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किस मजहब में है, मनाही तस्लीम माँ को करना।

शुक्रवार, 7 अक्तूबर 2011


किस मजहब में है,
मनाही,तस्लीम माँ को करना।
एक जननी, एक जन्मभूमि,
दो वालिदा है। हमारी,
तुम इनको याद रख्नना।
दोनों पर फर्ज हमारा,
है, दोनों का कर्ज हम पर।
,हम हिन्दुस्तानी हैं पहले,
हो धर्म कुछ भी याद रखना।
मजहब के आँच पर,
सियासी रोटियाँ पकाते नेता ,
है तस्लीम माँ को करना,
तो दूर हो क्यों, कोई भी बेटा।
हमारी एकता के बल पर,
फक्र से, हिन्दुस्तान खड़ा है देखो।
एक बार धर्म, भाषा ,मजह्ब, से,
तुम ऊपर उठ करके जरा सा सोचो।
अशफाक ,विस्मिल,सुखदेव,भगतसिह, राजगुरु,की,
शहादत जाया न जाए, देखो।
जो वन्देमातरम कह के फाँसी,
चढ गए तुम उनको याद रखना।
किस मजहब में है,
मनाही,तस्लीम माँ को करना।

5 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 8 अक्तूबर 2011 को 8:17 am बजे  

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर भी की गई है!
अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

गीतेश 8 अक्तूबर 2011 को 4:07 pm बजे  

अच्छी और मासूम रचना, सार्थक सन्देश देती हुयी .

Suman Dubey 9 अक्तूबर 2011 को 6:59 pm बजे  

हुमान जी मयंक जी ब्रजेश जी गीतेश जी सभी को नमस्कार और प्रतिक्रिया के लिये आप सभी का धन्यवाद आपका मेरे ब्लाग जनदर्पण, शब्द्कुन्ज, व हायकू कुन्ज, पर भी हार्दिक स्वागत है।जय हिन्द्।

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