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मनोहर बिल्लोरे की कविता : उगने को है

रविवार, 21 अगस्त 2011

साभार: धर्म सिंह जी के ब्लाग से 
एल्यूमीनिम की चूल्हे पर जमी
पिचकी-दचकी मैली सी बटलोई में
खदबदा रहे दाल-चावल, टकराते
पक रहे साथ-साथ,
उछल रहा फेन, उबल रहा पानी
***************
हवा घूम रही साथ लिये, कहीं,
खिचड़ी की सुगंध की वाष्प
ईधन से उधर
स्वच्छंद भड़काती भूख
***************
तो कहीं आटे की लोईयों पर
पर पड़ रही हथेलियों की थाप
लगभग गोल आकार पा, सिंक रहीं
जर्जर तवे पर मोटी-सोंटी रोटियां
***************
दो चार साथ जायेंगी
गमछे में लिपट, काम पर
जारी है मजूरी पर जाने की
स्फूर्त तैयारी
***************
दातून है किसी मुंह में
ईधर-उधर टहलती हुई
किसी हाथ में है डिब्बा
सिर पर उड़ेलता पानी
***************
दूर कहीं निर्जन से लौटता
होकर फारिग, आ रहा,
बेरंग डिब्बा थामे कोई हाथ
***************
आवाजें... आवाजें... आवाजें
जोर-शोर की, आत्मीय,
छटपटाहट से भरी आवाजें...
प्रदूषक शोर नहीं कहीं
***************
पड़ोस के निर्माणाधीन भवन का
आंगन... छेड़-छाड़, बतकहियां
मजाक, हॅंसी-ठट्ठा, उत्साह और
उमंग की तरंग,
मिली-घली हवा में...
आवाजें...
***************
जारी है,
एक और कलरव
सुबह-सुबह...
***************
देर से सोकर,
उठने वाला देर से
पैदाईशी अलाल, कामटालू
मैं’- उठ गया आज जल्दी
आलस्य, उदासी और अवसाद से
भिड़, परास्त कर उन्हें, कुछ
कर गुजरने की, जाग रही है
इच्छा, टहलते, उबासी लेते,
आंखें मीड़ते
***************
लाल, बड़ा गोला
सूरज का, आकाश में
उठा आ रहा
ऊपर और ऊपर...
    कविता: मनोहर बिल्लोरे
    1225,जे.पी. नगर,अधारताल
     जबलपुर, फ़ोन:-08982175385
    
    

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अलबेला का खेला : जबलपुर में

शनिवार, 5 मार्च 2011





सूरत से सिंगरौली व्हाया जबलपुर जाते समय जबलपुरियों हत्थे चढ़ गये राज़ दुलारेअलबेला के साथ आज न कल देर रात तक फ़ागुन की  आहट का स्वागत किया  गया बिल्लोरे निवास पर डाक्टर विजय तिवारी "किसलय" बवाल ,और हमने यक़ीं न हीं तो देख लीजिये 

 तयशुदा कार्यक्रम के मुताबिक हम कार्यालयीन काम निपटा के हज़ूरे आला की आगवानी के वास्ते जबलपुर रेलवे स्टेशन के प्लेटफ़ार्म नम्बर चार पर खडे़ अपने ड्रायवर रामजी से बतिया रहे थे. समय समय पर हमको  अलबेला जी कबर देते रहे कि अब हम यहां हैं तो अब हम आने ही वाले हैं किंतु पता चला कि महानगरी एक्सप्रेस नियत प्लेटफ़ार्म पर न आकर दो नम्बर प्लेट फ़ार्म पर आने वाली है. सो बस हम भी जबलपुर रेलवे स्टेशन के मुख्य-प्लेट फ़ार्म पर आ गये. जहां ट्रेन आने के बावज़ूद भाई से मुलाक़ात न हुई. मुझे लगा कि कि खत्री महाशय ने फ़टका लगा दिया. कि फ़िर एक फ़ोन से कन्फ़र्म हुआ कि ज़नाब यहीं हैं. कार में सवार हुये 
अलबेला जी को  इस बात का डर सता सता रहा कि मेरे घर उनका अतिशय प्रिय पेय मिलेगा या नहीं, मिलेगा तो पता नहीं पहुंचने के कितने समय बाद मिलेगा जिस पेय के वे तलबगार हैं....अर्र र र ललित भाई आप गलत समझे ये वो पेय नहीं जिसकी तलब में आप हैं भाई अलबेला जी को "चाय" की तलब थी , सो डिलाइट-टाक़ीज़ के पास होटल में ले जाया गया. कार में बैठे-बैठे चाय पी गई. घर आकर देखा तो वाक़ई श्रीमति जी मुहल्ले में आयोजित किसी कार्यक्रम में भागीदारी के लिये रवाना हो रहीं थीं. सो  
 हम मान गये लोहा अलबेला जी के दूरगामी चिंतन का .चाय तो मिली किंतु नियत समय से आधे-घंटे की देरी से. और फ़िर स्वागत सत्कार के लिये विजय तिवारी किसलय, भाई जितेंद्र जोशी (आभास के चाचू) बवालयशभारत जबलपुर के प्रति निधि श्री मट्टू स्वामी, पधारे इस बीच माय एफ़ एम 94.3 जियो दिल से वालों ने एक लाईव प्रसारण भी किया टेलीफ़ोन पर खूब चहके भाई अलबेला खत्री.    
 फ़िर क्या हुआ..?
फ़िर फ़िर ये हुआ कि :-"अलबेला जी लाइव हो गये बैमबज़र के ज़रिये. और क्या होना था"
मोबाइल कैमरा फ़ोटो सेशन के बाद अरविन्द यादव जी आये को फ़ोटो ग्राफ़्री हुई. जम के हुआ वेबकास्ट इंटरव्यू . 43 साथी लाइव देख रहे थे. 
यानी हंगामें दार रही शाम. की गवाही दे सकते हैं  संगीत निर्देशक श्री सुनील पारे, जीवन बीमा निगम के प्रबंधक श्री तुरकर जी एवम मेरे अग्रज़  श्री सतीष बिल्लोरे जो घटना स्थल के बिलकुल समीप थे. कुल मिला का होली-हंगामा शुरु.. 
 उधर भूख के मारे पेट में चूहे कत्थक,कुचिपुड़ी,सालसा, करने लगे भोजन भी तैयार था सो संचालकीय तानाशही का भाव मन में आया और हमने एकतरफ़ा ऐलान कर दिया..... सभा बर्खास्त, अब नहीं हो पा रही भूख बर्दाश्त. 
ताज़ा सूचना मिलने तक ज्ञात हुआ की अलबेला खत्री जी को ट्रेन में कंडेक्टर ने जगाया बोला जोर से मत सुनाओ. 
"क्या मैं कविता सुना रहा हूँ ..?"  
 टीसी ने कहा :- नहीं श्रीमान खर्राटे .......
मित्रो , जो बुके उनके स्वागतार्थ आये वे मेरे घर की शोभा बढायेंगे . सच अलबेला खत्री जी खूब याद आएंगे

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