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सुर्खियां क्यों

रविवार, 17 अप्रैल 2011

                  "पूनम पाण्डे" का सच जो भी हो सुर्खियां क्यों दी जा रही हैं उसे जबकि ज़रूरत है "अरुणिमा" पर चर्चा कर उसके प्रति संवेदित रहने की. ये तो सही है कि  न तो मैने न ही किसी ने संस्कृति बचाओ अभियान का ठेका लिया है हमें क्या ? हमारी एक अलग धारा है, चिंतन की किंतु ऐसी खबरें समाज की नई पौध की गिरावट की जो सूचना दे रही है उस पर सोचना उसे रोकना ज़रूरी है.  


"कानूनी विशेषज्ञों की राय में मॉडल पूनम पांडेय का भारतीय क्रिकेट टीम
 के वर्ल्डकप जीतने पर निर्वस्त्र होकर जश्न मनाने के लिए बीसीसीआई से अनुमति मांगना लोगों को गुमराह करने से अधिक कुछ नहीं। सार्वजनिक स्थल पर कपड़े उतारकर जश्न मनाना अश्लीलता की श्रेणी में आता है जो अपराध है और बीसीसीआई या अन्य व्यक्ति को अपराध के लिए अनुमति देने की इजाजत नहीं है।
वर्ल्डकप फाइनल से पहले पूनम ने कहा था कि वह टीम इंडिया की जीत पर कपड़े उतारकर जश्न मनाएंगी और वह अब भी इस बयान पर बरकरार हैं। यह मॉडल साथ ही कह रही है कि वह ऐसा करने के लिए बीसीसीआई से अनुमति का इंतजार कर रही है। उसका कहना है कि वह स्टेडियम, खिलाड़ियों के ड्रेसिंग रूम या अन्य किसी भी 


टर्बनेटर के नाम से मशहूर भारतीय ऑफ स्पिनर हरभजन सिंह ने राष्ट्रीय स्तर की फुटबाल और वालीबाल खिलाड़ी अरुणिमा सिन्हा को एक लाख रुपए की वित्तीय मदद की पेशकश की है।
बरेली के नजदीक लुटेरों ने अरुणिमा को चलती ट्रेन से फेंक दिया था जिसके कारण उन्होंने अपना एक पैर गंवा दिया। 28 साल बाद 
भारत के लिए वर्ल्डकप जीतने वाली टीम के सदस्य हरभजन ने अरुणिमा के साहस की भी तारीफ की।


                     जी इस आलेख का उद्देश्य किसी खबर को पूरी तरह से ग़ैर ज़रूरी अथवा दूसरी को ही ज़रूरी बताना न होकर "पाजीटिव वातावरण" बनाने वाले समाचारों को प्रमुखता दिलाना है. समाचारों से यह भी पता चलता है कि अब तक मात्र चार लाख रुपये का सहयोग जुट पाया है... अरुणिमा के लिये ! जो बहुत  कम है. लेकिन सहयोग करने वाले भज्जी और युवी का पाज़िटिव नज़रिया वाकई सराहनीय है. 

        बहरहाल  इस बात से एक बात याद आ रही है मेरे परिचित अधिवक्ता मृगेंद्र नारायण सिंह ने कहा था :- अब तो ऊब सी होने लगी वो विचार गर्भित आलेख कहां मिलते है पढ़ने ?

      सच यही है लोग क्या चाहते हैं पढ़ना देखना खैर जो भी हो शायद परम्परागत मीडिया को इस बात की खबर नही है ?       न्यू-मीडिया से कुछ उम्मीदें तो हैं पर क्या न्यू मीडिया भी कुछ विचार शीलता रखता है इस बात की पड़ताल शेष है और शेष है "पाज़िटिव-चिंतन" न कि "कुंठित-चिंता" 

चित्र : गूगल से प्राप्त हैं आपत्ति होने पर सूचित कीजिये girishbillore@gmail.com  पर

