होकर भी बस भावनाओं के अनोखे तार से जुड़ा होता है।प्रेम भी इक भावना ही है,जो भावुक और हर्षित ह्रदय का परिचायक होता है।इक प्रकार का आकर्षण ही तो होता है प्रेम जिसमें सामने वाला हमें अतिसुंदर और प्यारा जान पड़ता है।अपना सर्वस्व न्योछावर कर के भी प्रेमी युगल क्यों समाज की कुंठित मानसिकता की बलि चढ़ जाते है।यह प्रेम के ही चरमोत्कर्ष की संवेदनात्मक भावनाओं को दर्शाता है।

निरर्थक नहीं है मेरी भावनाएँ जो तुमने समझा ही कहा कभी या यूँ कहे कोशिश ही ना कि समझने की।तुम्हारे इंतजार में पलक पावड़े बिछाएँ यूँ ही निहारता तेरी राह।आने पर तुम्हारे लिपट जाता तुमसे और फिर कुछ ना कहना और ना सुनना।जाने पर तुम्हारे फिर तुम्हारे आने का इंतजार करना और बस सोचना तेरे बारे में।क्यों लगता है इतना निरर्थक वो सब,जो कल तक तुम्हारे लिए मेरा प्यार था।वो मेरी भावनाएँ,क्यों लगती है तुम्हे निरर्थक अब?क्या मेरा प्रेम खत्म हो गया तुमसे आज,जो मेरी भावनाएँ इतनी निरर्थक लगती है अब तुम्हें............

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