सपनों की नदी और मछली
शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011

उसकी आँखों में सपनों की
एक नदी बहती थी
रंगबिरंगी मछलियाँ डुबकियां लेतीं
कोई अनचाहा मछुआरा मछलियाँ न पकड़ ले
जब तब वह अपनी आँखें
कसके मींच लेती...
....
एक दिन -
किसी ने बन्द पलकों पर उंगलियाँ घुमायीं
और बड़ी बड़ी आँखों ने देखना चाहा
कौन है .....
और पलक झपकते
सपनों की नदी से
छप से एक मछली बाहर निकली
मछुआरे ने उसे अपनी आँखों की झील में डाला
और अनजानी राहों पर चल पड़ा....
....
अनजानी राहों के लौटने के इंतज़ार में
सपनों की नदी
कभी सूखी नहीं
ना ही फिर किसी मछुआरे से
अपनी रंगीन मछलियों का सौदा किया
हर अजनबी आहट पर
कसके अपनी आँखें मींच लीं ...
...
यशोधरा के मान से कम उसका मान नहीं
मानिनी सी करती है इंतज़ार
उस मछुआरे का
जिसकी आँखों में
उसकी एक मछली आज भी तैर रही है !
8 comments:
namskaar
behad sunder abhivyakti , behad sunder bhaav !
pasand aayi rachna ,
sadhuwad !
एक बार और जाल फेंक रे मछेरे
जाने किस मछली में बंधन की चाह हो...
सुन्दर,
बड़ी मासूम है यह अभिव्यक्ति, रचनाकार शब्दों से उसीप्रकार खेलता दिखाई दे रहा है जिसप्रकार कोई भोला बच्चा अपनी मान से खेलता है, बहुत सुन्दर !
अच्छी लगी यह कविता, आभार आपको रश्मि जी...
कविता नहीं जीवन की सच्चाई है यह
यशोधरा के मान से कम उसका मान नहीं
मानिनी सी करती है इंतज़ार
उस मछुआरे का
जिसकी आँखों में
उसकी एक मछली आज भी तैर रही है !
हर शब्द का अहसास अद्भुत है ...बेहतरीन प्रस्तुति ।
उम्दा!
kavita to bahut achchi he rashmi ji, lekin esi bhi kya bechargi ki machhuara chalak he aur machli fir bhi usi ka intezar kare. vese bhi pratik thik nahi he machhli ka pyar samandar hota he, koi machhuara nahi.
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