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चार दिन बनाम चालीस साल

शनिवार, 9 अप्रैल 2011


अन्ना हजारे का चार दिन का आमरण अनशन नक्सलियों के चालीस साल के हिंसक संघर्ष पर भारी पड़ा. इन चार दिनों के अंदर देस के हर हिस्से में समाज के हर तबके से समर्थन की जो सुनामी उठी उसकी मिसाल महात्मा गांधी या लोकनायक जयप्रकाश नारायण के आंदोलनों के दौरान उठे जन सैलाब से ही दी जा सकती है. नक्सलियों   की हिंसक कार्रवाइयों से प्रभावित क्षेत्र की जनता में दहशत ज़रूर छाई है लेकिन कभी ऐसा उत्साह उत्पन्न नहीं हुआ है. भारत में कोई भी बदलाव गांधीवाद के रास्ते से ही आएगा और यहां के लोग बंदूक की नली से सत्ता की उत्पत्ति की अवधारणा को किसी कीमत पर स्वीकार नहीं करेंगे अन्ना के आंदोलन और उसकी उपलब्धि से यह बात साफ़ हो चुकी है.

            निश्चित रूप से इस आंदोलन के प्रति लचीला और सकारात्मक रुख अख्तियार कर मनमोहन सिंह सरकार ने यह संदेश दिया है के वह गांधीवाद की भाषा समझती है.कुछ पूर्ववर्ती सरकारों ने शांतिपूर्ण अहिंसक आंदोलनों पर दमनचक्र चलाकर और हिंसक संगठनों के साथ समझौता वार्ता कर यह जाहिर किया था कि गांधी की नहीं गोली और बारूद की भाषा ही समझती है. इसके बाद ही देस में उग्रवाद और आतंकवाद ने जोर पकड़ा था. 1974 के जेपी आंदोलन के दौरान श्रीमती इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगाकर और अर्द्धसैनिक बलों तथा ख़ुफ़िया एजेंसियों का राजनैतिक इस्तेमाल कर आंदोलन को कुचल डालने का भरसक प्रयास किया था. हालांकि उस आंदोलन को इतना ज़बरदस्त जन समर्थन प्राप्त था कि उस आंधी में खुद उन्हीं का आशियाना उखड गया था. उनके हाथ से सत्ता की बागडोर निकल गयी थी. इस आंदोलन का प्रभाव यह पड़ा कि कई नक्सली गुटों ने हिंसा का रास्ता त्यागकर मुख्य धारा की राजनीति  शुरू कर दी. 1977 में जब मोरारजी देसाई के नेतृत्त्व में आन्दोलनकारियों की सरकार बनी. उस सरकार ने भी आन्दोलन के गांधीवादी तौर-तरीकों को तरजीह नहीं दी. जेपी समर्थक नवयुवकों ने उस ज़माने में छात्र युवा संघर्ष वाहिनी का गठन  कर सम्पूर्ण क्रांति की शुरूआत की. उनका सबसे बड़ा आंदोलन बोध गया महंथ की करीब 15 हज़ार एकड़ सीलिंग से अधिक और बेनामी ज़मीन की ज़ब्ती और भूमिहीनों के बीच वितरण का था. यह विश्व में अहिंसक वर्ग संघर्ष का पहला प्रयोग था. इसपर पूरी दुनिया की नज़र थी. खुद नक्सली संगठनों ने भी अपने संघर्ष को रोक दिया था और इसके परिणामों  का इंतज़ार कर रहे थे. लेकिन सरकार और स्थानीय पुलिस-प्रशासन ने महंथ के लठैतों की भूमिका अपना ली.शांतिपूर्ण प्रदर्शनों और धरने के कार्यक्रमों को लाठी  और अश्रुगैस से रोकने की कोशिश की जाने लगी. 8  अगस्त 1979 को तो हद ही हो गयी. बोध गया के मस्तीपुर गांव में आन्दोलनकारियों की सभा में पुलिस और महंथ के पहलवानों ने लाठी और गोली से हमला कर दिया. कई प्रदर्शनकारी घायल हुए. तीन-चार लोग मरे गए.


नक्सलियों ने इस कार्रवाई के विरोध में उसी रात महंथ के एक पहलवान की हत्या कर दी. उनका अहिंसक वर्ग संघर्ष के इस प्रयोग से मोहभंग हो गया. उन्हें लगा कि उनका बन्दूक का रास्ता ही सही है. इसके बाद उनकी लड़ाई तेज़ हो गयी. इधर सरकारी तंत्र ने उलटे महंथ के पहलवान कि हत्या के आरोप में वाहिनी के कार्यकर्ताओं  के विरुद्ध मुकदमा ठोक दिया. प्रदर्शन के दौरान घायल हुए या मरे गए आन्दोलनकारियों का मामला ठप्प हो गया. अहिंसक आन्दोलन को कुचलने का नतीजा आज भी यह देस भुगत रहा है. 1980 में श्रीमती गांधी दुबारा सत्ता में आयीं तो उन्होंने भी भिंडरवाले जैसे आतंक को अपने विरोधियों को दबाने के लिए परोक्ष रूप से प्रश्रय दिया.सुभाष घिसिंग, लाल्देंगा जैसे लोगों की ताक़त उनके ज़माने में ही बढ़ी. जिस हिंसा उनहोंने बढ़ावा दिया वही अंततः  उनके लिए भष्मासुर साबित हुआ. राजीव गांधी प्रधान मंत्री बने तो उन्होंने भी लालदेंगा से समझौता कर हिंसा की भाषा को सरकारी तौर पर जल्दी सुनी जाने वाली भाषा के रूप में स्थापित किया. इन कार्रवाइयों से हिंसक संघर्षों को बल मिला. गांधीवादी आन्दोलन के तौर तरीके अप्रासंगिक नज़र आने लगे. मनमोहन सरकार ने अन्ना हजारे के आन्दोलन पर लचीला रुख अपना कर अहिंसा की भाषा के प्रति अपनी स्वीकृति दी है. इसका दूरगामी प्रभाव पड़ेगा.

           अन्ना हजारे भारत के राजनैतिक संतों की परंपरा की कड़ी हैं. सबसे बड़ी बात है कि उन्होंने पूर्ववर्ती राजनैतिक संतों की गलतियों को दुहराया नहीं है. महात्मा गांधी और लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने आन्दोलन की सफलता के बाद उसकी उपलब्धियों से स्वयं  को अलग कर लिया था. सत्ता  की बागडोर दूसरों के हाथ में थमा दी थी. उसपर अपना कोई नियंत्रण नहीं रखा था. नतीजतन उनकी परिकल्पना आकर नहीं ले सकी थी. सिर्फ स्वार्थपूर्ति के लिए उनका नाम भुनाया जाता रहा था. सत्ता के प्रति अपनी अनाशक्ति का प्रदर्शन करने के लिए उन्होंने ऐसे लोगों को नेतृत्व थमा दिया जो उनके सिद्धांतों को न समझते थे न समझना चाहते थे. अन्ना हजारे ने एक सदस्य के रूप में सही संयुक्त समिति में रहना स्वीकार कर यह बता दिया कि वे पूर्वजों की  गलती दुहराने नहीं जा रहे. अन्ना हजारे और उनके समर्थकों ने एक और सतर्कता बरती. उन्होंने किसी भी राजनैतिक दल के नेता को अनशन स्थल पर फटकने नहीं दिया. आन्दोलन में ऐसे गैर राजनैतिक सामाजिक कार्यकर्त्ता और विभिन्न क्षेत्रों के अगुआ लोग इकट्ठे हुए जिनकी जनता के बीच साफ़ सुथरी छवि है. युवा वर्ग का उत्साह एक नए बदलाव की यात्रा प्रारंभ होने का विश्वास दिला रहा था. देशभर में लोग टीवी पर आंख गडाए पल-पल की खबर उसी तन्मयता से ले रहे थे जिस तन्मयता से कुछ ही दिन पहले क्रिकेट मैच के स्कोर  की जानकारी ले रहे थे. अब इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि जंतर मंतर की  इस हलचल को वामपंथी या भाजपाई किस रूप में विश्लेषित कर रहे हैं. लेकिन इस घटना ने जनतंत्र में तंत्र पर जन की पकड़ को मज़बूत किया है.यह भ्रष्टतंत्र के खिलाफ जनतंत्र की जंग के शुरूआत है. अभी कई मरहले पार करने हैं. कई अवरोध हटाने हैं. जनमानस में नै आशाओं का संचार हुआ है. अन्ना हजारे के नेतृत्व में  एक सकारात्मक बदलाव की ओर कारवां निकल पड़ा है. अहिंसक लड़ाई की इस जीत से बन्दूक की नली से सत्ता की उत्पत्ति का इंतजार करने वाले लोगों को भी कुछ सबक लेनी चाहिए.  


-----देवेंद्र गौतम 

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.....तो संकट से उबर जायेगा डाक विभाग

गुरुवार, 10 मार्च 2011


वह दिन गए जब पत्रों का आदान-प्रदान कबूतरों के जरिये होता था. वो दिन भी गए जब यह कष्ट डाकियों को उठाना पड़ता था. अब यह काम सैटेलाईट के जरिये बखूबी हो रहा है. लेकिन आधुनिक संचार सेवाओं के विस्तार ने डाक विभाग के औचित्य पर ही सवाल खड़ा कर दिया. उसे अस्तित्व के संकट से दो-चार होना पड़ा. उसका व्यवसाय मार खाने लगा. आमदनी घटने लगी खर्च बढ़ने लगा. लेकिन अब भारतीय डाक विभाग सैटेलाईट से जुड़कर एक लम्बी छलांग लगाने की तैयारी में है. यूनिक आईडी की अवधारणा उसके लिए.वरदान सिद्ध होने जा रही है. यूनिक आइडेंटीटीफिकेशन अथोरिटी ऑफ़ इंडिया के साथ हुए इकरारनामे के तहत आईडी कार्ड प्रोवाइडर्स के साथ मिलकर उसे सामाजिक-आर्थिक क्षेत्रों में संयुक्त रूप से काम करना है. इससे उसे भारत की सवा सौ करोड़ की आबादी के साथ सीधे संपर्क का मौक़ा मिलेगा. घर-घर में उसकी पैठ बनेगी. अपनी आधुनिकतम सेवाओं की जानकारी देकर लोगों को डाक विभाग के प्रति धारणा बदलने को प्रेरित करेगा. उसके व्यवसाय में बढ़ोत्तरी होगी. आर्थिक संकट दूर होगा. अब तेज़ रफ़्तार की विश्वसनीय सेवा उपलब्ध करने के लिए ई-डाकघरों की स्थापना की जा रही है.
निजी क्षेत्र की डाक और संचार कंपनियों के मैदान में उतरने के बाद भारत ही नहीं पूरी दुनिया में डाक सेवा में मंदी का ग्रहण लग गया था. यूनिवर्सल  पोस्टल ने एक सर्वेक्षण में पाया कि 2008 -09 के दौरान वैश्विक स्तर पर घरेलू डाक संचार में 12 % की कमी आयी. जब विकसित देशों की डाक सेवा इन्टरनेट की मार नहीं झेल सकी तो भारत जैसे देश में तो असर पड़ना ही था. 2006 -07  में डाक विभाग ने जहाँ 66771.8 लाख  पत्रों का वितरण किया वहीँ 200 -08  में यह घटकर 63911.5  लाख पर आ गया. 2008 -09  में ज़रूर थोड़ी बढ़ोत्तरी केसाथ यह आकड़ा 654090  लाख पर पहुंचा. 1987 -88  के दौरान भारतीय डाक विभाग ने इसके करीब दुगना यानि 157493  लाख पत्रों का वितरण किया था. हालांकि अब स्थिति में सुधर आ रहा है. पार्सल और एक्सप्रेस सेवाओं के जरिये व्यसाय कुछ बाधा फिर भी बुनियादी चुनौतियां बरक़रार रहीं. दूरभाष सेवा के विस्तार से भी डाक विभाग को कुछ ऊर्जा मिली. वर्ष 2004 में जहां 765 .4   लाख टेलीफोन उपभोक्ता थे वहीँ 2010  में उनकी संख्या बढ़कर 764 .७ लाख  हो गयी.
अब ई-पोस्ट आफिस के जरिये मनीआर्डर  जैसी सेवाओं का विस्तार होगा.इससे डाक सेवा के एक नए युग की शुरूआत होगी.
बहरहाल यूनिक आईडी प्रोग्राम के जरिये डाक विभाग को अपने व्यवसाय में तेज़ी लाने का एक सुनहला अवसर मिल रहा है. अब विश्व के इस सबसे बड़े पोस्टल नेटवर्क के सामने सस्ती, सुन्दर और टिकाऊ सेवा उपलब्ध कराने की चुनौती रहेगी.

----देवेन्द्र गौतम

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परदे के पीछे के कलाकार....

मंगलवार, 8 मार्च 2011



प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह का दामन लगातार दागदार होता जा रहा है. सीवीसी पीजे थॉमस की नियुक्ति का मामला हो, 2  जी स्पेक्ट्रम घोटाले का मामला हो, देवास अन्तरिक्ष घोटाले का मामला हो या फिर राष्ट्रमंडल खेल घोटाले का जांच-पड़ताल में शक की सुई सीधे प्रधान मंत्री कार्यालय पर आ टिकती है. प्राधानमंत्री को थॉमस की नियुक्ति में अपनी सहभागिता की बात सार्वजनिक रूप से स्वीकार करनी पड़ी.
प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह एक अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त अर्थशास्त्री हैं और उनकी छवि साफ-सुथरी रही है. वे एक गंभीर व्यक्तित्व के सम्मानित राजनेता रहे हैं. वे आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति  से दूर रहे हैं. उनकी एकमात्र कमजोरी यही रही है कि ज़रूरत से ज्यादा शरीफ और सरल रहे हैं. वे गलती नहीं कर सकते तो उसका विरोध भी नहीं कर सकते. चुपचाप यथास्थिति पर टिके हुए धारा के साथ बहते चले जाने के वे आदी रहे हैं. शायद ही कोई भारतवासी इस बात पर यकीन करे कि उन्होंने किसी घोटाले की व्यूहरचना की होगी या उसे अंजाम दिया होगा. स्पष्ट तौर पर कहें तो इसके लिए जिस मानसिक बनावट की या जिस दुस्साहस की ज़रूरत पड़ती है वह उनके पास है ही नहीं. निश्चित रूप से परदे के पीछे कोई और कलाकार अपनी बाजीगरी दिखा रहा था और मनमोहन सिंह चुपचाप इस खेल को देखते रहने को विवश रहे होंगे. चुप्पी तो उनके स्वभाव में है लेकिन उन्हें चुप रहने के लिए कोई दबाव भी झेलना पड़ा होगा. मैं उन्हें कोई ईमानदारी का प्रमाणपत्र देने का या उनकी सफाई देने का प्रयास नहीं कर रहा. कहने का अर्थ यह है कि  वे घोटाले का पैसा रख तो वे सकते हैं लेकिन उसे अंजाम नहीं दे सकते. वे इसके लिए पूरी तरह अयोग्य हैं. परदे के पीछे ज़रूर कोई ऐसा कलाकार है जिसकी किसी बात से वे इंकार नहीं कर सकते. जांच एजेंसियों को और विपक्ष को मनमोहन सिंह पर कीचड उछलने कि जगह उस कलाकार तक पहुंचने और उसकी सच्चाई को दुनिया के सामने लेन कि कोशिश करनी चाहिए इतना बड़ा घोटाला अंजाम देने का माद्दा अकेले ए राजा में नहीं हो सकता और मनमोहन सिंह ए राजा को बचने के लिए चुप्पी नहीं साध सकते.
झारखंड में पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा के नेतृत्व में हुए 4 .5  हज़ार करोड़ के खान आवंटन घोटाले में भी यही हुआ है. सीबीआई यह पता लगा रही है कि उस घोटाले की रकम किन-किन राजनेताओं तक पहुंचाई गयी है. वे एक निर्दलीय विधायक थे. संप्रंग के समर्थन से मुख्यमंत्री बने थे. जाहिर है कि दूसरों की वैसाखी के सहारे कुर्सी पर बैठा निर्दलीय मुख्यमंत्री अकेले दम पर इतना बड़ा घोटाला नहीं कर सकता. वह परदे के पीछे के कलाकारों के इशारे पर चल रहा था. अब सीबीआई  उन्हीं कि तलाश में लगी है. केंद्र में भी जांच एजेंसियों को असली कलाकारों कि तलाश करनी चाहिए.
---देवेन्द्र गौतम

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